चँवर वंश का अंतिम योद्धा।। भाग 8।।
।। चंवर वंश का अंतिम योद्धा भाग 8।।
बादशाह सिकन्दर लोधी, गुरु रविदास महाराज को पंजाब का सूबेदार बनाने और इस्लाम धर्म का सर्वोच्च औलिया, पीर, पैगम्बर बनाए जाने के लिए घात लगा कर अर्ज करता रहा। उस ने दोनों बड़े बड़े पदों का लालच दे कर फुसलाने की खूब कोशिश की, मगर गुरु जी ने उस की फितरत को समझ कर कड़े से कड़ा और करारा जबाब दे दिया, जिस से बादशाह सिकन्दर लोधी हिल और बौखला गया था मगर गुरु जी उस को अच्छा इंसान बनने के लिए प्रवचन भी देते ही गए और वे फरमाते हैं, हे बादशाह! मनुष्य चाहे कितनी ही फितरत करे, कितनी ही चालाकियाँ करे, मगर होता वही है जो आदपुरुष को मन्जूर होता है। जिसे ईश्वर मान सम्मान बख्श देता है, उस से कौन किसी को दूर कर सकता है अर्थात आदि पुरुष जिस व्यक्ति को स्टार लगाता है उसे कोई भी छीन नहीं सकता, यदि भगवान किसी से भीख मंगवाना चाहे तो कोई भी उस काम को रोक नहीं सकता। जिस प्रकार ईश्वर रखना चाहे वैसे ही प्राणी को रहना पड़ता है और रहना भी चाहिए। इसीलिए सम्पूर्ण भगवान पर विश्वास कर के जीवन में, प्रत्येक स्थिति में मस्त हाथी की तरह चलते रहना चाहिए।
।। शब्द।।
शाह ते गदाई करदे करे राम सोई मंनजूरऐ। जिस नूं बखशिया राम बडीरिया कबन करे तिसदूरऐ।।
भीख मंगावे जी हरि दर दर किआ हुकम अदूरऐ।।
जैसे राखत राम तिऊँ रहि ना किऊँ चले जग झूरऐ।।
मसत चलो हर हालत बन्दे राम भरपूरऐ।। बादशाह सिकन्दर लोधी का हैबानियत का रूप:---- अब गुरु रविदास जी महाराज के कटु तथा कठोर वचनों को सुन कर कातिल, दम्भी, क्रूर बादशाह रुक नहीं सका और अपना हैवानों का रूप दिखाते हुए कहता है कि, तूं रहा चमार का चमार, तू क्या जाने इस्लाम और इस के बड़े बड़े पदों की अहमियत क्या होती है? हीरे, लालों की कदर तो जौहरी ही जानते हैं मगर गँवार मूर्ख तो हीरों को गधे के गल में ही डाल कर घूमते हैं। तू तो दीन और मजहब दोनों को ही रद्द करता है, जिस के कारण तू यहीं हार खा रहा है। मेरे कहने से नहीं माना तो मेरी तलवार तुझे मना लेगी। ।।शब्द।।
तूं की जाणे इस्लाम ते आहुदियां नूं अंत जात दा हो चमार ऐवैं।।
लाल हीरिआं जाणदे कदर वाले खर गल पाई के गुआर ऐवें।।
दीन मजहब ते दोहां नूं कटदा ऐ खा जाईगा ऐथे हार ऐवें।।
ऐसे मुख से जे ना मंने मना लऐगी तुझे तलवार ऐंबै।।
बादशाह सिकन्दर लोधी के क्रोध की चरम सीमा:----बादशाह सिकन्दर लोधी लाल लाल आग के अंगारों की तरह जलता हुआ, गुरु जी को डराता हुआ कहता है कि, तेरी तरह दुनियाँ में कोई भी नासमझ आदमी नहीं है, जो दोनों ही बड़े बड़े पदों को लेने से मना करता हो अर्थात दोनों ही बड़े ओहदों को ठुकरा दे। जो आदमी पवित्र कुरान को नहीं मानते हैं, वे सभी नर्क के बीच भभकती हुई अग्नि में जलते हैं।
।। शब्द।।
दोहाँ अहुदियां ते होया रविदास मुनकर तेरे जिहा ना होर अनजान बसर।।
बिच दोजकी आतस जाई सड़दे जिहनी मनिंआ नहीं कुरान बसर।।
चंवर वंश का निडर वीर योद्धा:----- बादशाह सिकन्दर लोधी, गुरु रविदास जी महाराज को डराता हुआ कहता है, यदि तू इस्लाम धर्म को स्वीकार नहीं करेगा, तो मेरी तलवार बड़ी तीव्रता से तुझ काफर को अपना शिकार बना लेगी। लोधी के भयावह शब्दों को सुन कर चंवर वंश के निडर वीर योद्धा अपने आदि धर्म पर अडिग रहते हुए फरमाते हैं, कि हे बादशाह! मुझे तेरी कुरान नहीं चाहिए और तेरा स्वर्ग, ना ही तेरी हूरें, परियां। मैं अपने आदि धर्म को नहीं छोड़ूँगा, भले ही मेरी गर्दन पर तेरी तलवार चल पड़े! ये बादशाह लोधी के आतंक की इंतहा थी, जिस से गुरु रविदास जी महाराज तनिक भी विचलित नहीं हुए थे मगर ठीक इस के विपरीत गुरु जी ने बादशाह को बुरी तरह जलील कर दिया।
