जलियांवाला बाग हत्याकांड

।।जलियांवाला चमार जाति की हत्या।। भारत के  मनुवादियों ने तो जाति पाती का ठेका ले रखा है मगर पंजाब के जाटों ने भी ब्राह्मणों, राजपूतों और वानियों की नकल कर के जातीय व्यवस्था को खूब मजबूती से पक्का किया हुआ है। प्रथम विश्व युद्ध 28-07-1914 से ले कर के 11-11-1918 तक चला था, जिस में चमार रेजिमेंट ने भारत का नाम विश्व में रौशन किया था। सुप्रसिद्ध पंजाबी लेखक प्रोफेसर गुरनाम सिंह जी के अनुसार प्रथम विश्वयुद्ध में (चमार) चंवर वंशी योद्धाओं ने 1918 में सब से अधिक वीरता के जौहर दिखाए थे, जिस को देख कर उन के पैरों तले मिट्टी खिसक गई थी। उस समय ये मनुवादी कायर कहीं नजर नहीं आते थे। इस विश्व युद्ध में जो चमार रणबांकुरे सकुशल विश्व युद्ध में से सुरक्षित बच कर पंजाब वापस आ गए थे, वे रब का शुक्रिया मनाने के लिए 1919 में गुरुओं के दरबार साहब अमृतसर में मत्था टेकने के लिए गये थे मगर अछूत, चँवर वंश के वीर सपूतों को जाट सिखों ने स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने ही नहीं दिया था। इन लोगों ने अछूत चंवर वंश के वीर सपूतों का केवल अपमान ही नहीं किया था अपितु जाट सिखों ने इन वीर जांवाज सपूतों को गालियाँ भी दी थी। प्रोफेसर गुरनाम सिंह जी लिखते हैं कि, इस अन्याय, अपमान के कारण ही चँवरवंशी समाज ने जालियाँवाला बाग में आपात मीटिंग रखी गई थी। स्वर्ण मंदिर और जलियाँवाला बाग दोनों ही एक दूसरे के आमने सामने हैं, इसलिए मीटिंग के लिए यही स्थान चुना गया था। हत्याकांड की रूपरेखा:----  स्वर्ण मंदिर के स्वर्ण लोगों ने चंवरवंशी चमार रेजिमेंट के वीर सपूतों के द्वारा स्वर्ण मंदिर के सामने सम्मेलन आयोजित करने को अपना अपमान समझा था, जिस के कारण इस सम्मेलन में उपस्थित होने वाले लोगों को मारने का षड्यंत्र रचा गया, जिस का मुखिया स्वर्ण मंदिर का मैनेजर जत्थेदार अरुर सिंह था। इसी व्यक्ति ने अंग्रेज जनरल डायर को सूचना दी थी, कि चमार जाति के लोग आप लोगों के खिलाफ मीटिंग करने जा रहे हैं, जिस से जनरल डायर भड़क उठा और उस ने मीटिंग में उपस्थित लोगों को मौत के घाट उतारने का निर्णय कर लिया। चँवर वंश के सपूतों का नरसँहार:--- अप्रैल 13,1919 को जब यह मीटिंग स्वर्ण मंदिर के सामने शुरू हुई तब सच्चाई को जाने बिना ही कायर जनरल डायर ने अपने साथियों के साथ सभास्थल पर आ कर अंधाधुंध गोलियां बरसाना शुरू कर दी, जिस से सैकड़ों लोग मौत के घाट उतार दिए गए। कई लोगों ने कुएं में छलांग मार कर के स्वयं ही आत्महत्या कर ली थी। इस सामूहिक नरसंहार कारवाने वाला केवल मात्र अकेला स्वर्ण मंदिर का मैनेजर गद्दार अरूर सिंह ही था, क्योंकि यह काफर, निर्दयी अरुर सिंह जातिवादी मांसिकतावादी पिसाच व्यक्ति था। सिखों ने डायर को सम्मानित किया:--- जब चमार रेजिमेंट के वीर सपूतों और उन के साथ चमार जाति के बेकसूर लोगों को जनरल डायर ने मौत के घाट उतार दिया और स्वर्ण मंदिर के सामने लाशों के ढेर लग गए। कुआं चमारों की लाशों से भर गया तब उस दर्दनाक दृश्य को देख कर के भी सिख लोग नहीं पिघले और उस का जश्न मनाते हुए इन्होंने जनरल डायर को बड़े सम्मान के साथ स्वर्ण मंदिर में बुला कर सरोपा भेंट कर सम्मानित किया। प्रोफेसर गुरनाम सिंह जी लिखते हैं, कि सिखों ने जनरल डायर को दरबार साहब ले बुला कर के उस को सरोपा (Robe of Honour) भेंट किया गया। ये बात जगदेव सिंह जस्सोवाल सांसद ने पार्लियामेंट में एक डिबेट में वहस करते हुए नोट करवाई हुई है मगर जातिवादी मनुवादी मीडिया ने इतनी बड़ी इन्फर्मेशन को लोगों तक पहुँचने ही नहीं दिया, जिस से इस सच्चाई का किसी को पता तक नहीं लगा है। जलियाँवाला नरसंहार की पटकथा की रूप रेखा बदली गई:--- प्रोफेसर गुरनाम सिंह जी लिखते हैं कि जालियाँवाला बाग हत्याकांड अछूत चमार सिख लोगों का ही हुआ था और उन पर गोली ऊँची जाति के सिख लोगों के कहने पर चलाई गई थी, जिस की रुपरेखा बदल दी गई। अब ये जानना आवश्यक है कि ऐसा क्यों किया गया? ब्रिटिश सेना में ज्यादातर सिपाही निम्न जातियों के ही थे। चमार रेजिमेंट ने इस विश्व युद्ध में अपना जौहर