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।।नागर जना मेरी जाति बिखिआत चमारं।।

     ।।नागर जना मेरी जाति बिखिआत चमारं।।                  ।।राग मल्हार।। गुरु रविदास जी महाराज ने, यह शब्द मल्हार राग में लिखा है। मल्हार राग ऐसा प्यारा राग है जिस को सुन कर के खूंखार जानवर भी पिघल कर शांत हो जाते हैं अर्थात मल्हार राग शांति का प्रतीक है। जब गुरु रविदास जी महाराज को ब्राह्मण अनेकों यातनाएं दे कर और राजाओं, महाराजाओं और बादशाहों के द्वारा दिला कर बुरी तरह से पराजित हो गए और विवश हो कर गुरु रविदास जी के चरण कमलों पर गिर कर बड़े आदर सम्मान और शांति से ब्राह्मणों के प्रधान और मुखिया उन की शरण में आ कर नतमस्तक हो कर, उन के अनुयायी बन गए, तब गुरु रविदास जी महाराज ने उन को माफ करते हुए "सोहम" शब्द की अनुपम दात देदी। जब ब्राह्मण, वानियें, राजपूत गुरु जी के शिष्य बन गए, तब भी गुरु जी ने, अपनी जाति और वर्ण को बड़े गर्व और स्वाभिमान से लोगों के सामने प्रस्तुत किया था, जिस का वर्णन गुरु महाराज जी निम्नलिखित शब्द में करते हैं :--- नागर जना मेरी जाति बिखिआत चमारं।। हिरदै राम गोविंद गुन सारं।...

।।सतजुग सतू तेता जगी।।

                ।।सतजुग सतु तेता जगी।।                  ।।राग गौड़ी वैरागण।। गुरु रविदास जी महाराज ने हिंदू धर्म ग्रंथों की चीर फाड़ कर के बुरी तरह से तार-तार कर दिया था। ब्राह्मणों ने तेती करोड़ देवी देवताओं का निर्माण कर के उन के बीच विष्णु को सर्वश्रेष्ठ अवतार घोषित किया हुआ है। वह बार-बार भिन्न-भिन्न नामों से जन्म लेता रहता है। ब्राह्मणों ने ही काल विभाजन कर के समय को भी चार भागों में बांट कर के इन का नामकरण सतियुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग रखा हुआ है। ऐसा काल विभाजन विश्व के किसी भी देश में नहीं हुआ है और ना ही विश्व के किसी विद्वान ने इसे मान्यता दी हुई है।ब्राह्मणों ने काल विभाजन कर के तप, तपस्या, भक्ति, साधना के रंग ढंग, विधि विधान भी हर युग में अलग-अलग निर्धारित किये हुए हैं, जिन का कोई तर्कपूर्ण आधार नहीं है। सतियुग : सतियुग में तिलकधारी ब्राह्मण ही शिक्षा ग्रहण करेंगे और पूजा पाठ में कुतर्कपूर्ण कथाएं लोगों को सुना, सुना कर य...

तुझहि सुझन्ता कछु नाहिं।।

        ।। तुझहि सुझँता कछु नाहि।।               ।।राग बसन्त।। गुरु रविदास जी महाराज बहुत बड़े सर्वज्ञान के डिक्टेटर अर्थात तानाशाह बादशाह हुए हैं, उन के सामने सब राजाओं, महाराजाओं, बादशाहों, अमीरों, सामंतों को भी पसीना आता था। गुरु जी की भक्ति की शक्ति को देख कर के ही बाबन राजे-रानियां, महाराजे-महारानियाँ, बादशाह, बेग़में उनकी शिष्य और शिष्याएं बन गए थे। एक दिन चितौड़गढ़ की महारानी झालाबाई ने गुरु रविदास जी की भक्ति की शक्ति की धूम सुनी तो वह गुरु महाराज के दर्शन करने के लिए बावली हो गई और जातीय बंधनों को तोड़कर के गुरु रविदास जी को अपना गुरु धारण करने के लिए मन में ठान लेती है और अपने पति कुंभ सिंह से आग्रह करती है, कि महाराज! मैं गुरु रविदास जी महाराज के दर्शन करना चाहती हूँ। आप भी मेरे साथ काशी चलो, मगर जात घमंडी महाराजा कुंभसिंह ने चमार गुरु के पास जाने के लिए संकोच किया मगर महारानी झालाबाई को महाराजा कुंभसिंह ने जाने की अनुमति देदी।महारानी अपने अहलकारों के साथ काशी चली गई। झालाबाई वहां जा...

