अध्यापक दिवस

 

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
सारे भारतवर्ष में 5 सितंबर का दिन दिवस टीचर डे के रूप में पूर्व राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन की स्मृति में मनाया जाता है। वे एक टीचर थे और सर्वोच्च पद पर पहुंच कर उन्होंने सारे अध्यापक समाज का मान सम्मान बढ़ाया था, इसी कारण इस दिन को भारत में अध्यापक दिवस के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में अध्यापक एक ऐसा व्यक्ति है, जिस के द्वारा किसी देश की उन्नति और अवनति सुनिश्चित होती है, यदि बच्चों को अच्छा श्रेष्ठ अध्यापक मिल जाए और वह अपने विद्यार्थियों का बहुमुखी विकास करने के लिए उन्हें शिक्षा प्रदान करें, तो वे छात्र अपने माता पिता, अपने गांव, अपने समाज, अपने प्रदेश और देश के लिए वरदान सिद्ध होते हैं। जितने भी महापुरुष हुए हैं, उन के बीच उन के अच्छे अध्यापकों का ही वरद हस्त होता है। जो उन्होंने उन के अंतस: मन में जीवन के नियम संजोय होते हैं, उन्हीं के कारण वे उच्च पदों पर आसीन हो कर के अपने देश प्रदेश का नाम सारे संसार में रोशन करते आए हैं।
अध्यापक दिवस मनाने के लक्ष्य:--- लगभग वर्ष के सारे दिवस किसी न किसी लक्ष्य को ले कर के मनाए जा रहे हैं, जिस लक्ष्य को ले कर के दिवस मनाए जाते हैं, उस को फोकस कर के उस के बारे में धनात्मक और ऋण आत्मक दोनों ही पक्षों पर गहन चिंतन और विश्लेषण किया जाता है, ताकि जाना जा सके, कि इस दिन को मनाने के बाद इस निश्चित लक्ष्य को कितना पूरा किया जा सका है और कितना अधूरा रह गया है। अध्यापक दिवस मनाए जाने के लिए भी कुछ कार्यक्रम और नियम तय किये गए हैं जिन के अनुसार अध्यापकों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने शिक्षा जगत में ईमानदारी और सच्ची लगन से सामाजिक कार्य करते हुए अच्छे संस्कार दे कर के अपने प्रिय छात्रों को मार्गदर्शन कर के उच्च स्थानों पर पहुंचाया हुआ होता है। इस दिन महामहिम पूर्व राष्ट्रपति राधाकृष्णन जी के जीवन के बारे में भी अध्यापक और छात्र अपने विचारों को आपस में सांझा करते हैं, जिस में उन के आदर्शों पर चल कर के छात्र और छात्राएं अपने माता-पिता, अपने गांव, अपने जिले, अपने प्रदेश और अपने देश का नाम सारे विश्व में रोशन करें मगर आज ऐसा ट्रेंड बन चुका है, कि छात्र अपने अध्यापकों को सर प्राइस गिफ्ट देते हैं, बड़ी-बड़ी मोटिवेशन दी जाती हैं। इस दिन कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिन में भी विशेष प्रकार की प्रस्तुतियां प्रस्तुत की जाती हैं, यहां तक की डॉक्टर राधाकृष्णन की याद में कार्ड बना करके बांटे जाते हैं, केक काटे जाते हैं और एक दूसरे को गिफ्ट भी दी जाती है। राधा कृष्ण के जीवन के बारे में कई प्रकार के गुणगान गाए जाते हैं, इस प्रकार इस दिवस को केवल एक दिन बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
