महाराष्ट्र के मूल निवासी राजनेता एक मंच पर इकट्ठे हो जाओ

!!!महाराष्ट्र के पांच नेताओं से विनम्र अपील!!! महाराष्ट्र सारे भारत में दूसरे नम्बर का सब से बड़ा राज्य है, जो हर क्षेत्र में प्रसिद्ध है। इस बड़े राज्य में 34% मनुवादी जनता के सवर्ण नेता भले ही अनेकों ही दलों में विभाजित हैं मगर आंतरिक रुप से सभी एकता बना कर सत्ता में छाए हुए हैं, इस प्रदेश के 64% लोग अनुसूचित जाति जनजाति पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक हैं, जिन में मुस्लिम 11.4%, बौद्ध 5.81%, मराठा 25%, महाड 15%, धनगर 2% मुस्लिम 12%, आदिवासी10%, कुनबी 8%, माली 4% बंजारी 3%, तेली 2%, कोली के अतिरिक्त अंग्री, भंडारी, मांग, अहीर, कुंभर, पार्धी, चंभर, ढोर, नहावी, धोबी, लोहार, सुनार, बदर, कैकड़ी, सिंपी, सुतार (कार्पेंटर), येलम आदि जातियाँ हैं, मगर इन जातियों के नेताओं ने भारत के 85% मूलनिवासियों के साथ हमेशा धोखा ही किया है और आज इन की फूट के कारण भारतवर्ष के सभी मूलनिवासी गुलामी की जिंदगी जीते हुए 15% मनुवादी शासकों के शिकार बने हुए हैं । महाराष्ट्र के पांच बड़े नेता:--- आज महाराष्ट्र के 5 बड़े बड़े नेता रामदास अठावले, राज रतन प्रकाश आंबेडकर, बीड़ी बोलकर और वामन मेश्राम जी आपस में एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं, एक दूसरे के साथ 36 का आंकड़ा बनाए हुए हैं, कभी भी एक मंच पर इकट्ठा नहीं होते हैं और इन सभी की फूट के कारण सारे भारतवर्ष के मूलनिवासी परेशान है। सारे देश में मनुवादी गुंडे दिनदहाड़े बलात्कार, अत्याचार, मावलिचिंग, कर रहे हैं। दिनदहाड़े मूलनिवासी लोगों को गोलियों से भून रहे हैं। घोड़ी से दुल्हों को उतार रहे हैं, मगर इन पांचों ही नेताओं को मनुवादी गुंडों की आग में जलते हुए 85% मूलनिवासियों का दुख दर्द नजर नहीं आता है और ना ही इन मूलनिवासी दुखियों के दुख दर्द इन के सीने को चीरते हैं। केवल वामन मेश्राम जी और कमल कांत काले, वीएल मातंग ब्राह्मणों के ब्राह्मणवाद का मुकाबला कर रहे हैं मगर इन की भी टांग खींचने के लिए मनुवादी लोगों के हितैषी राम दास अठावले, प्रकाश आंबेडकर, राज रतन, बी डी बोलकर दिन रात लगे हुए हैं और केवल अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए देश-विदेश में कई प्रकार के ढोंग और आडंबर रच रहे हैं। ये लोग सारे भारतवर्ष के लोगों को मूर्ख बनाते आ रहे हैं मगर इन लोगों को इतनी अक्ल नहीं है कि धन संपन्न कांग्रेस, बीजेपी, आप, कम्युनिष्ट और अन्य पार्टियां आपस में इकट्ठे मिल कर के एन डी ए, यू पी ए बना कर चुनाव लड़ रहे हैं और हम से राज सत्ता छीन करके मनुवादी राज चला रहे हैं मगर इन पांचों ही नेताओं के पास ना तो धन है, ना बल है मगर फिर भी यह पांचों नेता एक मंच पर कभी इकट्ठे नहीं हो रहे हैं और सारे देश में अपने-अपने समर्थकों का जाल बुन कर के 5 टुकड़ों में बंटे हुए हैं। 85% मूलनिवासियों को बांट कर धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक शक्ति को छिन्न-भिन्न करते आ रहे हैं। 