।।गुरु रविदास और हरि सों हीरा छाँड़ि कर।।

।।गुरु रविदास और हरि सों हीरा छाँड़ि कर।।
गुरु रविदास जी के नाम पर,चलने वाली दुकानों में, माल किसी और ही सिद्ध, देवी,कुलदेवता का बिकता है और उन्हीं का वहां निवास है,परंतु,सँगत को आकर्षित करने के लिए, वाणी गुरु रविदास जी और गुरुओं की पढ़ी जाती है।सत्संग शुरू करते ही सत्संगकारों को मजबूरी में कहना यही पड़ता है कि:---
""हरि सो हीरा छाँड़ि के करै आनकी आस,
ते नर दोजख जाएंगे सत भाखै रविदास""
सबसे पहले सभी कथावाचक गुरु रविदास जी महाराज के प्रसिद्ध और अध्यात्म ज्ञान के सर्वोच्च, सार तत्व के उच्चारण के,साथ ही सत्संग की शुरुआत करते हैं मगर इस पवित्र ज्ञान की कभी कोई व्याख्या नहीं की जाती, वस केवल गुरु रविदास जी को खुश करने के लिये, ये बताकर कि हम आपके पवित्र और श्रेष्ठ सार तत्व से, सत्संग का आगाज करके, अपना दायित्व अदा कर रहे हैं, सत्संग के प्रारंभ की रश्म अदा कर रहे हैं।उसके बाद ही,अगले प्रवचन की अगली कड़ियाँ चलती है,वाणी तो हमेशा ही गुरु रविदास जी की पढ़ी जाएगी,गाई जाए गी, मगर जब गुरुओं की कोई अति विष्मयकारी और चमत्कारी घटना की व्याख्या की जाती तो, महात्मा महोदय  जयकारा बुलाते हैं""बोलो ब्रह्मा की जय"" बोलो, ""विष्णु भगवान"" की जय, जो बेचारे समुन्द्र में लक्ष्मी के साथ तैर रहे होते हैं, उंनके कानों को परेशान करते हैं।महेश जी सैर कर रहे थे, नारद जी इनको सी आई डी दे रहे होते,सत्संग में दस गुरुओं का जिक्र भी हजारों बार किया जाता,वाणी गुरु रविदास जी की पढ़ी और गाई जाती मगर पंजाब में गुरु रविदास जी के पैरोकार यही कहते हैं:---
""बोले सो निहाल,सतश्रीआकाल""।
जबकि किसी भी सिख गुरुद्वारे में कोई सिख ये कदाचित नहीं कहता है कि:----
""बोले सो निरभै,""
सतगुरु रविदास महाराज जी की जै।
गुरु तो गुरु ही हैं, मगर मनुवादी लोग तो कभी भी गुरु रविदास जी का जयकारे तो बिल्कुल ही करते नहीं,कभी सतगुरु कबीर साहिब जी का जयकारा नहीं छोड़ते हैं, कभी सतगुरू नामदेव जी का जयकारा नहीं छोडते, कभी वाल्मीकि महाऋषि को महाऋषि तक नहीं बुलाते,बुलाना तो दूर की बात अपने सत्संग,कथा कीर्तन,में इन का कभी जिक्र तक नहीं करते,कभी इन गुरुओं के भंडारे नहीं खाते,कभी इन गुरूओं की शोभायात्राओं में भाग लेकर साथ चलते नहीं,मगर गुरु रविदास जी के नाम पर दुकानें चलाने वाले, जब तक ब्रह्मा, विष्णु महेश, नारद और तेती करोड़ देवों का नाम नहीं लेंगे,उनके पास मत्था नहीं रगड़ेंगे, इन्होंने शूद्रों की तवाही की है, उनके सत्संग में ये ढंगी सत्संग कर्ता, वर्णन नहीं करते तब तक इनके पेट का खाना हजम नहीं होता है। ये लोग सँगत तो गुरुओं के नाम पर बने मन्दिरों में, गुरुओं के नाम पर बुलाते हैं, मगर प्रचार करते हैं, मनुवादी पीरों, पैग़ंबरों का जिन्होंने हमारे सम्राटों, शिव आदि,महाराजा बलि को छला और भीख मांगने के नाम राजपाठ छीन लिया था, महामानव महिसासुर आदि को छल से मरवाया ,महाराजा नंद को विष कन्याओं से छल से मरवाया था, चेतनानंद को जेल में डलवाया था, शंबूक महाऋषि को मारा था, महाराजा वृहद्रथ को मरवाया था, गुरु रविदास जी को जेल में डलवाया था, सतगुरू कबीर साहिब को पानी में डुबाया था, हाथियों के पांवों में डलवाया था,आदि अनेकों ही मानसिक शारीरिक यातनाएँ दी थी,राजपूत वीरांगना मीराबाई जी सत्य को जान कर चमार गुरु के साथ भजन बन्दगी करने लगी तो अपनी ही बेटी को जहर दिया,नाग भेजा, नदी में वहाया, गुरु रविदास जी के सत्संग में ही सोहरे, पीयरे कत्ल करने के लिये बैठ गए, मगर जिन गुरुओं ने सत्य को प्रकट किया, उनका नाम के जयकारे तो क्या छोड़ने,इन शूद्र गुरुओं का नाम तक ये मनुवादी कभी नहीं लेते मगर गुरुओं के नाम पर पेट भरने वाले शूद्र महात्मा, यदि इन मनुवादी नायकों का नाम जब तक ना लें तब तक ये धन्य नहीं होते, तब तक खाना हजम ही नहीं होता है।