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गुरु रविदास और आत्मा परमात्मा मिलन।।

।।गुरु रविदास जी और आत्मा-परमात्मा मिलन।। गुरु रविदास जी महाराज की अटूट निरन्तर साधना, तपस्या, रंग ला चुकी थी, उन्होंने, आदिपुरुष के जब साक्षात दर्शन कर लिये तब उन्होंने कहा:-----             ।।शव्द।। तोही मोही, मोही तोही, अंतरु कैसा।। कनक कटिक जल तरंग जैसा।। जउ पै हम ना पाप करंता अहे अनंता।। पतित पावन नामु कैसे हुंता।।रहाउ।। तुम जउ नाईक आछहु अंतरजामी।। प्रभ ते जनु जानी जै जन तेसुआमी।। सरीरु अराधै मो कउ विचारु देहू।। रविदास समदल समझावै कोउ।। इस शव्द से पूर्णरूपेण स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि, गुरु रविदास जी को प्रभु मिलन हो गया था। उन्होंने आदिपुरुष के दर्शन कर लिए थे, तभी उन्होंने कहा है कि हे प्रभु ! तेरे मेरे और मेरे तेरे बीच कैसा है ? अर्थात दोनो के बीच सोने और पानी जैसा ही फरक है, जिस प्रकार सोने से असंख्य रूप के आभूषण बन जाते मगर वास्तव में रहता है सोना ही, इसी तरह सागर के पानी में असंख्य छोटी-बड़ी लहरें निकलती हैं,उफनती हैं और पुनः बीच में ही समा कर पानी डूबकर सागर बन जाती हैं वैसे ही मेरी आत्मा है, ये भी आप से निकली हुई है और आप के सागर रूपी परम आत्मा ...

गुरु रविदास और जाति तोड़ो क्रान्ति।।

।।गुरु रविदास और जाति तोड़ो क्रान्ति।। गुरु रविदास जी महाराज इस बात से क्षुब्ध थे कि, मूलनिवासी समाज को जातियों के जाल में उलझा कर गुलाम बनाया हुआ है।मूलनिवासी भारतीयों को वर्णो,जातियों में विभाजित करके, जिस ढंग से एक दूसरे से उच्च बनाकर,जो कंक्रीट की अभेद्य दीवारें, मनुवाद ने खड़ी की थी,उनसे मूलनिवासी, कालांतर में जाकर आपस में ही रोटी बेटी का रिश्ता तक,त्याग बैठे।6743 जातियों में चमार,चूहड़ा जाति को सबसे निचले पायदान पर रखा गया, जिस जाति को, गाली के रूप में भी अक्सर प्रयोग किया जाता रहा।सारे भारत को स्वच्छ रखने वाली जातियों के कर्मियों को सड़कों पर, चलने से भी धरती मटमैली, गन्दी, अपवित्र मानी जाती थी, जिसके कारण,इन जातियों को,चलते समय भी अपने पांवों के निशान मिटाने के लिए, कमर के पीछे झाड़ू बांधना पड़ता था ताकि उनके पांवों के निशान मिट जाएँ।इसी घोर अन्याय,अत्याचार और अनाचार को आदिपुरुष सहन नहीं कर पाए जिनके कल्याणार्थ, इसी चमार जाति में गुरुओं के गुरु रविदास जी अवतरित हुए।उन्होंने बड़े गर्व और स्वाभिमान से कहा कि:---- ""मेरी जाति कुटबॉण्डला ढोर ढोबन्ता। गुरु रविदास जी महाराज अपना प...

