नागवंश का प्रादुर्भाव
नाग वंश का प्रादुर्भाव:---प्रतापी नाग वंश का प्रादुर्भाव आदि पुरुष के बाद जुगाद के समय हुआ था, क्योंकि इसी कड़ी में सम्राट सिद्ध चानो जी महाराज हुए हैं, जिन के मंत्रिमंडल में नाग बलि का महत्वपूर्ण स्थान था, जिस का इतिहास यूरेशियन आर्य ने हमेशा हमेशा के लिए मिटा दिया था और नाग बलि को संदेहास्पद बनाने के लिए उन के नाम को बदल कर नांगा बलि नाम साहित्य में लिख डाला है, ताकि उन्हें संदेहास्पद बना कर, मूलनिवासी लोग उन के इतिहास के बारे में जान ही ना सकें, परंतु नाग बलि के बारे में सम्राट सिद्ध चानो महाराज के मंत्रों से पूर्ण जानकारी मिल रही है, कि नाग बलि का संबंध अनादि काल से है। जब कि उस समय यूरेशियन आर्य भारतवर्ष में घुसे ही नहीं थे और ना ही भारत को अपना गुलाम बनाया था, फिर भी नाग बलि का संबंध विष्णु से जोड़ दिया गया है, जब कि विष्णु एंड कंपनी ने मूलनिवासियों को जड़ से उखाड़ने का कार्य किया है।
नाग वंश का प्रथम राजा नाग बलि:--- नाग वंश का संबंध सम्राट सिद्ध चानो जी महाराज के साथ था, नाग बलि उन के श्रेष्ठ दरबारियों में से एक थे, इस से यह स्पष्ट होता है कि नाग वंश का शुभारंभ नाग बलि से ही हुआ है परंतु आज से तीन चार हजार वर्ष पूर्व भारत में आ कर के यूरेशियन लोगों ने नाग वंश का उद्भव कश्यप से माना है और अपने साहित्य में लिखा है कि श्रृंगी ऋषि का अभिशाप पूरा करने के लिए ही राजा परीक्षित को नाग ने ही काटा था, इसी कारण राजा जनमेजय इस से बहुत नाराज हो गए थे और उस ने सारे संसार के नागों का नाश करने के लिए नाग यज्ञ आरंभ किया था, जो तर्कसंगत नहीं लगता है क्योंकि अगर ऐसा हुआ होता तो आज विश्व में एक भी नाग और सांप जिंदा नहीं हो सकता था परंतु यह सारी काल्पनिक कथाएं इसलिए बनाई गई हैं ताकि भारत के मूलनिवासी नाग शासकों का इतिहास संदिग्ध बनाया जाए।
नाग वंश के राजा का क्या नाम:--- हिंदू धर्म ग्रंथों में शेषनाग उर्फ बासुकी को नागों का राजा बताया गया है, वास्तव में यह कथन सत्य भी हो सकता है, क्योंकि कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को मनुवादी लेखकों ने विवश हो कर के स्वीकार कर लिया है, इसलिए महाराजा बासुकी अवश्य हुए होंगे, परंतु उन का संबंध सम्राट शिव से स्थापित किया गया है और लिखते हैं, कि यही नाग उन के गले में रहता है। बसुकी की पत्नी का नाम शतशीर्षा लिखा गया है, परंतु ये विचार बिल्कुल बेतुके ही लगते हैं, क्यों कि किसी भी सांप की पत्नी नहीं होती है और ना ही किसी साँपिन का नाम होता है और ना ही किसी सांप या नाग का नाम रखा जाता है, इसलिए शेषनाग उर्फ बसुकी महाराजा अवश्य हुए हैं, उन के नाम को अनंत के नाम से भी जाना जाता है, जो बिलकुल ही तर्कसंगत लगता है, क्योंकि जम्मू कश्मीर में आज भी अनंतनाग एक जगह का नाम है, अधिकतर जगहों के नामकरण दिव्य महापुरुषों के नाम पर ही किये गए हैं, इसलिए अनंतनाग *नाग वंश* राजाओं की पहचान अवश्य है।
कालिया नाग का सपेरा रूप:--मनुवादी लेखकों ने एक अजीब ही कथा लिखी हुई है, जिस के अनुसार कालिया नाग जिंदा है, इन के अनुसार कालिया नाग आज भी फिजी के बनुआ लेबु के फिजियन द्वीप में निवास कर रहे हैं, परंतु वह किसी को भी दर्शन नहीं देता हैं, इस के साथ दूसरी दंतकथा के अनुसार मथुरा के पास जेयंत गांव में आज भी कालिया नाग जीवित है, इन लोगों के अनुसार कृष्ण के अभिशाप के बाद से कालिया नाग आज भी इस स्थान पर पत्थर के रूप में स्थापित है और जिस जगह इस की मूर्ति है, उस को कालिया नाग का मंदिर कहा जाता है। इन तिलकधारियों के अनुसार कालिया नाग के दर्शन मात्र से काल सर्प दोष से छुटकारा मिल जाता है परंतु यह मनुवादी लेखकों की दन्त कथा केवल हास्यास्पद ही लगती है, क्योंकि यह कालिया नाग कोई सांप नहीं था, वह तो नाग वंश का शासक था और यह मनुवादी लेखकों की फितरत रही है, कि भारतवर्ष के मूलनिवासी शासकों को अपमानित करने के लिए कई प्रकार के अमनोवैज्ञानिक तर्कहीन लेख लिख के कर जनता को भ्रमित करते हैं और अपना उल्लू सीधा करने के लिए मंदिरों में नागों की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं, ताकि उन के नाम पर ये लोग मंदिरों में बैठ कर के आराम से अपना पेट भर सकें, इसलिए ये कथा केवल कथा मात्र ही है, इस में सच्चाई का कोई अंश मालूम नहीं होता है।
