03जनवरी।। भारत की नई नई शिक्षा नीतियां।।
कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी की नई शिक्षा नीतियां।
मनुवादी आदर्श शिक्षा नीतियां:---- अच्छी शिक्षा नीति वही होती है, जिस में बच्चों को सर्वांगीण और बहुमुखी विकास करने के लिए सरल, सस्ती शिक्षा दे कर छात्रों को आदर्श इंसान बनाने के लिए ज्ञान प्रदान किया जाता है। ब्रिटिश सरकार ने जो शिक्षा नीति बनाई थी, वह आदर्श नीति थी, क्योंकि वच्चों को छ: वर्ष की आयु तक शारीरिक विकास करने दिया जाता था, उस के बाद ही स्कूल में प्रवेश दिया जाता था, गणित, हिंदी की शिक्षा देने के लिए छोटी छोटी पुस्तकें पढ़ाई जाती थी, जिन का भार भी कम होता था, वच्चों को जोड़, घटाना, गुणा और भाग करना ही सिखाया जाता था, प्रारंभिक ज्ञान के लिए हिंदी, अंग्रेजी, विज्ञान, सामाजिक आदि विषयों की शिक्षा दी जाती थी, भाषा के लिखने, पढ़ने का ज्ञान देने के लिए पढ़ना और इमला प्रति दिन मौखिक रूप से लिखावाई जाती थी, जिन में वच्चे पारंगत हो जाते थे। वच्चों की कड़ी परीक्षा होती थी, भले ही वच्चा दो दो बार फेल हो जाता था मगर परीक्षा पास किये बिना अगली कक्षा में पर्मोट नहीं किया जाता था।
डिग्रियों की समय सीमा:--- प्राथमिक शिक्षा के लिए पांच वर्ष, माध्यमिक स्तर के लिए आठ वर्ष, मैट्रिक स्तर के लिए दस वर्ष, स्नातक स्तर के लिए चौदह वर्ष, स्नातकोतर स्तर के लिए सोलह वर्ष, जेबीटी बीएड और एमएड के लिए एक वर्ष, लगते थे मगर अब माँ, बाप और वच्चों का खून निचोड़ने के लिए सभी डिग्रियों के लिए एक एक साल बढ़ा दिया गया है अर्थात एम एड करने के लिए जहाँ सोलह वर्ष लगते थे, अब उनीस वर्ष लग रहे हैं, ताकि वच्चों को पढ़ते पढ़ते बुढ़ापा ही आ जाए, माता पिता, संरक्षकों का आर्थिक रूप से दिवाला निकल जाए, फिर किसी को रोजी, रोटी कमाने के लिए नौकरी की कोई गारंटी नहीं है।
पहली नई शिक्षा नीति की काली करतूत:--- पहली शिक्षा नीति की काली करतूत ने तीसरी तक वच्चों की परीक्षा ही खत्म कर दी, तर्क दिया गया कि वच्चों के दिमाग से परीक्षा का भार खत्म कर दिया जाए मगर अंदरखाते तो सभी जातियों के गरीबों की शिक्षा व्यवस्था को जीरो करने का षडयंत्र रचा गया था, ताकि मूलनिवासी और सभी गरीबों के वच्चे तीसरी कक्षा तक जाते जाते पढ़ाई में जीरो हो जाएं और हुआ भी यही, वच्चे चौथी क्लास में चल नही पाए। अध्यापकों को अस्सी प्रतिशत परिणाम निकालने के लिए तीन तीन, चार चार विषयों मे फेल वच्चों को ग्रेस नम्बर दे कर प्रमोट करना पड़ता है। शीशे के महलों में बैठने वाले नालायकों ने परीक्षा खत्म करने के, क्या क्या लाभ-हानियाँ होंगी, इन पर ध्यान नहीं दिया मगर वे देते क्यों? वे तो आर एस एस के इशारों पर शिक्षा नीतियां बनाते आए हैं, जो घुमन्तु, गरीबों, मूलनिवासी जनता को मनुस्मृति के अनुसार गुलाम बनाए रखने के लिए शिक्षा देना ही नहीं चाहते हैं।
मिड दे मील:--- मनुवादी नेताओं और सरकारों ने सुप्रीमकोर्ट से मिल कर गरीब वच्चों के हितैषी बनने के लिए स्कूलों में वच्चों को भोजन की व्यवस्था कर के वच्चों का ध्यान भोजन की तरफ आकषित कर के पढ़ाई से हटा दिया है। वच्चे और अध्यापक भोजनशाला पर ही समय बर्बाद करने लगे और पढ़ाई का बेड़ा गर्क होने लगा। जो स्टोरों में गल सड़ रहा अनाज होता है, जिस में कीड़े भी निकलते हैं, वह गरीब वच्चों को खिलाया जाता है ताकि उस गले सड़े अनाज को खिला कर गरीब बच्चों का दिमाग डेड किया जा सके। सड़ा पड़ा चावल खिला कर वच्चों का स्वास्थ्य खराब कर के उन्हें मरीज बनाया जा रहा है। ये केवल सरकारी स्कूलों के गरीब वच्चों के साथ ही किया जा रहा है, मगर अमीरों के वच्चे ये सड़ा गला अन्न नहीं खा सकते हैं और ना ही उन्हें ये सड़ा अनाज खिलाया जाता है।