85% मूलनिवासी एक धर्म को चलाने में असमर्थ हैं मगर ये पांचों है बुद्ध धर्म का प्रचार पहले करते हैं और राजनीति की बात बाद में करते हैं, जबकि भारत में एक प्रतिशत से भी अधिक मूलनिवासी बौद्ध नहीं है और ना ही बौद्ध धर्म को चाहते हैं मगर इन का धंधा है कि बौद्ध बौद्ध बौद्ध बौद्ध ही रटना और रटांना है, भले ही 85% मूलनिवासी हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई, आदिधर्मी, राधास्वामी, निरंकारी क्यों ना हो मगर उन के जेहन में एक ही काम रहता है कि बौद्ध बौद्ध ही प्रचार किया जाए, राजनीति जाए भाड़ में, जिस से मूलनिवासी इन मराठा नेताओं से पीछे हटता हुआ, इन का साथ नहीं दे रहा है। राजनीतिक क्षेत्र में भी ये लोग अपनी अपनी डफली अलग अलग बजा कर के सारे देश में 85% मूलनिवासियों को पांच टुकड़ों में विभाजित कर के इन की राजनीतिक एकता को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं, इसी कारण ये लोग एक भी एमएलए और विधायक नहीं जीता पाते हैं। रामदास अठावले, राम विलास पासवान जैसे मनुवादी मित्र सांसद और मंत्री बन जाते हैं मगर ये लोग मूलवासी जनता को किसी भी प्रकार का लाभ नहीं दिला पाते हैं। केवल कुर्सी पर बैठ कर समय काटते रहते हैं, इन स्वार्थी तत्वों के कहने से मनुवादी सरकारें भी कोई काम नहीं करती है, वस केवल इन को वोट बैंक तैयार करने के लिए और मनुवादियों को दिलाने के लिए रखा हुआ है मगर ये लोग इतने स्वार्थी और मतलबी हैं कि इन को अपने समाज से कोई लेना देना नहीं है। पाँचों इकठ्ठे हो जाएं तो:--- आजादी से पहले भी पूरे देश में गद्दरी बाबा साहिबे कलाम मंगूराम मुगोवालिया, स्वामी अछूतानंद जी महाराज ने मूलनिवासी लहर चला कर के अंग्रेजों से सारे अधिकार ले लिए थे और ये लोग चाहते थे, कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर उन के संगठनों को संभाल कर एकछत्र वहुजन समाज का नेता बन कर सारे देश के मूलनिवासियों को इकट्ठा कर के चुनाव लड़े और लड़ा कर वहुजन राज स्थापित करें मगर उन्हों ने भी शेड्यूल कास्ट फेडरेशन बना कर के अपनी अलग डफली बजाना शुरू कर दी थी और सभी राष्ट्रीय नेताओं को इकठ्ठा नहीं किया। आज भी वही इतिहास दोहराया जा रहा है कि जिस के दुष्परिणाम निकल रहे हैं कि मूलनिवासियों की सरकारें नहीं बन पा रही हैं। महाराष्ट्र के नेता इकठ्ठे नहीं हुए तो :--- यदि महाराष्ट्र प्रदेश के ये पाँचों मूलनिवासी नेता एक मंच पर इकठ्ठे नहीं हुए तो भारत के मूलनिवासी लोग मनुवाद की चक्की तले पिसते ही रहेंगे। यदि ये लोग नहीं संभले और मनुवादी लोगों की ही सरकारें बनवाने के लिए मूलनिवासी बोटों को विभाजित करते रहे, तो इन के अहंकार को चूर चूर कर के इन की हस्ती को मिटाने के लिए लोग सड़कों पर उतर कर इन का जीना हराम कर देंगे, इसलिए इन सभी बड़े पांचों नेताओं से विनम्र अपील है कि आप सभी आपसी रंजिसों को भुला कर एक मंच पर इकट्ठे हो जाएं और सभी को इकट्ठे मिल कर के अत्याचारी मनुवाद के खिलाफ चुनाव लड़ना और लड़ना चाहिए अन्यथा किसी दूसरे प्रदेश के नेता को तैयार किया जा सकता है। राम सिंह आदवंशी। महासचिव, वहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।

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