यशस्वी नाग वंश।।
।।यशस्वी नाग साम्राज्य।।
मैंने अपनी ऐतिहासिक पुस्तक *सम्राट सिद्ध चानो और लोना उर्फ कामाख्या देवी* में आद पुरुष से चली आ रही, मूलनिवासी वंशावली के बारे में विस्तार से लिखा है, जिस में आदिकाल से चली आठवीं पीढ़ी में अवतरित सम्राट सिद्ध चानो जी के बारे में विस्तार से वर्णन किया है। उन के दरबारियों में लाल बली, भैरव बली, नाग बलि, मणिमहेश राजा उर्फ पहाड़िया बलि, होला बलि, डाऊ बली, दाई बली और भंगी बली का जिक्र किया है। वास्तव में मुझे इन्हीं महाबलीयों का कुछ इतिहास मिला है, जिस को मैंने उन के मंत्रों के आधार पर प्रमाणिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है मगर इस के अतिरिक्त और भी अन्य महा बलि हुए हैं, जो खोज का विषय है, क्योंकि तत्कालीन इतिहास यूरेशियन आर्यों ने समूल नष्ट कर दिया है, जिस के कारण सच्चाई सामने नहीं आ पा रही है, मगर जो जो तत्कालीन भाषा, सभ्यता, संस्कृति, स्थानीय लोक गाथाएं, किंबदंतियाँ, दंत कथाएं चली आ रही हैं, उन को यूरेशियन लोग आज तक मिटा नहीं सके हैं और उन्हीं के आधार पर आज हम प्राचीन इतिहास की खोज करने में लगे हुए हैं, इन्हीं प्रमाणों का जिक्र हम उन के साबर मंत्रों के आधार पर तलाशने का प्रयास कर रहे हैं, जिन में से नागवंश अत्यंत श्रेष्ठ वंश हुआ है और यह वंश अत्यंत गौरवशाली वंश हुआ है। इन के वीर, सजग प्रहरी आज भी हमें देखने को मिलते हैं। यूरेशियन लोगों के पास अपना बौद्धिक दिमाग तो था ही नहीं, इसी कारण उन्होंने भारत के ही बुद्धिजीवी मेधावी लेखकों और साहित्यकारों का सहारा ले कर के अपने नाम से वेदों, पुराणों उपनिषदों और ब्राह्मण ग्रंथों की रचना की हुई है। गुलाम मूलनिवासी लेखकों, साहित्यकारों ने भी मनुवादियों के गुलाम बन कर उन की लाइन पर लिख कर के अपना नाम रोशन करने का प्रयास किया है, जिन में महर्षि वेदव्यास, महर्षि वाल्मीक आदि ने लिखने का प्रयास किया है परंतु इन्होंने भी वास्तविक सत्यता को छुपा कर के ही लिखा हुआ है।
दिव्य शक्ति सम्राट सिद्ध चानो:--सम्राट सिद्ध चानो जी महाराज अखिल विश्व के सम्राट हुए हैं, वे मक्का मदीना से शासन चलाते थे, इसलिए उन्होंने अपने वैश्विक शासन को कई राजाओं और महाराजाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए अधिकृत किया हुआ था, जिस के लिए लाल बली, भैरव बली, नागबली, पहाड़िया बलि, हौला बलि, डाऊ बलि, दाई बलि और भंगी बली आदि अनेकों प्रभारी नियुक्त किये हुए थे, उनके दरबार में आलौकिक सूर्य, चंद्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि सप्त रत्न भी थे जिन के नाम पर सात ग्रहों का नामकरण किया गया है। ये सभी तत्कालीन समूचे विश्व के सम्राट सिद्ध चानो जी महाराज के दरबारी भी हुआ करते थे, जिन के इतिहास के बारे में केवल इन शासकों के दैविक मंत्रों से ही पता चल रहा है, जिन की सच्चाई आज भी देखी जा सकती है
नागवंशी शासन:---मैंने पिछले लेख में नाग वंश के बारे में लिखा है, उस में चीन, बर्मा ( बर्मा को अब म्यममार कहते हैं), झारखंड, छत्तीसगढ़ का वर्णन किया है, परंतु नागवंशी क्षत्रिय विश्व के कई कोनों में निवास करते थे, जिसका जिक्र उन के नाग मंदिरो से प्राप्त होता है, इन्होंने धरती के सम्पूर्ण भूभाग पर लाखों वर्षों तक शासन किया है, इन्हीं के नाम से ही कई गोत्र आज भी चलते आ रहे हैं और उन गोत्रों के परिवारों के गांवों में आज भी नाग देवता की मूर्तियां स्थापित की हुई मिलती हैं। लोग शुभ कर्म करने से पहले उन नाग मंदिरों में जा कर के, उन की पूजा करते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं, फेरियां लेते हैं और उस के बाद ही वे अपने शुभ काम शुरू करते हैं।