पुस्तकों की भीख:--- मनुवादी सरकारें दानी, दयालु और हितैषी बन कर सरकारी स्कूलों में छात्रों को मुफ्त पुस्तकें देती आ रही, जब कि इन किताबों का धन वच्चों से ही बोर्ड परीक्षाओं के बहाने अधिक फीस ले कर बोर्ड इकठ्ठा करते हैं फिर उन्हीं पैसों से पुस्तकों को छपबाते हैं, जिस के छपाने में करोड़ों रुपये के घोटाले भी करते आए है, जिन के किस्से तो अखबारों मे छपते रहे हैं।
कपड़ों का दान देना:--- सरकारी स्कूलों में वच्चों को कपड़े दिये जा रहे हैं, वे भी बार बार रंग बदल कर ताकि कहीं पुरानी ड्रेस ही वच्चे प्रयोग ना कर सकें और उन के नाम का बजट बच ना सके मगर निजी स्कूलों में ये दान नहीं दिया जाता।
टीचर नहीं देते आए:---आरम्भ से ही प्राथमिक कक्षाओं के वच्चों को एक कक्षा के लिए एक टीचर कभी नहीं दिया गया, केवल दो दो या तीन या चार टीचर दे कर वच्चों की पढ़ाई का बेड़ा गर्क किया जाता रहा, क्योंकि एक अध्यापक केवल एक क्लास को ही ठीक ढंग से पढ़ा सकता है। उच्च कक्षाओं में भी कभी प्रिंसिपल नहीं, कभी प्राध्यापक नहीं, कहीं विज्ञान का टीचर नहीं दिया जाता, जिस के कारण लोगों को वच्चे प्राइवेट स्कूलों और कालेजों में पढ़ाने पड़ते।
किताबों का बोझा:--- अंग्रेजों के समय में प्राथमिक कक्षाओं में गणित के चार फंडामेंटल पक्के करवाने के लिए एक छोटी सी गणित की पुस्तक होती थी मगर अब गणित की पुस्तक ना हो कर गणित का ग्रंथ तैयार करवा कर वच्चों को बोझा ढोने का काम देदिया गया है। असंख्य पुस्तकें तैयार कर के अपने पुस्तक बिक्रेताओं को लाभ पहुंचाया जा रहा है।
टेन पल्स टू नीति:---- 1986 में टेन पल्स टू नई शिक्षा नीति लागू की गई मगर एक एक प्राध्यापक को सौ, दो दो सौ वच्चे पढ़ाने पड़ते थे, वच्चों के अनुपात में कभी टीचर नियुक्त नहीं किये गए। हिमाचल प्रदेश के शिक्षा विभाग में 2008 तक बारह सौ प्रिंसिपल के पद खाली पड़े थे, फिर पढ़ाई का क्या हाल रहा होगा अनुमान लगाया जा सकता। चोर दरवाजे से अस्थाई टीचर लगा कर नालायक मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री शिक्षा का स्तर मिट्टी में मिलाते ही गए।
नई वर्तमान बर्बादी नीति:--- अब तो और नई कुशिक्षा नीति बनाई गई, जिस में छात्रों को धर्म कर्म और कर्मकांडों में उलझा कर बर्बाद किया जाएगा। इस नीति की विशेषता ये होगी कि निजी शिक्षण संस्थानों से छात्र बिना परीक्षाओं से डिग्रियाँ ले कर देश को तवाही की ओर ले जाएंगे। धन चाहिए फिर सभी प्रकार की डिग्रियाँ मिलती जाएंगी और मिल भी रही हैं।
जहां शिक्षा संचालक शिक्षाविद्ध होते थे, वहाँ अब अनपढ़ गँवार हैं:-- सरकारी शिक्षा विभागों, स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा संस्थाओं के स्कालर संचालक होते थे। अब नई कुनीति के मालिक अनपढ़ धन्ना सेठ हो गए हैं, जो शिक्षा को एक बहुत इनकम का स्रोत समझ कर डिग्रियाँ बांटते जा रहे।
भगवान ही बचाएगा इस देश के मूर्ख शासकों से:--- भारत की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त कर दी गई है, जिस से भारत की शिक्षा का स्तर सारे विश्व में गिर चुका है, भारत देश को अब भगवान ही बचा सकता है।
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