।गुरु रविदास और बादशाह व समाजवाद।।

।।गुरु रविदास और बादशाह व समाजवाद।।
गुरु रविदास जी की धरणा है कि, विश्व में सभी सुखी रहें, किसी भी इंसान को दैहिक मानसिक, पीड़ा संतप्त ना करे, जिसके लिए उन्होंने महत्वकांक्षी योजना को लागू करने के आदेश तत्कालीन शासकों को दिये थे, जिन्होंने वे आदेश अक्षरसः लागू करके अपना नाम इतिहास मेँ अमर किया भी कर लिया था।गुरु जी का संविधान कहता है:----
""बेगमपुरा शहर को नांऊँ,""
""दुखु अंदोहू नाहिं तिह ठाऊँ""
बादशाह सिकन्दर लोदी, बादशाह बाबर इस संविधान को लागू करने वाले,जीते जागते प्रमाण मौजूद हैं, जिन्होंने उपरोक्त संविधान को तत्काल प्रभाव से लागू किया था। बादशाह सिकन्दर लोदी ने तो तत्काल प्रजा को मुफ्त लंगर लगा दिए थे,टेक्स कम कर दिए थे, न्यायाधीश की नियुक्ति करके,कानून का शासन लागू कर दिया था।भारत में पहली बार न्यायाधीश की नियुक्ति की गई थी।बादशाह जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर के विषय में इतिहासकार हरबंश मुखिया ने कहा है कि, बाबर का व्यक्तित्व संस्कृति, साहसिक, उतार-चढ़ाव और उस की सैन्य प्रतिभा जैसी खूबियों से भरा हुआ है।मुखिया कहते हैं, कि अगर बाबर भारत ना आता, तो भारतीय संस्कृति के इंद्रधनुष के सातरंग फीके रहते,उनके कथन के अनुसार भक्ति, संगीत, चित्रकला, वास्तुकला, कपड़े और भोजन के मामलों में मुगल बाबर के योगदान को नकारा नहीं जा सकता।
बाबर के बारे में दिलचस्प बातोँ पर एक नजर:----मुखिया कहते हैं, कि यह आम गलफहमी है, कि अयोध्या की विवादास्पद बाबरी मस्जिद बाबर ने बनबाई थीं।उनके मुताबिक बाबरी मस्जिद का ज़िक्र उनके जिंदा रहने तक या उसके मरने के कई सौ साल तक नहीं मिलता है।
बाबर की पानीपत जीत:---बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई की जीत की खुशी में पानीपत में ही एक मस्जिद बनबाई थी जो आज भी खड़ी है।
बाबर का बाबरनामा:---बाबर दुनियां के पहले बादशाह और शासक हुए, जिन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी थी। बाबरनामा उनके जीवन की नाकामियों और ढेर सारी कामयाबियों से भरा पड़ा हुआ है।
बाबर का जनून:-----हरबंस मुखिया जी के अनुसार बाबर की सोच थी, कि कभी हार मत मानों, उन्हें समरकन्द, उज्बेकिस्तान हासिल करने का जनून सवार था। उसने समरकन्द पर तीन बार कब्जा किया था, लेकिन तीनों बार ही शहर से हाथ धोना पड़ा और  अगर वह समरकन्द के राजा बने रहते तो शायद काबुल और भारत पर राज करने की कभी नहीं सोचते। भले ही बाबर को जो सम्मान, भारत में मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला मगर उनके पोते अकबर को मिला है।
इतिहासकार, हरबंस मुखिया, की रिसर्च यह स्पष्ट करती है कि, बाबर जब तक भारत का शासक रहा,उसने गुरु रविदास जी के धर्मनिरपेक्ष संविधान के अनुसार ही शासन किया और भारत को अपनी ही मातृभूमि समझ कर विकास किया और विश्व में प्रसिद्धि भी हासिल की।
बाबर अति खूंखार, क्रूर और अत्याचारी  व्यक्ति था मगर उसका हिरदय परिवर्तन किस प्रकार हुआ, जिस पर, कभी भी, किसीने भी प्रकाश नहीं डाला। जिस खूनी बादशाह ने, पानीपत की लड़ाई में, पहली बार तोप से, राजपूतों का बड़ी बेरहमी से संहार किया था,उस की आत्मा एक दम किस प्रकार बदल गई, उसका कार्य करने का तरीका किस प्रकार बदला ?
इस परिवर्तन केलिये केवल गुरु रविदास जी महाराज की फटकार ही थी, जिसमें गुरु जी कहा था, बाबर तुझे पानीपत में निहत्थे राजपूतों का कत्ल करके क्या मिला है ?  महाराणा सांगा को ध्वस्त करके तुझे क्या मिला ? जो तूने, पापकर्म किए हैं, उसकी सजा तो तुझे मालिक अवश्य देगा, ये मत सोच, कि तूँ दिल्ली फतेह कर चुका है, ये राजपाठ तेरे साथ नहीं जाएंगे, ये धन दौलत दिल्ली में ही रह जाएगी, मगर कर्मों का हिसाब किताब चुकाना ही पड़ेगा। बादशाह बाबर,गुरु रविदास जी महाराज की कड़ी फटकार सुन कर, बड़ा लज्जित हुआ था और गुरु जी से गुरुमन्त्र लेकर, शासन करने के निर्देश लेकर,पुनः वापस दिल्ली आ गया था और आकर बाबर ने गुरु रविदास जी महाराज के कथनानुसार ही, बेगमपुरा वसाने का काम शुरू किया था।।सोहम।। जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
जुलाई 8,2020।

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