नागों को पूजा जाता:--- आज भी कुछ लोग नाग देवताओं को कुलदेवता भी के रूप में पूजन करते हैं, यदि श्रद्धालु उन को ऐसा मान-सम्मान नहीं देते हैं, तो वे उन परिवारों को कई प्रकार की यातनाएं भी देना शुरू कर देते हैं और यह दुख दर्द उस समय तक चलते रहते हैं, जब तक उन परिवारों के लोग नाग मंदिरों में जा कर के क्षमा याचना नहीं कर लेते हैं और दंड स्वरूप वहां यथा प्रथा के अनुसार प्रसाद नहीं चढ़ाते हैं, तब तक उन को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। आदिकालीन नाग वंशों का राज्य कई स्थानों पर था, जिन में श्रीलंका जिसे सिंहल दीप भी कहा जाता है आदि कई दीप शामिल थे। आज भी कई किलों में नौ नाग राजाओं के शासन काल के सिक्के सुरक्षित रखे हुए हैं, उन पर बृहस्पति नाग, गणपति नाग और देवनाग आदि नाम खुदे हुए मिलते हैं। इन नागों की राजधानी कहां थी, इस के बारे में किसी को ठीक ढंग से पता नहीं चल पा रहा है। वर्तमान शिलालेखों, सांस्कृतिक और पारंपरिक गाथाओं से ज्ञात हो रहा है, कि नागों का संबंध नरवर, मथुरा, भरतपुर, उज्जैन, ग्वालियर, काश्मीर, बिहार, पाकिस्तान से रहा है, इस के अतिरिक्त भी विश्व के कई कोनों में नागवंश के शासन के प्रमाण मिलते हैं।
कालिया नाग:----मथुरा के आसपास महाराजा कालिया नाग शासन करता था, जिस के बारे में कृष्ण काल में जिक्र मिलता है मगर इस समय तक नाग वंश का शासन समाप्त हो चुका था और कृष्ण का भी कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, कि मथुरा के आसपास कहीं कोई कृष्ण हुआ था भी या नहीं, जिस का प्रमाण अभी-अभी आर टी आई में मिला है, कि कृष्ण के बारे में कोई भी सटीक प्रमाण शासन प्रशासन के पास नहीं है और वैसे भी विद्वान स्कॉलरों ने है यह प्रमाणित किया है, कि कृष्ण शब्द की व्युत्पत्ति क्राइस्ट शब्द से की हुई है और इस कथन में यह सच्चाई भी ज्ञान होती है, कि यूरेशियन विदेशों से आए थे और वहां की सभ्यता और संस्कृति साथ लाए थे। वहां पर जो लोग शासन कर रहे थे, उन लोगों का अनुकरण कर के ही इन लोगों ने भारत में अपनी हिंदू सभ्यता को उभारा था इसलिए कृष्ण और कालिया नाग का संघर्ष प्रमाणित संघर्ष नहीं है और ना ही कोई ऐसा आदमी हुआ है, जो नागों के साथ मुकाबला कर सकता था, इसलिए कालिया नाग की कथा ब्राह्मणों की लिखी हुई काल्पनिक कथा है, जिस पर मूलनिवासियों को रिसर्च करने की नितांत आवश्यकता है।
गणपति नाग:--- प्रयाग के किले के भीतर दो स्तंभ लेख मिले हैं, उन में स्पष्ट लिखा है कि वहां नाग शासक राज करते थे और उन का साम्राज्य था।
अनंत नाग:--- वर्तमान जम्मू कश्मीर में नाग वंश का प्रमाण मिलता है, जिस के अंतर्गत महा अनंतनाग नामक स्थान विश्व में प्रसिद्ध है। इस इलाके में अनंतनाग नामक समुदाय का किला था, जो अनंतनाग और उस के पुत्रों के अधीन था, इसी को ही नाग लोक भी कहा जाता है अर्थात इसी धरती पर नाग लोक है, जब कि तिलकधारियों ने इस लोक की कल्पना कहीं और ही की हुई है। इन लोगों ने विशेष सम्मान का प्रतीक शेषनाग को मान कर कई महापुरुषों के सिर के ऊपर छत्र के रूप में प्रस्तुत किया हुआ है। हिंदू, जैन, बौद्ध देवताओं के सिर के ऊपर शेष छत्र आज भी देखे जा सकते हैं। असम नागालैंड, मणिपुर, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश मैं भी नाग जातियों का इतिहास बरकरार है।
भारत के मूलनिवासियों को नागवंश के इतिहास को ढूंढना चाहिए क्योंकि नागवंश के यशस्वी शासक अलौकिक शक्ति के मालिक थे, क्योंकि उन के पूर्वज सम्राट सिद्धचानो जी महाराज और मातेश्वरी लोना उर्फ कामाख्या देवी अलौकिक शक्ति संपन्न सम्राट हुए हैं, जिन के मंदिर आज भी भारत के कोने कोने में हैं और आज भी लोग उनके मंदिरों में जाकर के न्याय की गुहार लगा कर न्याय प्राप्त करते हैं, इसीलिए सम्राट सिद्ध चानो जी महाराज को सच्ची सरकार कहा जाता है।
राम सिंह आदवंशी।
हिमाचल प्रदेश।
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