।।दोहे।।
जे ना माने दीन इस्लाम को तब मेरी तलवार।
इस काफर को मौत का कर दूँ बेग शिकार।।
कुरान बहिशत ना चाहिए मुझ को हूर हाजर।
निज आदधर्म को त्यागूं ना जे गल चले कटा हिंदुओं ने गुरु रविदास जी की दिव्य शक्ति का लाभ लिया:----- भारत के हिंदू सतगुरु रविदास जी महाराज की दिव्य शक्ति को भुनाते हुए कहते फिरते हैं, कि गुरु रविदास जी ने हिंदू धर्म को नहीं छोड़ा था मगर शहीद होना स्वीकार कर लिया था, परन्तु ये बिल्कुल असत्य है। गुरु जी आदि धर्म के पीर, पैगम्बर हुए हैं।
।। शब्द।।
फस मुए ऐ वेद कुरान। तिन्हाँ ना मिलिआ आ भगवान।
वेद कतेबीं ना राम रहीम जे अंतर हुआ ना गिआन।।
जिऊँ दरबी वडीरनी फिर आई वोह की जाने रस को जान।।
दीन मजहब दियां गल पाईआं फाहिआं रख लऐ इन्हाँ ते कादर आन।।
दीन इस्लाम कबूलां ना बिलकुल गरदन रखो आन।।
हिंदू और इस्लाम धर्म का पोस्टमार्टम:--- गुरु रविदास जी महाराज हिंदू और इस्लाम धर्म की काली कलई खोलते हुए फरमाते हैं कि, जो जो कुरान और वेदों के चक्कर में फंस गए, उन को कभी भगवान के दर्शन नहीं हुए। यदि अंतरात्मा में ज्ञान नहीं है, तो वेदों आदि किताबों में राम और रहीम नहीं मिलते हैं। गुरु रविदास जी हिंदू और इस्लाम धर्म को गले का फंदा मानते हुए फरमाते हैं, कि हम इस्लाम धर्म को बिल्कुल स्वीकार नहीं करेंगे, भले ही बादशाह सिकन्दर तू मेरी गर्दन पर तलवार चला दे।
गुरु रविदास की परीक्षा की चरम सीमा :--- वास्तव में, लोधी के डराने की ये अंतिम कोशिश और उन की परीक्षा की ये चरम सीमा थी, जिस तक जाने से गुरु महाराज तनिक भी नहीं डरे थे। खूनी क्रांति के समर्थक वीर योद्धा और मजलूम शूद्रों के जननायक गुरु रविदास जी महाराज को मुसलमानों और हिंदुओं ने सम्पूर्ण साधु-संत, फकीर-फक्कड़, पीर- पैगम्बर, औलिया सिद्ध कर के, अत्याचारियों के खिलाफ खूनी क्रांति को दफन कर दिया है। क्योंकि गुरु जी फरमाते हैं कि-----
सति संगति मिली रहियो माधो,
जस मधुप मखीरा।।
अर्थात जिस प्रकार मधु मक्खियां मिलजुल कर रहती हैं, वैसे ही, हे मूलनिवासी लोगो! तुम भी मधु मक्खियों की तरह मिल कर, एकता बना कर रहो, यदि कोई तुम्हें कतल करता है, तो तुम भी मधु मक्खियों की तरह इकठ्ठे हो कर टूट पड़ो और खून का बदला इन मधु मक्खियों की तरह लेलो अन्यथा पापी आप का खून बहाते रहेंगे, इसी क्रांतिकारी विचारधारा को दफन करने के लिए ही मनुवादियों ने गुरु महाराज जी को साधु, संत, भगत, पीर, पैगम्बर और औलिया सिद्ध कर के रखा है, मगर साथियो गुरु रविदास जी कोई साधु, संत और फकीर नहीं हुए हैं, वे तो निर्बलों का खून बहाने वाले अत्याचारियों के खिलाफ खूनी क्रांति के ध्वज वाहक हुए हैं और क्रांतिकारी समाजवादी नेता हुए हैं, जिन का आप सभी को अनुगमन करना होगा अन्यथा आप अत्याचारों, ब्लात्कारों के शिकार होते ही रहेंगे।
राम सिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल।
हिमाचल प्रदेश।
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