दिखा कर विश्व युद्ध में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा ही लिया था। इसलिए इस पटकथा को बदलना अत्यंत जरूरी था। ऐसे में यदि इस नरसंहार की बात सार्वजनिक हो जाती, तो सवर्णों को इस षड्यंत्र का खामियाजा भुगतना पड़ सकता, जिस के कारण अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई भी कमजोर पड़ जाती। इसलिए इस लड़ाई को भारतीय बनाम अंग्रेज बनाया गया और जनरल डायर को सीधे इंग्लैंड भेज दिया गया। चमार रेजिमेंट का अपमान :--- इतिहास इस बात का साक्षी है, कि दुश्मन से लोहा लेने के लिए अधिकतर केवल अनुसूचित जाति के लोगों का ही खून बहाया जाता है, जब कभी दुश्मन के साथ मुकाबला करना हो तो जानबूझ कर के ही केवल चंवरवंश के वीर लोगों को ही आगे किया जाता है। इसी जाति ने विश्व युद्ध में अपना खून बहाया था और फिर उन को भारत में सम्मानित करने की अपेक्षा भगवान का शुक्रिया करने पर भी शहीद होना पड़ा। उस समय जलियांवाला बाग हत्याकांड में असली अपराधी बचा लिए गए थे और जिन रणबांकुरों ने विश्व मे भारत का नाम रौशन किया था, उन को यूज करो-फेंकों की नीति के अनुसार स्वार्थ सिद्ध कर के केवल मात्र अपमानित ही नहीं किया था, अपितु उन के साथ गद्दारी कर के इतिहास में भी जलील किया गया है। मनुवादी लोगों ने हमारे देश के अछूत वीर रणबांकुरों के इतिहास को जितना तोड़ मरोड़ कर विश्व में प्रस्तुत किया है, शायद ही दुनियां के किसी अन्य देश में किसी ने ऐसा किया हो। प्रोफेसर गुरनाम सिंह जी लिखते हैं कि, दरसल यह क्रूर षड्यंत्र एक सोची-समझी साजिश के तहत किया गया कांड है। देश विदेश में यह झूठा भ्रम, फैलाया गया कि जलियांवाला बाग में देशभक्तों की देश की आजादी के लिए मीटिंग हो रही थी, वास्तव मे ये तो बिल्कुल सत्य ही था कि, जलियांवाला बाग में देशभक्तों की ही मीटिंग हो रही थी, मगर यह बिल्कुल महाझूठ था कि वहाँ पर अंग्रेजों के खिलाफ "अछूतों की मीटिंग" हो रही थी मगर उच्च जाति के लोगों द्वारा किए गए भेदभाव और अपमानित आदि जवलंत मुद्दों पर विचार करने के लिए चंवरवंश के लोग इकट्ठे हुए थे। उस तथ्य को आज तक छुपाए रखा गया है। शिक्षित चँवरवंश सत्य को समझ रहा:-- अब मनुवादियों के छल कपट को वीर चमार जाति समझने लग पड़ी हैं, इसी कारण मूलनिवासी रत्न साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया और साहिब कांशी राम जी ने भारत के मूलनिवासियों की आजादी की लड़ाई की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी और इन्हीं दोनों वीर सपूतों ने भारत की राजनीति में घमासान मचा दिया है, दोनों ही नेताओं ने सारे भारत के आदिवासी लोगों को जागृत कर दिया है। पहले बाबू मंगू राम जी ने यूरेशियन को सबक सिखाने के लिए अंग्रेजों से ही मूलनिवासियों के लिए आरक्षण की सुविधा लेकर के मनुवादियों के समान मूलनिवासियों को तैयार किया है, उन के बाद साहब कांशीराम जी ने मूलनिवासियों को स्लोगन दिया कि, *वोट हमारा, राज हमारा नहीं चलेगा, नहीं चलेगा* जिस से भारत के 85% लोग एक मंच पर इकट्ठा हो गए, इन के आबाह्न पर मूलनिवासियों ने हिंदुओं की गुलामी से छुटकारा पा कर आज़ादी का शंखनाद बजाया हुआ है, जिस के कारण मनुवादी दोबारा हेराफेरी, छल कपट पर उतर आए हैं, जिस के तहत इन लोगों ने ईबीएम अर्थात बोटिंग मशीन में ही हेराफेरी कर के बीस सालों से चुनाव जीतना शुरू कर रखा है, इस हेराफेरी, छल कपट में मनुवादी न्यायपालिका, चुनाव आयोग, प्रशासन और मीडिया पूरा साथ दे रहा है, यही नहीं वीर चँवरवंश (चमार) के जिनीयस, योग्य, ईमानदार लोगों को राजनीति में प्रवेश करना ही रोक दिया है। सभी बेईमान मनुवादी राजनीतिक दल चमार जाति के लोगों को टिकट तक नहीं दे रहे हैं, ताकि संसद और विधानसभाओं में पहुंच ही ना सकें। आज तक जिन को टिकट दिया भी तो ऐसे लोगों को दिया जो संसद  और विधान सभा में मूक दर्शक बने रहें परंतु अब इन का यह षड्यंत्र बहुत दिनों तक चलने वाला नहीं है। राम सिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदि धर्म मंडल। हिमाचल प्रदेश।

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