चंवर वंश का इतिहास।। भाग 6।।
।।चंवर वंश का इतिहास।।भाग 6।।
सिकंदर लोदी सदना कसाई की आश्चर्यजनक बातों को सुन कर के आपे से बाहर हो गया और क्रोधित हो कर के कहता है, कि मैं ऐसे व्यक्ति को एक क्षण के लिए भी संसार में जिंदा नहीं छोडूंगा। बादशाह कहता है, कि हे सदनिया! तू उस व्यक्ति की पहचान के बारे में बता, कि उस की क्या जात और औकात है? जो मोहम्मद से भी बड़ा नूर बन बैठा है। मैं अभी अपने अहदियों को भेज कर, उठा कर मंगवा लूंगा और मनसूर की तरह सूली पर लटका दूंगा।
।।स्वामी जी शब्द।।
सुनी गल असचरज दी पातशाह ने आया दिल दे विच मगरूर भारा।।
ऐसे बसर नूं छोडू ना एक खिंन भी बीच खलकत जमिआ शुर भारा।।
की जात ते की ऊकात उसदी बण बैठा मुहम्मदों नूर भारा।।
हुणे आहदियां भेज के सद लैसां चकूँ सूली जिवें मनसूर भारा।।
।।पातशाह दा खत लिखना।।
मन में छल कपट रखते हुए बादशाह सिकंदर लोदी ने गुरु रविदास जी महाराज को पत्र खुद लिखना शुरू कर दिया और उस में लिखता है कि:------
।।शब्द।।
पर्चा लिखदा पातशाह घात रख के मूहों दारूद सलाम लखांवदा ऐ।।
मुख मोमन दिल में तुर्क बसिआ कूड़ बोल फफड़े करांवदा ऐ।।
महम्मद दीऊ दीदार मुरीद नु जी सवजा आपदे दे अगे रखांवदा ऐ।।
आबन कदम मुबारक शहर मेरे हो अधीन लोधी अलांवदा ऐ।।
बादशाह सिकंदर लोदी दिल में घात रख कर बड़े मान सम्मान के साथ गुरु रविदास जी महाराज को सलाम लिखता है और अनेक प्रकार से उन की प्रशंसा करते हुए लिखता है, कि हे मेरे पीर मोहम्मद! हमें दर्शन दे जाओ। तुम्हारा दिल्ली आना हमारे लिए मुबारक होगा!
।।शब्द पहाड़ी।।
दिऊ दीदार दास नूं साडा लगा निहू रविदास जी। जिऊँ कर प्रीत चन्द चकोरे सूरज कोल चकोरी प्रकाश जी।।
जल बिन मीन बिन जल ज्यों तड़फत मूए तरास जी।।
मैं बिरहों हो चुका हूं तेरे नाम का याद करूं हर स्वास जी।।
जब का नाम सुना तेरा सानू पै गई महब्बत की फास जी ।।
गुरु रविदास जी महाराज की प्रशंसा के कसीदे घड़ते हुए बादशाह सिकंदर लोदी लिखता है, कि हे पीर! तुम्हारे दास को आप के साथ बहुत प्रेम हो गया है, जिस प्रकार चकोर-चकोरी पक्षी की प्रीत सूर्य से होती है। मैं आप के दर्शनों के बिना वैसे ही तरस रहा हूं, जिस प्रकार पानी के बिना मछली तड़पती है। मैं आप का नाम सुन कर के आप के वियोग में दुखी हूं, जब से मैंने आप का नाम सुना है, मुझे आप के साथ मोहब्बत की जंजीर पड़ चुकी है, इसलिए दास आप को बड़े सम्मान के साथ रथ के ऊपर सवार कर दिल्ली आमंत्रित कर रहा हूं
।।शब्द पहाड़ी।।
लै जाऊ रथ नूं कासदो हथ जोड़ के लिआवना बिठाल कर के।
ऐह लै तोहफा पढ़-पढ़ दसना जे अनपढ़ हो राज ना दसना जाहर करके।।
कदम पोच कर कर खूब फुसलानां चलो हमारे आओ उधार कर के।।
रफारफ जावत जा बनारस गए बैठे रथ दे उतिऊं उतार कर के।।
परचा दस के ते कदम पोच के ते बैठा लऐ गुरु प्यार कर के।।