।।गुरु रविदास और जाति तोड़ो क्रान्ति।।

।।गुरु रविदास और जाति तोड़ो क्रान्ति।। गुरु रविदास जी महाराज इस बात से क्षुब्ध थे कि, मूलनिवासी समाज को जातियों के जाल में उलझा कर गुलाम बनाया हुआ है।मूलनिवासी भारतीयों को वर्णो,जातियों में विभाजित करके, जिस ढंग से एक दूसरे से उच्च बनाकर,जो कंक्रीट की अभेद्य दीवारें, मनुवाद ने खड़ी की थी,उनसे मूलनिवासी, कालांतर में जाकर आपस में ही रोटी बेटी का रिश्ता तक,त्याग बैठे।6743 जातियों में चमार,चूहड़ा जाति को सबसे निचले पायदान पर रखा गया, जिस जाति को, गाली के रूप में भी अक्सर प्रयोग किया जाता रहा।सारे भारत को स्वच्छ रखने वाली जातियों के कर्मियों को सड़कों पर, चलने से भी धरती मटमैली, गन्दी, अपवित्र मानी जाती थी, जिसके कारण,इन जातियों को,चलते समय भी अपने पांवों के निशान मिटाने के लिए, कमर के पीछे झाड़ू बांधना पड़ता था ताकि उनके पांवों के निशान मिट जाएँ।इसी घोर अन्याय,अत्याचार और अनाचार को आदिपुरुष सहन नहीं कर पाए जिनके कल्याणार्थ, इसी चमार जाति में गुरुओं के गुरु रविदास जी अवतरित हुए।उन्होंने बड़े गर्व और स्वाभिमान से कहा कि:---- ""मेरी जाति कुटबॉण्डला ढोर ढोबन्ता। गुरु रविदास जी महाराज अपन...

।।गुरु रविदास और हरि सों हीरा छाँड़ि कर।।

।।गुरु रविदास और हरि सों हीरा छाँड़ि कर।। गुरु रविदास जी के नाम पर,चलने वाली दुकानों में, माल किसी और ही सिद्ध, देवी,कुलदेवता का बिकता है और उन्हीं का वहां निवास है,परंतु,सँगत को आकर्षित करने के लिए, वाणी गुरु रविदास जी और गुरुओं की पढ़ी जाती है।सत्संग शुरू करते ही सत्संगकारों को मजबूरी में कहना यही पड़ता है कि:--- ""हरि सो हीरा छाँड़ि के करै आनकी आस, ते नर दोजख जाएंगे सत भाखै रविदास"" सबसे पहले सभी कथावाचक गुरु रविदास जी महाराज के प्रसिद्ध और अध्यात्म ज्ञान के सर्वोच्च, सार तत्व के उच्चारण के,साथ ही सत्संग की शुरुआत करते हैं मगर इस पवित्र ज्ञान की कभी कोई व्याख्या नहीं की जाती, वस केवल गुरु रविदास जी को खुश करने के लिये, ये बताकर कि हम आपके पवित्र और श्रेष्ठ सार तत्व से, सत्संग का आगाज करके, अपना दायित्व अदा कर रहे हैं, सत्संग के प्रारंभ की रश्म अदा कर रहे हैं।उसके बाद ही,अगले प्रवचन की अगली कड़ियाँ चलती है,वाणी तो हमेशा ही गुरु रविदास जी की पढ़ी जाएगी,गाई जाए गी, मगर जब गुरुओं की कोई अति विष्मयकारी और चमत्कारी घटना की व्याख्या की जाती तो, महात्मा महोदय  जयकारा बुलाते है...

।।गुरु रविदास जी और समाजवाद व सुरक्षा।।

।।गुरु रविदास जी और समाजवाद व सुरक्षा।। गुरु रविदास जी महाराज के आविर्भाव तक, विश्व में अत्याचारियों का निरंकुश शासन चलता आ रहा था। तानाशाहों की तानाशाही और बादशाहों को बादशाही ने प्रजा का जीना दूभर कर रखा था।जिसके खिलाफ कहीं कोई दलील अपील नहीं हुआ करती थी, जिस किसी ने आलोचना करने की हिम्मत जुटाई वही मौत के मुंह में चला जाता था। राजतन्त्र ने विज्ञान की प्रगति को स्थिर कर रखा था, जिस किसी ने, विज्ञान का सहारा लेकर, वैज्ञानिक विचारधारा को व्यक्त किया, वही मौत के घाट उतार दिया जाता था।मंसूर ने "अहं ब्रह्म अस्मि"कहा और सूली पर लटका दिया, यही हाल ईशू मसीह का हुआ, कई और भी कई गुरुओं काऐसा ही हाल हुआ मगर गुरु रविदास जी के सामने सभी बौने पड़ गए,सभी गुरु रविदास जी महाराज को  मौत के घाट उतारने के लिए बहुत प्रयास करते रहे मगर गुरु जी के समक्ष सभी ओंधे मुंह गिरते गए,उनकी आलौकिक शक्ति के सामने, उनकी एक भी नहीं चली,जिस कारण, निरंकुश बादशाहों ने भी उनके सामने हाथ खड़े कर, आत्मसमर्पण कर दिए थे।हांरने के बाद वे विवश होकर गुरु जी को अपना राजगुरु बनाते गए। जिस बेगमपुरा की वे कल्पना किया करते उसे,...

