गुरु रविदास और आत्मा परमात्मा मिलन।।

।।गुरु रविदास जी और आत्मा-परमात्मा मिलन।।
गुरु रविदास जी महाराज की अटूट निरन्तर साधना, तपस्या, रंग ला चुकी थी, उन्होंने, आदिपुरुष के जब साक्षात दर्शन कर लिये तब उन्होंने कहा:-----
            ।।शव्द।।
तोही मोही, मोही तोही, अंतरु कैसा।।
कनक कटिक जल तरंग जैसा।।
जउ पै हम ना पाप करंता अहे अनंता।।
पतित पावन नामु कैसे हुंता।।रहाउ।।
तुम जउ नाईक आछहु अंतरजामी।।
प्रभ ते जनु जानी जै जन तेसुआमी।।
सरीरु अराधै मो कउ विचारु देहू।।
रविदास समदल समझावै कोउ।।
इस शव्द से पूर्णरूपेण स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि, गुरु रविदास जी को प्रभु मिलन हो गया था। उन्होंने आदिपुरुष के दर्शन कर लिए थे, तभी उन्होंने कहा है कि हे प्रभु ! तेरे मेरे और मेरे तेरे बीच कैसा है ? अर्थात दोनो के बीच सोने और पानी जैसा ही फरक है, जिस प्रकार सोने से असंख्य रूप के आभूषण बन जाते मगर वास्तव में रहता है सोना ही, इसी तरह सागर के पानी में असंख्य छोटी-बड़ी लहरें निकलती हैं,उफनती हैं और पुनः बीच में ही समा कर पानी डूबकर सागर बन जाती हैं वैसे ही मेरी आत्मा है, ये भी आप से निकली हुई है और आप के सागर रूपी परम आत्मा के बीच ही समा जाएगी, इसीलिए तेरे मेरे और मेरे तेरे बीच कोई अंतर नहीं है। हे अनंत ईश्वर जी! जब हम पाप कर्म ही ना करें, तो आपको पतित पावन कौन कहेगा? हे आदिपुरुष! आप सभी प्राणियों  की अन्तरात्मा की आवाज को जानने वाले अंर्तयामी हैं। दास्यभाव की तरह हमारा आपस में संबंध है, आप सबके ही स्वामी होकर हमारी आत्मा की समस्त बातों को जानते हैं, इसलिए आप के संसर्ग से हम जाने समझे जाते हैं और हमारे कारण आप का सम्मान होता है। हे मेरे मालिक !मुझे इस प्रकार के ज्ञान की बख्शिश कर दो कि मैं आप की आराधना करता रहूँ। मेरा भी संयोग ऐसे संत महापुरुषों से करवाओ, जो मुझे समान नजर से देखने और समरस होकर, संगत को आत्मा और परमात्मा के बारे में बता सकूं। गुरु रविदास जी अगले शव्द में भी आत्मा और परमात्मा के बारे में कहते हैं:----
                 ।।शव्द।।
तुम चन्दन हम बापुरे संगी तुमारे बासा।
नीच रुखते उच्च भए हैं,गन्धसुगन्ध निवास
माधउ सत्संगति सरनि तुम्हारी।।
हम अउगनतुम उपकारी।।रहाउ।।
तुम मख़लूत सुपेद सपीअल, हम बापुरे जस कीरा।।
सत्संगति मिली रहीए, माधउ जैसे मधुप मखीरा।।
जाति ओछी पाति ओछी, ओछा जनम हमारा।।
राजा राम की सेव ना किन्हीं, कहि रविदास चमारा।।
गुरु रविदास जी प्रभु मिलन के बाद की स्थिति का चित्रण करते हुए कहते हैं कि, हम तो एरण्ड के पौधे की तरह नीरस हैं और आप तो चन्दन हैं जिसकी सुगंध से एरण्ड भी सुगन्धित हो जाता है। हमारे छोटे पौधे भी आपकी शरण में, रह कर उच्च सम्मान प्राप्त किए हुए। है माधो! हम आपकी सत्संगति में रहकर, अपने अबगुण रहित हो गए हैं, ये आपका हम पर बहुत बड़ा उपकार करने वाले उपकारी है। आप सफेद पीले और काले (मखतूल) रेशम हो और हम उसमें वास करने वाले कीड़े की तरह वासनाओं से भरे हुए सांसारिक प्राणी हैं। हमें ऐसा सत्संग दो कि, हम मधुमखियों की तरह आपस में मिलकर, आपके नियंत्रण में रह सकें। मेरे जातिपाति और जन्म भी प्रशंसनीय नहीं है, ना ही आपकी सेवा, भक्ति की है।
गुरु रविदास जी महाराज ने, जो सत्य उद्घाटित किया है, वह हम सांसारिक लोगों का ही अपने लक्ष्यार्थ से, प्रभु के समक्ष प्रस्तुत किया है। वे मानव जाति के कल्याण केलिए ही, अपने आप को हम मानव जाति के तुल्य प्रस्तुत करते है, जो उनकी हमारे प्रति सद्भावना और दया ही है।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।


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