।। बिन देखे उपजै नहीं आसा।।

     ।।बिन देखे उपजै नहीं आसा।।             ।।राग भैरों।। गुरु रविदास जी महाराज परिपूर्ण संपूर्ण गुरुओं के गुरु संतों में शिरोमणि संत हुए हैं।वे उच्च स्तर के विचारक, चिंतक, आलोचक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक हुए हैं, उनका दृष्टिकोण संकीर्ण ना हो कर विश्वव्यापी था, इसीलिए गुरु जी ने "बेगमपुरा शहर को नांऊँ" की खोज की थी, यही नहीं वे एक सफल समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने दृढ़ विश्वास और निडर आत्मा से क्रूर, दुष्ट, अज्ञानी और छुआछूत के समर्थक ब्राह्मणों का मुकाबला किया है, जिस में वे हर कदम कदम पर जीत हासिल करते हुए आगे बढ़ते ही गए थे और छुआछूत के समर्थक हारते गए थे। गुरु जी का दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक था वे हर चीज को आलोचनात्मक दृष्टि से परखते और समझते थे। पुरानी आडंबरपूर्ण मान्यताओं को रद्द कर के तर्कपूर्ण नए सिद्धांतों का सृजन किया करते थे, इसीलिए उन्होंने समाजवाद का नया सिद्धांत खोज कर कहा कि:--- "ऐसा चाहूँ राज में जहां मिले सबन को अन्न, छोट बड़ सभ सम वसै तां रविदास रहे प्रसन्न"।। गुरु महाराज ने इस शब्द में सारे ब्र...

।। खट करमु कुल संजुगतु है।।

     ।। खट करमु कुल संजुगतु है।।             ।।राग केदारा।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि अगर कोई पूजा पाठ करते समय पत्थर के देवताओं को भगवान मान कर उनकी पूजा करता है और छः प्रकार के कर्मों का ढोंग रच कर आदिपुरुष को मूर्ख बनाता है, छः प्रकार के कर्म कर के लोगों को भक्ति का नाटक कर के दिखाता है मगर जब उसके हृदय में भगवान के प्रति पूरी श्रद्धा नहीं होती है, पूरी भक्ति भावना नहीं होती है, तो उस का जीवन नर्क बन जाता है, उस की भक्ति, पूजा किसी काम नहीं आती है। इसीलिए गुरु रविदास जी महाराज ने इस शब्द में फरमाया है कि:--- खट कर्म कुल संजुगतु है, हरि भगति हिरदै नाहि।। चरणारविन्द न कथा भावै, सुपच तुलि समानि।।१।। गुरु रविदास जी महाराज अपनी कलम रूपी तलवार से हिंदुओं के आडंबरों और पाखंडों का कत्ल करते हुए फरमाते हैं, कि आप छः प्रकार के कर्म, विद्या पढ़ते हो पढ़ाते हो, यज्ञ करते और कराते हो, दान लेते और देते हो, इन कामों में पारंगत हो, यज्ञ करते हो और दूसरों से भी यज्ञ करवा कर दान लेते और देते हैं परंतु आप के मन में प्...

सुख सागर सुरितरु चिंतामणि।।

           ।।सुख सागर सुरितरु चिंतामणि।।                  ।।राग मारू।। गुरु रविदास जी महाराज ने, इस शब्द को सोरठ और मारू राग में लिखा है, जिस के कारण रागों के स्वभावानुसार शब्दों के अर्थ भी बदल गए हैं, इसीलिए मारू राग में इस शब्द का अर्थ और प्रवचन सोरठ राग से भिन्न हो गया है। सोरठ राग में गुरु रविदास जी महाराज ने, हिन्दू ब्राह्मणों को संबोधित करते हुए समझाया है, कि वे स्वर्ग के कल्पित वृक्ष चिंतामणि, कामधेनु, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि चार पदार्थों, नौ निधियों और अठारह सिद्धियां, हिंदुओं के देवताओं के हाथ में नहीं है। सकल सृष्टि और प्राणी आद पुरुष के वश में है। आप के सभी देवताओं को भी आदपुरुष ने जन्म दिया है। उसी ने ही धरती पर सभी जीवों, वनस्पतियों का सृजन किया है।आदपुरुष ने यह स्पष्ट आदेश दिया है, कि जो कुछ भी चौतीस अक्षरों में अर्थात देवनागरी लिपि में लिखा गया है, वह केवल संस्कृत भाषा में लिखे गए धार्मिक ग्रंथ और साहित्य है, इन सभी को त्याग कर केवल ईश्वर का ही सिमरन ...

।।ऐसी लाल तुझ बिन कउन करे।।

      ।।ऐसी लाल तुझ बिन कउन करै।।                   ।।राग मारू।। गुरु रविदास जी महाराज ने अपने जीवन काल में भारत में शांति स्थापित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया था मगर ब्राह्मणों ने, कदम कदम पर रोड़े अटकाए इसीलिए उन्होंने खूनी क्रांति का आह्वान किया था, जो जो कार्य उन्होंने किए हैं, उनका सीधा संबंध खूनी क्रांति से था। उस समय धोती, तिलक और शंख बजाने का तात्पर्य था खून। क्योंकि भारतवर्ष के गुलाम मूलनिवासियों को कोई किसी किस्म की पूजा, पाठ और तपस्या करने का अधिकार नहीं था, इसीलिए मूलनिवासी भक्ति नहीं कर सकते थे। मनुस्मृतियों के अनुसार ही शासन चलता था, जिस का विरोध विश्व के इतिहास में पहली बार गुरु रविदास जी महाराज ने ही किया था।गुलामी, छुआछूत और वर्ण व्यवस्था के खिलाफ केवल उन्होंने ही सर्प्रथम आवाज उठाई थी और उस को समाप्त करने के लिए वे स्वयं रणभूमि में आ गए थे, इसीलिए उन्होंने चार वर्ष की आयु में धोती, तिलक लगा कर शंख बजाया था। यही नहीं पूजा पाठ करके भी ब्राह्मणों के तंबू में आग ल...