।गुरु रविदास और बादशाह बाबर का समाजवाद।

।गुरु रविदास और बादशाह बाबर का समाजवाद। गुरु रविदास जी महाराज ने,जब बादशाह बाबर का हर्ट ट्रांसप्लांट किया था, तब से ही बाबर ने दिल्ली को आदर्श राज्य बनाने के लिये ऐतिहासिक कदम उठाना शुरू कर दिये थे, जिस का श्रेय केवल गुरु रविदास जी महाराज को ही जाता है मग़र किसी भी ईमानदार साहित्यकार ने, गुरु रविदास जी के इस ऐतिहासिक और असंभव कार्य को इतिहास का हिस्सा नहीं बनाया,अब पचास साल बाद युवा रिसचर्सज ने, गुरु रविदास जी के इतिहास को ढूंढने का प्रयास किया है।डाक्टर हरबंस मुखिया जी ने भले ही गुरु रविदास जी का नाम नहीं लिया है, मगर लक्ष्यार्थ से,यही ध्वनि निकल रही है कि, बादशाह बाबर का दिल बदल गया था और भारत के इतिहास में आज, बादशाह बाबर के स्वभाव में हुए,परिवर्तन के बारे में, साहित्य के शोध छात्र, स्कालर, गुरु रविदास जी का नाम सवर्ण अक्षरों में दर्ज कर रहे हैं। गुरु रविदास जी महाराज ने, बेगमपुरा शहर की कल्पना करते हुए, बादशाह बाबर को भी कहा था:-----               ।।शव्द।। बेगमपुरा शहर को नाऊँ। दुखु आंदोहू नहीं तिह ठाऊँ।। नां तसवीस खिराजु ना मालु।। खउफ ना खता ना तरा...

।गुरु रविदास और बादशाह व समाजवाद।।

।।गुरु रविदास और बादशाह व समाजवाद।। गुरु रविदास जी की धरणा है कि, विश्व में सभी सुखी रहें, किसी भी इंसान को दैहिक मानसिक, पीड़ा संतप्त ना करे, जिसके लिए उन्होंने महत्वकांक्षी योजना को लागू करने के आदेश तत्कालीन शासकों को दिये थे, जिन्होंने वे आदेश अक्षरसः लागू करके अपना नाम इतिहास मेँ अमर किया भी कर लिया था।गुरु जी का संविधान कहता है:---- ""बेगमपुरा शहर को नांऊँ,"" ""दुखु अंदोहू नाहिं तिह ठाऊँ"" बादशाह सिकन्दर लोदी, बादशाह बाबर इस संविधान को लागू करने वाले,जीते जागते प्रमाण मौजूद हैं, जिन्होंने उपरोक्त संविधान को तत्काल प्रभाव से लागू किया था। बादशाह सिकन्दर लोदी ने तो तत्काल प्रजा को मुफ्त लंगर लगा दिए थे,टेक्स कम कर दिए थे, न्यायाधीश की नियुक्ति करके,कानून का शासन लागू कर दिया था।भारत में पहली बार न्यायाधीश की नियुक्ति की गई थी।बादशाह जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर के विषय में इतिहासकार हरबंश मुखिया ने कहा है कि, बाबर का व्यक्तित्व संस्कृति, साहसिक, उतार-चढ़ाव और उस की सैन्य प्रतिभा जैसी खूबियों से भरा हुआ है।मुखिया कहते हैं, कि अगर बाबर भारत ना आता, तो...