नागवंशी शासकों को विषैले नाग लिखा गया
।।नाग शासकों को विषैले नाग कहा गया है।। बड़ी हैरानी की बात है कि हिंदुओं के देवी देवता गले में सांप डाल कर के घूमते हैं और उनके सिर के ऊपर छत्र के रूप में खड़े हो कर उन्हें दुश्मनों और सर्दी, गर्मी, वर्षा से रक्षा भी करते हैं, यदि तर्कपूर्ण बुद्धि और दिमाग से काम लिया जाए, तो ऐसा लिखना और कहना महामूर्खों का काम लगता है क्योंकि आज भी देखने में आता है कि यदि सांप के मुँह से नकली वायु किसी को लग जाए तो वह मर जाता है फिर अगर कोई मनुष्य सांपों को गले में डाल कर रहता होता तो क्या वह जिंदा रह सकता था? आज भी कई सपेरे गले में सांपों को डाल कर घूमते फिरते, मगर वे केवल उन्हीं साँपों को पिटारे में बंद कर के घूमते हैं, जिन के विषैले दांत निकाल कर विष खत्म कर दिया जाता है।
नाग शासकों को सांप लिखा गया:---हिंदुओं ने नाग शासकों को सांप का पर्यायवाची सिद्ध कर के साहित्य में दर्ज किया हुआ है। यह घृणित कार्य मूलनिवासी शासक नाग वंश को कलंकित करने का केवल निंदनीय षड्यंत्र मात्र है क्योंकि सांप जाति धरती में बने हुए बिलों के बीच रहती है, इसलिए इन का ना कोई घर होता है, ना कोई ठिकाना होता है और ना कोई इतिहास होता है, इसलिए इन्होंने जो कुछ लिखा है, वह सब भ्रांति को ही जन्म देता है। नाग वंश के राजाओं को नागराज के नाम से पुकारा जाता था, इसलिए शेषनाग को सांपों का राजा मान कर के उन का इतिहास धूमिल किया गया है, इसी कड़ी में एक नागवंशी राजा दुर्जनसाल का भी हिंदू किताबों में वर्णन किया गया है। यह महाराजा वर्तमान झारखंड की राजधानी रांची के समीप गुमला जिले के सिसई खंड में राज करता था। नवरत्न गढ़ नागवंशी राजाओं, महाराजाओं के स्वर्णिम इतिहास का प्रतीक है। यहां करीब 400 साल पहले नागवंशी राजा दुर्जनसाल का इतिहास मिलता है, जिस में लिखा गया है, कि उस ने पहाड़ों और गहरी खाईयों के बीच डोइसागढ़ की स्थापना की थी।
नाग वंश का अंतिम शासक:---- नाग वंश आदि काल से चला आ रहा वंश है, इस शक्तिशाली वंश का अंतिम महाराजा नंदी वर्धन था, उस ने 367 ईस्वी पूर्व से 345 ईस्वी पूर्व तक शासन किया था, उस के बाद वह महापद्मनंद नाम से जाना जाता है। यह वंश शिशुनाग वंश के बाद और मौर्य साम्राज्य से पूर्ववर्ति था।
नंद वंश की स्थापना :---- ईसा पूर्व चौथी पांचवी शताब्दी में नंद वंश ने उत्तरी भारत के विशाल भूभाग पर अधिकार कर लिया था। नंद वंश के संस्थापक की बात की जाए, तो इस का श्रेय महापद्मनंद को ही जाता है, यही वह शासक हुआ है, जिस ने नंद वंश की गहरी नींव डाली थी और उन के बाद धनानंद, नंद वंश के अंतिम शासक हुए हैं। नंद वंश का मगध की प्रगति में विशेष योगदान रहा है।
नंद वंशावली:---- आज से करोड़ों वर्ष पहले मक्का मदीना राजधानी से शासन चलाने बाले सम्राट सिद्ध चानो महाराज के क्षत्रप नाग बलि, जिन को वर्तमान में नांगा बलि के नाम से पुकारा जाता है, से नाग वंश का इतिहास शुरू होता है, जो निर्बाध गति से चलता हुआ आज भी भारत में नहीं विश्व में विद्यमान है। इस दिव्य नागवंश का इतिहास सिंधुघाटी की सभ्यता के विध्वंस से पूर्व का नहीं मिलता है, जो मिल रहा है, वह उस के बाद का मिलता, जो निम्नलिखित है:----
राजा फणि मुकुटराय (सी 64-162 सी)
मुकुट राया 162-221
घाट राय 221-278
मदन राय 278-307
प्रताप राय 307-334
कंदर्प राय 334-365
उदय मणि राय 365-403
जैमिनी राय 403-452
श्री मणि राय 452-476
फनी राय 476-493
गेंडू राय 493-535
हरि राय 535-560
गजराज राय 560-606
सुंदर राय 606-643
मुकुंदराय 643-694
उदय राय 694-736
कंचन राय 736-757
मगन राय 757-798
जगन राय 798-837
मोहन राय 837-901
गज दंत राय 964-992
आनंद राय 992-1002
श्रीपति राय 1002-1055
जगा नंद राय 1055-1074
दीपेंद्र राय 1074-1084
गंधर्व राय 1084-1098
भीम कर्ण सी 1098-1132
जश करण 1132-1180
जयकरण 1180-12 18
गोकर्ण 1218-1236
हरीकरण 1236-1276
शिवकरण 1276-1299
वेनू करण 1299-1360
फेनु करण 1360= अज्ञात
तिहुली करण अज्ञात
शिव दास करण 1367-1389
उदय करण 1389-1427
पृथ्वी करण 1427-1451
प्रताप करण 1451-1469
छात्र करण वन 469-1515
विराट करण 1515-1522
सिंधु करण 1522-1535
मधु करण शाह 15 84-1599
वेरी साल 1599-1614
दुर्जन साल 1614-1615
देव शाही अज्ञात 1615= अज्ञात
रघुनाथ शाह वन 640-1690
राम शाह 1690-1715
यदुनाथ शाह 1715-1724
शिव नाथ शाह 1720-1733
उदय नाथ शाह 1733-1740
श्याम सुंदर नाथ शाह 1740-1745
बलराम शाह 1745-1748
मणि नाथ शाह 1748-1762
दृप नाथ बादशाह 1762-1790
देवनाथ शाह 1790-1806
महाराजा गोविंद नाथ शाह देव 1806-1822 महाराजा जगन्नाथ शाहदेव 1822-18 72 महाराजा उदयप्रताप नाथ शाह 1872-1950
महाराजा लाल चिंतामणि शाहदेव 1950-
आज भी नाग वंश के और भी कई उतराधिकारी भारत में मौजूद है, जिन की नस नस में नाग बली के गुण समाए हुए हैं और आज भी भारत की राजनीति में विशेष योगदान दे रहे हैं। आज जरूरत इस बात की है, कि सभी नागवंशी एक मंच पर इकट्ठा हो कर के आदवंशी, मूलनिवासी राज की स्थापना करने में योगदान करें, तभी नाग बलि महाराज के इतिहास को जिंदा रखा जा सकेगा।
राम सिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल
हिमाचल प्रदेश।
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