शिक्षा जगत का विश्लेषण नहीं:--- इस दिन यह मंथन नहीं किया जाता है, कोई विश्लेषण बिल्कुल नहीं किया जाता है, कि सरकार ने छात्रों और अध्यापकों के उज्जवल भविष्य के लिए किन-किन योजनाओं को तैयार कर के लागू किया है। छात्रों के बहुमुखी विकास के लिए क्या क्या कदम उठाए गए हैं? क्या क्या कदम नहीं उठाए गए हैं? अच्छे प्रदर्शन के लिए कितने वच्चों को भी सम्मानित किया गया है? और ऐसे कितने बच्चे हैं, जो मान-सम्मान से वंचित रह गए हैं? कितने स्कॉलरशिप से वंचित हो गए हैं, जिन को स्कॉलरशिप ना मिलने के कारण अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़नी पड़ गई है। सरकार ने कभी भी यह चिंतन नहीं किया कि अध्यापकों के मान-सम्मान को बढ़ाने के लिए क्या क्या विशेष कदम उठाए जाएं? अध्यापकों में सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक कमियां हैं, उन को भी दूर करने के लिए कभी भी किसी प्रकार के किसी आयोग का गठन नहीं किया गया है, अगर किया भी गया है तो केवल उन के वेतन आदि के बारे में ही सूचनाएं मांगी गई हैं। अध्यापकों के साथ क्या-क्या अन्याय हो रहे हैं? क्या-क्या उन के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है? किन-किन बुरी परिस्थितियों से उनको गुजरना पड़ रहा है? कौन कौन अध्यापक द्रोणाचार्य की तरह एकलव्यों के अंगूठे कटवा कर छात्रों के साथ अन्याय कर रहे हैं? इन विषयों के ऊपर पांच सितंबर को किसी प्रकार का कोई भी चिंतन नहीं किया जाता है, केवल बाल दिवस की औपचारिकता ही निभाई जाती है। राष्ट्रपति राष्ट्रीय पुरस्कारों से कुछ ऐसे उन लोगों को भी सम्मानित करते हैं, जिन का चरित्र का रिकॉर्ड भी धूमिल होता है। बस यदि किसी राजनेता ने किसी का नाम रकमेंड कर दिया तो उस को राज्य व राष्ट्रीय पुरस्कार दे दिया जाता है, उस का वहुमुखी रिकार्ड नहीं देखा जाता है कि उस ने अपने कार्यकाल में कितने रिजल्ट 90% से ऊपर दिए हैं और कितने प्रतिशत उस के रिजल्ट जीरो प्रतिशत रहे हैं, बस केवल यही देखा जाता है कि अध्यापक कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता है या बीजेपी का कार्यकर्ता है, यह भी नहीं देखा जाता कि उसने दुर्गम स्थानों के ऊपर जा कर के कितना अच्छा काम किया है? जब कि जिन अध्यापकों को दुर्गम स्थानों पर भेजा जाता है, वे वहां जा कर के केवल समय काटते हैं और सरकारों को कोसते रहते हैं कि हमें बर्फ में लगा दिया है और बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं मगर कुछ ऐसे ही लोगों को सरकार पुरस्कार देती आई है, बहुत कम ऐसे लोग हैं जिन को उन की प्रतिभा, कर्मठता के अनुसार सभी राज्य सरकारें और केंद्र सरकार सम्मानित करती आईं है। योग्य, जीनियस और स्वाभिमानी अध्यापक अपना काम इमानदारी से करते हैं और किसी के सामने झुकते नहीं हैं, ना ही किसी की जी हजूरी करते हैं, ना ही किसी को अपने से ऊंचा मानते हैं और ना किसी को नीचा मानते हैं। वैसे भी कुछ योग्य लोग अपने व्यवसाय को व्यवसाय ना मान कर के, अपना पवित्र दायित्व भी समझ कर अच्छे सभ्य, सुसंस्कृत नागरिक पैदा करते हैं मगर ऐसे स्वाभिमानी अध्यापकों को मूर्ख गँवार राज नेता बार-बार परेशान करते रहते हैं, बार-बार उन की बदली करते रहते हैं और उन का मनोबल तोड़ते रहते हैं। केवल यही नहीं कि वे अपने स्वाभिमान के कारण उन गुंडा तत्वों को पूरा मान सम्मान नहीं लेते हैं  क्योंकि भारत की सारी सरकारें ही जातिवादी हैं, जाति के आधार पर अध्यापकों को अच्छे और दुर्गम स्थानों पर तैनात करती है। अति