नाग पंचमी की दन्त कथा;----- किसी भी अरब और यूरोप के देश में यह मान्यता नहीं है, कि कोई सांप, नाग किसी की मनोकामना को पूरा करते हैं, परंतु भारत ही एक ऐसा देश है जहां नाग को देवता के रूप में माना जाता है और अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है, इस दिन को नाग देवता की पूजा, अर्चना की जाती है।हिंदुओं की मान्यता:----हिंदुओं की मान्यता है कि इस दिन पूजा उपासना करने से श्रधालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं परंतु ऐसा कहीं भी कुछ नहीं होता है, अगर मनोकामनाएं पूरी होती है तो केवल मंदिरों में बैठे हुए तिलक धारियों की मनोकामना पूरी होती है, क्योंकि इस दिन का महत्व बता कर भारत के अंधविश्वासी लोग अंधाधुंध नाग पंचमी के दिन मंदिरों में जा कर दिल खोल कर चढ़ावा चढ़ाते हैं, जिस से पुजारी लोग निठल्ले बन कर के मौज मस्ती करते हुए अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं, अगर मनोकामनाएं पूर्ण हुआ करती तो भारतवर्ष में कोई भी व्यक्ति नंगा भूखा और भिखारी ना होता मगर संसार के सब देशों से अधिक नंगे, भूखे भिखारी और भूमिहीन हैं तो तो केवल भारत में ही हैं इसलिए नाग पंचमी का त्यौहार केवल मात्र जनता को ठगने का एक मात्र साधन ही है।
इच्छाधारी नाग की कल्पना:--- तिलकधारी पुजारियों ने इच्छाधारी नागों की भी कल्पना की हुई है, जिन दन्त कथा के अनुसार नाग अपनी इच्छा के अनुसार अपना रंग, रूप और स्वरूप बदल लेते हैं और मनुष्य के जीवन के लिए खतरा बन जाते हैं मगर यह सारा ढोंग मात्र ही है वैज्ञानिकों और सांप विशेषज्ञों का कहना है, कि इच्छाधारी कोई भी नाग और नागिन नहीं होते हैं, यह केवल कोरी काल्पनिक दंत कथा ही है, जिस में किसी प्रकार की कोई भी सत्यता का प्रमाण नहीं मिलता है।
पूर्व जन्म में कालिया नाग :----- हिंदू लेखकों ने बड़ी ही अजीबो गरीब कथाओं का सृजन किया हुआ है। ये पिछले और अगले जन्म की बातें लिख कर के अपनी मूर्खता का प्रमाण देते हुए यह भी लिखते हैं कि कालिया नाग पिछले जन्म में पनंग जाति का नागराज था। कालिया नाग पहले रमण नामक दीप में रहता था, जिस की पक्षीराज गरुड़ से दुश्मनी हो गई थी और वह अपनी पत्नियों के साथ यमुना नदी के कुंड में जा कर के रहने लग पड़ा था। वास्तव में ही यह दंतकथा बड़ी मूर्खता से भरी हुई है कि प्राणी का पुनर्जन्म होता है, जबकि प्राणी के शरीर में सांस अर्थात वायु ही आती जाती है, जिस के आने जाने मात्र से ही प्राणी जीवित रहता है मगर जब यह वायु का आवागमन बंद हो जाता है, तो सारे प्राणी निर्जीव हो जाते हैं। शरीर से निकली हुई वायु किस प्रकार प्राणी में जा घुसती है, किसी को पता नहीं चलता है मगर केवल भारतवर्ष के हिंदू विद्वान चिंतक, विचारक इस मूर्खता को जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं और लोगों को पुनर्जन्म, स्वर्ग-नरक के भय के आतंक में जीने के लिए विवश करते हैं, इसलिए यह दंतकथा निर्मूल और निराधार है। भारत के मूलनिवासियों को इन दंत कथाओं के ऊपर तनिक भी विश्वास नहीं करना चाहिए। नागों के मंदिर केवल याद दिलाने का साधन मात्र हैं, जिन को देख कर हम अपने पूर्वजों को प्रणाम कर लेते हैं।
राम सिंह राजवंशी।
हिमाचल प्रदेश।
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