भीतरघाती बादशाह सिकंदर लोदी अपना पत्र दे कर अपने अहदियों को कहता है, कि आप हाथ जोड़ कर के बड़ी विनम्रता के साथ उन को रथ के ऊपर बैठा कर लाना। यदि गुरु रविदास जी महाराज अनपढ़ हो तो उन को पत्र पढ़ पढ़ कर के सुनाना। उन के पाँव सहला सहला कर और फुसला कर के कहना, कि आप हमारा उद्धार करने के लिए दिल्ली चलो। सारथी रथ को ले कर फटाफट बनारस की ओर चल पड़ा और वहां जा कर रथ से उतर कर गुरु रविदास जी महाराज के चरणों की बन्दना करते हुए, बड़े अदब और प्यार से गुरु रविदास जी को लोधी का पैगाम देता है।
।।दोहा।।
चलिया रथ बनारसों पहुंचिआ दिल्ली आई।
शाह सिकंदर कुल कचहरी लिऊ सलाम बुलाई।।
गुरु रविदास जी महाराज ने सिकंदर के भेजे हुए पत्र को पढ़ा और तुरन्त समझ गए कि बादशाह सिकंदर लोदी ने घात लगा कर के मुझे दिल्ली बुलाया है मगर क्रांतिकारी वीर गुरु रविदास जी महाराज ने तत्काल सिकंदर लोदी का निमंत्रण स्वीकार कर के तुरन्त दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया।
सूरत वेख रविदास की मोहत हुऐ सिकंदर।
दीन हमारे आ जाए सब जग इस के अंदर।।
कुशल खिदमत कर सब बठाई आसन थाप ।महफिल लगी अरज करे शाह सिकंदर आप।।ज्यों ही बादशाह सिकंदर लोदी को पता चला कि गुरु रविदास जी महाराज उस के मुख्य द्वार पर पहुंचने वाले हैं, तो वह अपनी बेगमो और दरबारियों को साथ लेकर मुख्य द्वार पर उन का स्वागत करने के लिए पहुंच गया। उन के स्वरूप को देख कर के लोधी मोहित हो गया और झुक कर पाँवों की बन्दना करते हुए गुरु जी को अपने सिहासन की ओर ले गया, उन के चरण कमलों को सोने की परात में अपने हाथों से धो कर खूब सेवा करते हुए, गुरु रविदास जी महाराज को अपने सिंहासन पर बैठा कर बहुत बड़ी महफिल शुरू कर दी, जिस के बीच वह गुरु रविदास जी महाराज के पास दोनो हाथ जोड़ कर अर्ज करता हुआ कहता है, कि हे महाराज! हमारे भाग्य धन्य हैं!
।।कवित।।
धन मेरे भाग होई दिल्ली में विराजमान कदम मुबारक जो पाई दरबार में।।
आप के दीदार है रसूल के समान जान मिटत गुनाह सब सच्ची सरकार में।।
तुझ बिन मुझ नहीं आन जो जहान मान करत पार पुलसलात अंधकार में।।
मिठी मिठी जवां बोल मुहबत करे गुरां तांई।
भणी खग फनियर नाग उदर जो मार में।।
गुरु रविदास जी की स्तुति करते हुए, बादशाह सिकन्दर लोधी कहता है, कि आप ने दिल्ली में विराजमान हो कर हमारे दरबार को भी पवित्र कर दिया है। हमारे लिए आप के दीदार रसूल के समान हैं, जिन के दर्शन करने मात्र से ही सारे पाप और गुनाह खत्म हो जाते हैं, विषैला सांप दिल में घोर छल कपट रखता हुआ मीठी-मीठी बातें बोल रहा था, जिन को गुरु रविदास जी महाराज दिव्य दृष्टि से देख कर के समझ रहे थे, कि यह मूर्ख मुझे अपनी मक्कारी दिखा रहा है।
राम सिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल।
हिमाचल प्रदेश।
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