दुर्गम स्थानों पर केवल अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जाति के अध्यापकों को ही तैनात करती आई हैं और यही लोग कर्मठ अध्यापक ईमानदारी से काम करते हुए, ईश्वर से डर कर बच्चों को शिक्षा देते हैं मगर ऐसे लोगों को राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी नहीं किया जाता है और जो द्रोणाचार्य जैसे अध्यापक होते हैं, जो छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं, छुआछूत करते हैं, छात्रों पर अत्याचार करते हैं, उन्हीं को ही मनुवादी सरकारें सम्मानित करती हैं, जिस के बारे में कोई भी विश्लेषण नहीं किया जाता है कि कितने योग्य जिनीयस् अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जाति के अध्यापकों को राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया है? इस प्रकार की छल कपट पूर्ण नीति के कारण भारत की शिक्षा व्यवस्था मिट्टी में मिलती जा रही है। भारत सरकार कभी भी अनुभव नहीं करती हैं, कि जिन को हम शिक्षा मंत्री के पद पर नियुक्त कर रहे हैं, क्या वे शिक्षा की परिभाषा जानते भी है या नहीं? क्या वे पीएचडी धारी शिक्षा शास्त्रियों का मार्गदर्शन कर भी सकते हैं या नहीं? मगर इन उच्च शिक्षा प्राप्त शिक्षा शास्त्रियों के ऊपर 10-12 बड़े हुए लोगों को राज्य और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के रूप में थोंप दिया जाता है, जिन को ये उच्चतम शिक्षित लोग सलाम करना भी अपना अपमान समझते हैं और वास्तव में ही डॉ राधाकृष्णन जैसी पीएचडी धारी अध्यापकों को अगर 10वीं या 12वीं पास शिक्षा मंत्रियों के पास झुकना पड़े, तो डॉक्टर राधाकृष्णन का भी सम्मान नहीं हो सकता है। प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को शिक्षा मंत्री बनाते समय उन की योग्यता को ध्यान में अवश्य रखना चाहिए। मुझे पूरी तरह याद है कि मेरे स्कूल में एक अमीर पढ़ाई का मोआईना करने के लिए आता रहता था और सभी अध्यापकों, प्राध्यापकों को अपनी कक्षा में खड़ा हो कर के उस आदमी को अभिवादन करना पड़ता था। अनपढ़ व्यक्ति भी शिक्षा निदेशक और शिक्षा सचिव से भी बढ़ कर अध्यापकों के ऊपर रोब  जमाता था मगर मैं उस व्यक्ति को सलाम तो इसलिए करता था, कि वह मेरी उम्र से बड़ा था, बाकी मैं अपनी कक्षा में पढ़ाते समय उस के साथ मिलने के लिए नहीं जाता था, जिस के कारण वह व्यक्ति मुझ से जलन महसूस करता था परन्तु जैसे ही उस स्कूल में मेरा तीन साल का कार्यकाल पूरा हुए उस व्यक्ति ने मेरी बदली दुर्गम स्थान पर करवा दी। सरकारें ऐसे मनहूस लोगों की ही बात सुनती है। योग्य, ईमानदार अध्यापकों को सरकार मान सम्मान कम ही देती हैं और ना ही उन की फरियाद तक सुनती हैं, जो देश के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है, इसलिए आज जरूरत है कि वर्तमान सरकारों को जनता ठुकरा दे और उच्च शिक्षा प्राप्त योग्य और ईमानदार लोगों को टिकट देने वाली पार्टी की ही सरकार बनाई जाए, तभी अध्यापक दिवस मनाने के लक्ष्य पूर्ण हो सकते हैं अन्यथा अध्यापक दिवस मनाना केवल औपचारिकता मात्र ही रह जाएगा।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।

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