मोदी प्रधान मन्त्री ना होता तो राम मंदिर में फड़क नहीं सकता।
मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
जब यूरेशियन घुसपैठियों ने छल बल से घुसपैठ कर के भारत पर अधिपत्य जमा कर भारत के 85% मूलनिवासियों को गुलाम बना कर पशुओं से भी बदतर व्यवहार करना शुरू कर दिया था, तब अपनी अलग पहचान बनाने के लिए अपने युरेशयन गाड अब्राहम को ब्रह्मा पुकार कर उस को अपना जनक लिख कर नया इतिहास लिख लिया था। ब्रह्मा को अब्राहम का आवरण चढ़ाया गया है, जिस के दो साथी विष्णु और महेश का भी अविष्कार किया गया था, इस प्रकार विदेशी युरेशयन लोगों ने अपनी अलग पहचान बना कर अपने आप को धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप में स्थापित किया था। ब्रह्मा के मुँह से जन्मे ये लोग ब्राह्मण जाति के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे।
सिंधु घाटी सभ्यता का विध्वंस:---अरबी और फ़ारसी में स ध्वनि को ह उच्चारित किया जाता है, इसीलिए युरेशयन सिंधु शब्द को हिंदू पुकारते थे, इसी हिन्दू शब्द के कारण ये लोग हिन्दू बन गए और इकठ्ठे हो कर भारत के भोलेभाले 85% मूलनिवासियों को मारते गए। केवल यही ब्राह्मण नामक जाति के विदेशी युरेशयन लोग हैं, इन्होंने राजसत्ता छीन कर फूट डालो राज करो नीति लागू करनी शुरू की थी। जो मूलनिवासी लोग राज परिवारों से सम्बंध रखते थे, उन राजाओं के पुत्रों को राजपूत कहा गया, जो व्यापार करते थे उन्हें वैश्य और जो मूलनिवासी युरेशयन के साथ युद्ध करते रहे, उन्हें शूद्र वर्ण के नाम से पुकारा गया, जो आज भी मनुवादी लोगों से संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें वनवासी कहते हैं, जिस से प्रमाणित होता है कि तीनों वर्ण भारत के मूलनिवासी है, परंतु अपनी संख्या और शक्ति बढ़ाने के लिए इन्होंने कुछ लोगों को राजपूत, वैश्य और शूद्र घोषित किया हुआ है, ताकि 85% भारतीय मूलनिवासियों को वर्णों और उपजातियों में बाँट कर रखा जा सके, इस की सत्यता और प्रमाण इस बात से ज्ञात होते हैं, कि यूरेशियन ब्राह्मणों ने तीनों वर्णों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा हुआ है, ताकि इन के अंदर सामाजिक धार्मिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक जागृति ही पैदा ना हो सके और इन तीनों वर्णों से अपनी सेवा एवं सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके, जिस सच्चाई को राजपूत और वैश्य आज तक समझ नहीं पा रहे हैं, ये दोनो वर्ण भी ब्राह्मणों की सेवा ही करते हैं मगर ये लोग उच्च वर्ण बन कर नहीं समझते हैं ,कि हम ब्राह्मणों के ही सछूत सेवक हैं।
राजपूतों का अधिकार:---- राजपूत केवल तीनों वर्णों की सुरक्षा करते करते शहीद ही हो सकते हैं और इस व्यवस्था को स्थाई रूप से बनाए रखने के लिए इन्हें ऐसी ऐसी शिक्षा दी हुई है कि ये लोग मरने के लिए तत्पर रहते हैं, जिस प्रकार ब्राह्मणों ने लिखा हुआ है कि:---
*रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाएँ पर वचन ना जाएं अर्थात रघु के नाम से दंतकथा घढ़ी हुई है, कि राज परिवारों के लोग अर्थात राजपूत घरानों की विशेषता है कि मर सकते हैं मगर अपने वचनों से पीछे नहीं हटते हैं और इसी अहम के कारण ये लोग युद्धों में शहीद हो जाते हैं मगर यह तनिक नहीं सोचते हैं कि यह ब्राह्मण हम मूलनिवासियों को मरवाने के लिए हमारे राजपूत राजाओं को आपस में लड़ाते आ रहे हैं।
वैश्यों की स्थिति:--- वैश्यों को भी पढ़ने और लिखने का कोई अधिकार नहीं था, ये भी पढ़ने लिखने का कार्य करें, तो इन को भी कई प्रकार की यातनाएं सहन करनी पड़ती थी, ये लोग भी केवल अपना हिसाब किताब लिखने के लिए गिनती ही सीख सकते थे, जिस के सिवाय कुछ नहीं पढ़ सकते थे, जिस का प्रमाण हमें राम मंदिर बनते समय वहां के एक ब्राह्मण पुजारी परम हंस के उस कथन से ज्ञात होता है, जिसमें उसने कहा था, कि हम राम मंदिर नींव के लिए शूद्र जिलाधिकारी के हाथ में शिला दान नहीं कर सकते हैं, उस के छूने से भी शिला अपवित्र हो जाएगी।
मोदी सत्य को नहीं समझता:-- आयोध्या राम मंदिर की पवित्रता के बारे में मोदी नहीं जानता है। तत्कालीन पुजारी परम हँस ने वैश्यों की जो औकात दिखाई थी, उस को मोदी भूल गया है, यदि मोदी प्रधानमंत्री ना होता तो राम मंदिर का शिलान्यास और उदघाटन करना तो दूर की बात होती, ये मंदिर के समीप तक नहीं फड़क सकता था। राम मंदिर के लिए तत्कालीन मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार जैसे ओबीसी योद्धा नेता आज कहीं पर भी ढूँढने से नहीं मिलते हैं।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
वहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।
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