कथावाचक भी इन्हीं मनुवादियों के ब्रह्मा के नाम से शादी व्याह और प्रत्येक अनुष्ठान की शुरुआत:-""गुरु रे ब्रह्मा"" से ही करते हैं, जिनका उनके ही मनुवादी वच्चे मंदिर तक नहीं बनाते,पूजा अर्चना तो दूर की बात रही मगर मुलनिवासियों के कथावाचक तो ब्रह्मा का नाम लेकर ही प्रत्येक अनुष्ठान का आरंभ,""ॐ गणेशाय नमः"" और""गुरु रे ब्रह्म"" नहीं करेंगे तो उनकी पंडिताई का अहसास किसी को नहीं होता।जिन जिन किताबों में तेती करोड़ देवों की करतूतों का वर्णन किया गया है,उन्हें पढ़ने से लगता है कि,ये लोग तो धरती पर मौज मस्ती मनाने आया करते थे,फिर देव लोकों को वापस लौट जाते क्योंकि सर्दियों में कैलाश पर्वत पर वर्फ़ जमी रहती है इसीलिए सभी मैदानी इलाकों में उतर आते हैं, शूद्र गुरु तो हर मौसम में यहीं रहते हैं,भगवान सिद्ध चानो जी महाराज तो हमेशा भारत में ही रहते हैं क्योंकि उन्हें तो हर समय शूद्रों की दुखभरी हररोज ही शिकायतें सुननी पड़तीं है, क्योंकि शूद्रों के ऊपर तेती करोड़ देवोँ के अनुयायी हररोज तशदित, जुल्म, अत्याचार, व्याभिचार, अन्याय, खूनखराबा करते हैं, जिनकी फरियाद पंच, प्रधान, जज और पुलिस भी नहीं सुनते, फिर इन सभी शूद्रों को भगवान सिद्ध चानो के दरबार में मुर्गा, मुर्गी, बकरा चढ़ाने की फरियाद करके, अपनी अर्जी देनी पड़ती है, फिर जब उनके दुखी वच्चे, उन्हें उनकी मेहनत भी देने का बायदा करते हैं, तो फिर वे साथ साथ ही,इनकी सभी फरियादों को भी क्रमानुसार प्रायोरिटी के अनुसार निपटाते भी हैं, ऐसी सजा देते कि अगर कोई सॉरी ना कह कर, राजीनामा ना करें तो मौत के घाट उतार के शूद्रों की फरियाद पूरी करते हैं, जिन की पूजा अर्चना, जिनका जिक्र गुरुओं के मंदिरों में, गुरुओं के नाम पर धंधा चलाने वाले महापुरुष कभी नहीं करते।
जब गुरुओं के घरों में ही, गुरुओं के साथ दगा हो, धोखा हो, कपट हो,हेराफेरी हो फिर इन मुलनिवासियों की सुरक्षा कौन करेगा ? कौन इनका सम्मान करेगा। जब तक शूद्रों को अपने परिपूर्ण गुरुओं के साथ किया जाने वाला छल, प्रपंच,फरेब धोखधड़ी बन्द नहीं होगी,तेती करोड़ देवोँ ने, जिन्होंने हमारे साथ छल किये,धोखे किये और गद्दारी की है,उनको नहीं छोड़ेंगे तब तक मुलनिवासियों का कल्याण संभव नहीं,""हरि सो हीरा छाँड़ि करि"" गीत गाना और अनुष्ठान का उदघाटन करने की रश्म अदा करना बेईमानी होती है,सभी गुरुओं से धोखा होता है, सँगत से छलकपट होता है और अपने समाज और अपने गुरुओं का अपमान होता है,जिससे बचना चाहिए, तभी हमारा सम्मान बढ़ेगा।
मेरी सभी मुलनिवासियों और साधु, सन्तों महापुरुषों से विनम्र अपील है, कि जो भी अनुष्ठान करवाए जाएं, उनके प्रारंभ में सभी गुरुओं के गुरु रविदास जी की वाणी में से मंगलाचरण को लेकर उच्चारण की शुरुआत करें और सभी गुरुओं की सर्व सांझी गुरवाणी में से शादी, ब्याह और अन्य अनुष्ठान के प्रसंगों में से ही, सत्संग शुरू करें अन्यथा आदिपुरुष, कथावाचकों को कभी माफ नहीं करेंगे।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुकला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
जुलाई 11,2020।

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