गुरु रविदास और जाति तोड़ो क्रान्ति।।

।।गुरु रविदास और जाति तोड़ो क्रान्ति।।
गुरु रविदास जी महाराज इस बात से क्षुब्ध थे कि, मूलनिवासी समाज को जातियों के जाल में उलझा कर गुलाम बनाया हुआ है।मूलनिवासी भारतीयों को वर्णो,जातियों में विभाजित करके, जिस ढंग से एक दूसरे से उच्च बनाकर,जो कंक्रीट की अभेद्य दीवारें, मनुवाद ने खड़ी की थी,उनसे मूलनिवासी, कालांतर में जाकर आपस में ही रोटी बेटी का रिश्ता तक,त्याग बैठे।6743 जातियों में चमार,चूहड़ा जाति को सबसे निचले पायदान पर रखा गया, जिस जाति को, गाली के रूप में भी अक्सर प्रयोग किया जाता रहा।सारे भारत को स्वच्छ रखने वाली जातियों के कर्मियों को सड़कों पर, चलने से भी धरती मटमैली, गन्दी, अपवित्र मानी जाती थी, जिसके कारण,इन जातियों को,चलते समय भी अपने पांवों के निशान मिटाने के लिए, कमर के पीछे झाड़ू बांधना पड़ता था ताकि उनके पांवों के निशान मिट जाएँ।इसी घोर अन्याय,अत्याचार और अनाचार को आदिपुरुष सहन नहीं कर पाए जिनके कल्याणार्थ, इसी चमार जाति में गुरुओं के गुरु रविदास जी अवतरित हुए।उन्होंने बड़े गर्व और स्वाभिमान से कहा कि:----
""मेरी जाति कुटबॉण्डला ढोर ढोबन्ता।
गुरु रविदास जी महाराज अपना परिचय देते हुए फरमाते हैं कि,मेरी जाति चमार, कुटबांडला है, जिस जाति के लोग मरे हुए पशुओं को, पशुओँ के शमशान घाटों पर ले जाने का पवित्र काम करते हैं।गुरु रविदास जी ने ये तीखा,प्रचण्ड उतर मनुवादियों को उस समय दिया था, जब कि इस जाति का नाम भी गाली समझा जाता था,कोई भी शूद्र वर्ण का व्यक्ति खुल कर, अपने आप को चमार नहीं कहता था,आज भी कोई नहीं कहता है और शायद ही भविष्य में भी निःसंकोच कहने की कोई हिम्मत करेगा। गुरु रविदास जी ने,अपनी क्रांतिकारी वाणी से मनुवाद के थोथे अहं की चीरफाड़ और पोस्टमार्टम करके, ब्राह्मणवाद की दूषित जातिप्रथा के किले को हिला कर रख दिया था,जिससे मूलनिवासियों का पस्त हौंसला बुलन्द होता ही गया, शूद्रों में व्याप्त हीनता की भावना समाप्त होने लगी,लोग अपनी जाति का नाम स्वाभिमान से लेने लगे हैं।
जब कबीर साहिब की नोकझोंक, ब्राह्मण से हो रही थी, तब कबीर साहिब बड़े ही स्वाभिमान से कहने लगे:----
""तूँ बाहमना,मैं कांशी का जुलाहा""
""बुझहू मोर गियाना""
कबीर जी फरमाते हैं कि,हे बाह्मन! तूँ तो ब्राह्मण है मगर मैं भी कांशी का रहने वाला जुलाह हूँ,तूँ मेरे आध्यात्मिक ज्ञान को समझ।सतगुरू कबीर जी ने निसंकोच हो कर ब्राह्मण को अपना परिचय देते हुए,गर्व से कहा था कि, मैं जाति का ज्ञानवान जुलाहा हूँ।उन्होंने भी तभी, इतना होंसला बुलन्द करके कहा था, जब गुरु रविदास जी ने, खुद अपने लिए, खलास चमारा कहा था।गुरु जी ने अपने भाईचारे के बारे में भी गर्व से कहा था:-----
""नीतिहिं बनारसी आसपासा""।।
मेरे पड़ोसी,मेरे जात बिरादरी के लोग, बनारस के आसपास, मरे हुए पशुओं को ढोहते हैं।वास्तव में विदेशी यूरेशियन आर्यों ने,भोलेभाले, निष्कपट,चँवरवंशी राजपूतों को, चमार की संज्ञा देकर,छलबल से इतना गिरा दिया था कि,उन्हें पेट भरने के लिए अत्यंत निम्नतम व्यावसाय करने पर विवश कर दिया था।
""अब विप्र परधान तिहि करहि डंडौउति""
""तेरे नाम शरणाई रविदासु दासा""।।
गुरु रविदास जी, आदिपुरुष द्वारा प्रदत्त दैवीय शक्तियों और अपनी भक्ति की शक्ति के कारण, संसार मे इतने पूजनीय हो गए हैं कि,अब ब्राह्मणों के प्रधान अर्थात ब्राह्मणों के सर्वश्रेष्ठ, प्रकाण्ड विद्वान भी उनके चरण कमलों पर नतमस्तक हो कर दण्डवत, प्रणाम करते हैं।वे ईश्वर की स्तुति करते हुए फरमाते हैं कि, हे परम पिता परमेश्वर, जब से आप का दास, रविदास आपकी शरण में आया है, तब से ही,विप्र और ब्राह्मण मेरे समक्ष दंडवत हो रहे हैं।
गुरु रविदास जी महाराज, युग प्रवर्तक महापुरुष, भारत की जाति व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिये ही,भारत भूमि पर अवतरित हुए थे, क्योंकि यही वह देश है जहाँ पर इंसान को गले से नहीं लगाया जाता यहाँ तक कि कुत्ते को ब्राह्मणवादी लोग अपने विस्तरे पर सुला लेते,जबकि कुत्ता उनकी कोई सेवा नहीं करता, बल्कि उलटे उनसे अपनी गंदगी साफ करवाता है, शूद्र, गुलाम बन कर दिनरात मनुवाद की सेवा करता है, जो मूलनिवासियों के साथ बड़ा अन्याय होता आया था, जिसे समाप्त करने और करवानेके लिये ही गुरु रविदास जी ने जाति तोड़ो समाज जोड़ो क्रान्ति शुरू की थी।।सोहम।जय गुरुदेव।।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
जुलाई 12,2020।

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