नाग वंश

महाभारत काल तक नागवंश:--- आदिकाल से लेकर महाभारत काल तक नागवंश अपनी चरम सीमा पर था मगर भारत में आए विदेशी यूरेशियन आर्यों को नागवंशियों का सुशासन भयभीत करता था और सताता था। नागवंशी अपने मूलनिवासी भारतीयों के जान माल और सुरक्षा में यूरेशियन लोगों को आड़े नहीं आने देते थे। यूरेशियन लोगों ने भारत के भोले भाले लोगों को फूट डालो राज करो, छल बल, और नारी जाति का दुरूपयोग कर के भारत में पैर पसारे थे। भारत के वीर शासकों के इतिहास को खत्म कर के, मूलनिवासी वीरों को अपमानित करने का काम करना इन लोगों का पेशा बन गया था और ऐसा आज भी करते जा रहे हैं। इस समय महाराजा कालिया नाग भी मथुरा के आसपास शासन करता था। उस समय मथुरा में महाराजा कंस शासन कर रहा था, महाराजा कंस अत्यंत धर्मात्मा और लोकप्रिय शासक था, उस को भी नीचा दिखाने के लिए एक कल्पित कथा घड़ी गई है, जिस में किसी कृष्ण नामक बालक  को राजा कंस के साथ लड़ाने-झगड़ाने का नाटक लिखा गया है, जिस में राजा कंस को अत्यन्त करूर, निर्दयी, अहंकारी के रूप में दिखाया गया है, यही नहीं लाखों साल पूर्व आदिवासी सम्राट सिद्ध चानो जी महाराज को नीचा दिखाने के लिए, उन्हें कमजोर सिद्ध करने के लिए और अपमानित करने के लिए उन के साथ कृष्ण नामक बालक के साथ मल युद्ध की कथा भी घड़ी गई है। इस कथा के मल युद्ध में कृष्ण को उन की गोडी लगाते ही दर्शाया गया है, इस के साथ सम्राट सिद्ध चानो महाराज की महारानी लोना उर्फ कामाख्या देवी का कृष्ण द्वारा चरित्र हनन भी करते हुए दिखाया गया है, जो काल, समय और वातावरण की दृष्टि से तर्क संगत नहीं लगता है। कथा तर्क संगत नहीं:--- कृष्ण और सम्राट सिद्ध चानो की कथा आयु और ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाती है, क्योंकि कोई छोटा सा बालक सच्ची सरकार और वीर, शक्तिशाली सम्राट सिद्ध चानो जी के साथ मलयुद्ध कर ही नहीं सकता था मगर इस काल में नाग सभ्यता और संस्कृति इतनी चरम सीमा पर थी, जिस का कोई  भी मुकाबला नहीं कर पा रहा था। यहां कालिया नामक नाग अनेकों संघर्षों से निकल चुका था। मथुरा के आसपास उन का वंश कई वर्षों तक शासन करता आ रहा था। शेषनाग का ब्रज के इतिहास में उल्लेख मिलता है, जिस ने महाराजा नागदेव और देवताओं के अनेकों मंदिर बनवाए थे, जिन का प्रमाण आज भी ब्रज में विद्यमान है। यह शासन एक हजार वर्ष पूर्व तक चलता रहा है, इसी समय ब्राह्मणों ने तत्कालीन न्याय प्रिय राजा नंद को गद्दी से उतारने के लिए चमार जाति के एक (जब की उस समय चमार शब्द था ही नहीं, क्योंकि इस शब्द का आज से छ:सौ वर्ष पहले करूर बादशाह सिकंदर लोधी ने गुरु रविदास जी महाराज को अपमानित करने के लिए पहली बार प्रयोग कर के आरम्भ किया था, तब चमार जाति को चँवर वंशी कहते थे ) बालक को राजनीति शास्त्र में पारंगत कर के