चंवर वंश का अंतिम योद्धा भाग सात।

चमार वंश का अंतिम योद्धा भाग सात।।    बादशाह सिकन्दर लोधी, आदि धर्म के ध्वज वाहक सतगुरु रविदास जी महाराज की अथाह स्तुति करता ही जा रहा था। वह सोच रहा था कि इस फकीर को मैं लालच देकर और अपनी मिठी मिठी बातों में उलझा कर, फुसला कर, मुसलमान बना कर इस्लाम धर्म के प्रचार प्रसार के लिए तैयार कर लूंगा, जब गुरु रविदास जी महाराज लोधी की बातों में नहीं आए, तब फिर भी उन को अपना बनाने के लिए उन के गले में अपना पल्लू डाल कर कहता है कि, हे महाराज! मुझे अपने चरण कमलों में शरण दे कर मेरी इल्तजा स्वीकार कर के मेरा मान रख लो। हम ने आप को सर्वोच्च, परिपूर्ण गुरु मान लिया है, हमें अपने चरण कमलों में लगा लो। संसार के सभी मुसलमान मेरे मुरीद हो चुके हैं, वे भी सभी आप के अनुचर बन जाएंगे, इसलिए महाराज आप तत्काल इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लो।                         ।।शब्द।। श्री गुरु रविदास अगे अर्ज किती शाह सिकंदर पलड़ा गल पाईके ते।। मेरी अर्ज नूं अज कबूल करना रखो सवजा कदमी जाई के ते।। असीं मन लिया तुहानू पीर डाडा सानू रखना कदमी लाईके ते।। सभी मुसलम मम मुरीद होई मन लऊ इसलाम नूं धाईके ते।। क्रांति वीर योद्धा का जबाब:---- कड़ी कैद में बैठे हुए क्रांति वीर गुरु रविदास जी महाराज ने बादशाह सिकन्दर लोधी को कड़ा जबाब देते हुए फरमाया, बादशाह लोधी! दीन मजहब तो सभी झगड़ों की जड़ हैं, इन दोनों से अलग हो जाओ। हिंदू अंधा है और मुस्लिम काणा (जिस की एक आँख में दिखाई ना दे) है, इस कठोर उतर को सुन कर बादशाह हिल गया, क्योंकि ऐसा सख्त जबाब उस ने आज तक किसी भी आदमी के मुख से नहीं सुना था। वह हक्का बक्का रह गया, यदि ऐसा जबाब कोई कमजोर आदमी देता तो वह उसे तत्काल अपनी कटार का शिकार बना देता मगर लौह पुरुष के समक्ष उस की जुबान नहीं चल सकी। जिस बादशाह का नाम सुनते ही लोग थर थर कांपते थे, वही आज गुरु रविदास जी महाराज के सामने बोल नहीं पा रहा था और मन मसोस कर फिर दिल को पक्का कर के गुरु जी महाराज को फुसलाने और गिड़गिड़ाने लगा।              ।।श्री गुरु रविदास जी।। श्री गुरु रविदास जी आखदे ने दीन मजहब झगड़ा है भारा।। छड दोहाँ दी चकी ना जांवदी इन्हाँ दोहाँ ते हो निआरा।। हिंदू अनिआं ते तुर्क कानिआं ते ईश्वर रख लवै इन्हाँ ते जो पिआरा।।। कहे दास जबाब दिता सख्त गुरां ने बोले देवते सुन जैकारा।। हे महाराज! आप इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लो, हम आप को पंजाब का सूबा देकर, आप को महाराजा बना देते हैं, इसलिए आप अपने मात्थे से तिलक और गले से जनेऊ उतार दो, हम आप को विश्व का पीर बना देते हैं, ये दोनों ही पद ऐसे हैं, जिन से बड़ा कोई पद नहीं है। हम आप को दोनों सर्वश्रेष्ठ पदों से अल्लंकृत कर रहे हैं, ऐसा शुभ अवसर कभी आएगा!                      ।। शाह सिकन्दर।। कार मंन इस्लाम दी रविदासा तुहाँनूं सूबा पंजाब बना देसां।। लाह मथियों तिलक जनेऊ गल चों तैनूं पीर खलकत करा देसां।। दोनो आहुदे बुलन्द जहांन उते दोहां आहुदियां नूं भुगता देसां।। ऐसा बकत हाथ ना आवना ऐ मखलूकात नूं कदमी ला देसां।। ज्योतिर्लोक के बादशाह गुरु रविदास महाराज, सिकन्दर लोधी को बड़ी शालीनता और विनम्रता पूर्वक फरमाते हैं, बादशाह! हम आप के दोनों ही पदों के लायक नही हैं। भाई हम तो फकीर हैं, फकीर! हर प्राणी को उस के कर्मों का फल अवश्य मिलता है। हे शहनशाह! अच्छे कर्मों के बिना दरगाह में भी शरण नहीं मिलेगी।                   ।।गुरु जी।।                    ।। शब्द।। पातशाह त्रिलोकी रविदास गुरु जी मुखों कहिन अधीनगी बनाई के ते।। दोहाँ अहुदियां लाइक ना पातशाह असीं कीर ते कीर कहाईके ते।। करनी अपनी मिलनी हर बसर कौन बैठूगा शाह सदाईके ते।। नेक अमल बिन ना दरगाह ढोई शहिनशाह बहिसती जाईके ते।। गुरु रविदास जी महाराज ने, बादशाह लोधी को ऐसी कड़ी फटकार लगाई, कि उस के होश उड़ गए, आज तक ऐसे कड़े शब्द बोलने की हिम्मत किसी भी तिलकधारी को कभी भी नहीं हुई थी। ये लोग तो अपना पेट भरने के लिए बादशाह की स्तुति अवश्य करते नहीं थकते थे, जब कि लोधी अंधाधुंध हिंदुओं के मात्थों से तिलक और गलों से जनेऊ उतारता था मगर उन के गुर्दों में रति भर दम नहीं था कि कोई हिंदू धर्म को बचाने के लिए लोधी से टक्कर ले सके मगर गुरु रविदास जी महाराज ने, लोधी को दिन में ही तारे दिखा दिये। आज तक विश्व में कोई भी ऐसा निडर क्रांति वीर पैदा नहीं हुआ है, जो इन धर्म के मूर्ख अंधभक्त ठेकेदारों से लोहा ले सका हो। किसी भी धर्म में ऐसा आलौकिकि सर्व शक्तिमान, कोई भी पीर, पैगम्बर, अवतार नहीं हुआ है, जो क्रूर लोगों का सामना कर सका हो। ईशा मसीह भी धर्म के ठेकेदारों द्वारा सूली पर चढ़ा दिया गए थे मगर वे भी खुद को नहीं बचा सके थे। राम सिंह आदिवंशी। अध्यक्ष, विश्व आद धर्म मंडल। हिमाचल प्रदेश।  

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