मूलनिवासी को मूलनिवासी के साथ लड़ाने के लिए तैयार किया और सम्राट के रूप में उभारा था, वही बालक चंद्रगुप्त मौर्य के नाम से विश्व में प्रसिद्ध हुआ था। इस चंद्रगुप्त मौर्य के कंधे के ऊपर चाणक्य ब्राह्मण ने अपनी बंदूकें तान कर भारतवर्ष में शासन किया था और उन्हीं से ही गुप्त वंश का शासन प्रारंभ हुआ था। इस गुप्त वंश ने नाग देवताओं को ब्राह्मणों की साजिश के तहत छल-बल से पराजित किया था, ताकि वीर, बहादुर नागवंशी ब्राह्मणों की कठपुतली गुप्तवंश के शासकों के हाथों पराजित हो कर के क्षीण हो सकें। आज भी प्रयाग किले के भीतर स्तंभ लेख सुरक्षित पड़े हुए हैं, जिन में स्पष्ट लिखा हुआ है, कि सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने गणपति नाग को पराजित किया था। वहाँ गणपति नाग के समय के सिक्के आज भी उपलब्ध हैं। महाभारत में भी अनेकों नागों का वर्णन मिलता है। पांडवों ने नागौर से मगध साम्राज्य को छीन लिया था। खांडव वन को जला दिया था, जिसमें धोखे से नागों को नष्ट किया गया था। वास्तव में यह प्रमाणिक लगता है, क्योंकि यूरेशियन आर्य आक्रमणकारियों ने सिंधु घाटी की सभ्यता को भी चारों तरफ आग लगा कर के आग के हवाले कर के सिंधु घाटी का इतिहास समाप्त किया था जिस के स्टीक प्रमाण सिंधुघाटी की सभ्यता के जनमेजय सर्प यज्ञ आदि हैं, इस यज्ञ से भी यही ज्ञात होता है, कि यूरेशियन आर्यों ने नागवंशी राजाओं का घोर विरोध किया था, जिस समय सिकंदर भारत में आया था तब सबसे पहले उसे तक्षशिला का नागवंशी राजा ही मिला था, उस राजा ने सिकंदर का कई दिनों तक तक्षशिला में आतिथ्य सत्कार किया था और अपने यूरेशियन दुश्मन के विरोध में चढ़ाई करने के लिए संयुक्त प्रयास किया था। तिब्बत के लोग अपनी भाषा को आज भी नाग भाषा कहते हैं जिस के प्रमाण खंडहरों और अवशेषों से प्राप्त हो रहे हैं। गणपति नागवंश:--- विश्व विख्यात नागवंश के वंशज गणपति वंश, शिशुनाग वंश, प्रद्योत राजवंश, त्रैकूट वंश, होयसल वंश, सेन वंश, गंग वंश, गुप्त राजवंश, कदंब वंश, काकतीय वंश, चेर वंश, शैलेंद्र वंश, चोल वंश, परमार वंश, चेदि वंश, तुलुव वंश, देवगिरी यादव वंश, कछवाह वंश, फणी नाग वंश, वाकाटक नाग वंश आदि अनेकों वंशों का इतिहास मिलता है। भार शिव नागवंश:--- कर्कोटक उत्पल वंश, सिंधिया वंश, होलकर वंश, लोहार वंश, शाही वंश, सोलंकी वंश, कलचुरी वंश, चंदेल वंश, कण्व वंश, हर्यक वंश, पांडेय राजवंश, कुंती वंश, मैत्रिक वंश, पुष्यभूति वंश  गुर्जर प्रतिहार वंश, संगम वंश, पाल साम्राज्य, गायकवाड वंश, सिसोदिया वंश, कर्नाटक वंश, वृहद्रथ वंश, खयरवाल राजवंश, मेघ वंश, खांट वंश आदि नाग वंश की ही उपशाखाएँ प्रतीत होती हैं, जो मूलनिवासी स्कालरों के लिए शोध का विषय है। राम सिंह आदवंशी। हिमाचल प्रदेश।

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