आरक्षण के आधार पर जीते विधायकों सासदो अपना फ्रंट लो

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,

सोहम, जय गुरुदेव!

हमारे पूर्वज गुरुओं, समाज सुधारकों, समाज सेवकों, मूलनिवासी राजनेताओं ने 85% गुलाम मूलनिवासियों की आजादी और उत्थान के लिए सारा सारा जीवन होम कर दिया है,अमर शहीदों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर के हमें गुलामी से मुक्त करने के लिए क्रूर मनुवादियों और मुसलमानों, ईसाइयों के साथ लंबी लड़ाई लड़ी है। जिस के परिणाम स्वरूप हमें विदेशियों से आजादी और मौलिक अधिकार मिले हैं। छुआछूत मिटाई गई है। गुरु रविदास महाराज ने सब से पहले हमें अपने प्राणों की बाजी लगा कर के पढ़ने लिखने का अधिकार दिलाया था। मनुवादियों ने गुरुजी को देवनागरी लिपि का प्रयोग करने नहीं दिया था। उन्होंने आदिलिपि इजाद कर के भारतवर्ष के गुलाम मूलनिवासियों को पढ़ने लिखने का रास्ता साफ किया था। संवत 1433 में गुरु रविदास जी महाराज का अवतार हुआ था, आठ साल की आयु में उन्होंने आदि लिपि का अविष्कार करना शुरू किया था। जिस को बाद में सिखों ने गुरमुखी लिपि का नाम दे दिया था, मगर गुरु रविदास जी महाराज ने जिस लिपि का अविष्कार किया था, वह मूलनिवासियों की आदिलिपि थी, इसलिए हम इस को आदिलिपि कहना उचित मानते हैं, क्योंकि गुरु रविदास जी ने अपने धर्म के बारे में कहा है:----

आद से प्रगट भयो, जाको ना कोउ अंत। 

आदधर्म गुरु रविदास का जाने विरला संत। इस से स्पष्ट होता है, कि उन की लिपि का नाम भी आदिलिपि ही था मगर उन के मोक्ष के बाद उन की लिपि को भी हाइजेक कर लिया गया था जिस के इतिहास की सच्चाई को जानने के लिए मूलनिवासियों ने लाहौर हाईकोर्ट में कई वर्षों तक मुकदमा लड़ा था, जिस के परिणाम स्वरूप सन 1932 में लाहौर हाईकोर्ट ने निर्णय दिया था, कि यह लिपि गुरु रविदास जी महाराज ने ही इजाद की हुई है। आधुनिक युग के गुरु रविदास जी महाराज पहले मूलनिवासी कवि और लेखक हुए हैं, जिन्होंने अपनी क्रांतिकारी भाषा में मूलनिवासी क्रांति का शुभारंभ किया था, उसी के परिणाम स्वरूप उन के समकालीन सन्तों, महात्माओं, कवियों और लेखकों ने मूलनिवासियों के लिए साहित्य रचना की है, जिन में से सतगुरु कबीर जी, सतगुरु नामदेव जी, सतगुरु सेन जी और सतगुरु घासी दास जी शामिल है। सब से पहले गुरु रविदास महाराज ने हीं लोकतंत्र और समाजवाद का सिद्धांत दिया था। उदाहरण के रूप में वे फरमाते हैं कि:----

ऐसा चाहूँ राज मैं जहां मिले सबन को अन्न।

छोट बड़ सब सम वसै तां रविदास रहे प्रसन।।इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि गुरु रविदास जी महाराज ने हीं लोकतंत्र को जन्म दिया है और समाजवाद का सिद्धांत उन के ही मन मस्तिष्क की देन है, जिस के परिणाम स्वरूप सारे विश्व में लोकतंत्र और समाजवाद की उत्पत्ति हुई थी, मगर भारत के मनुवादियों ने गुरु रविदास जी की मुक्ति के बाद इस सिद्धांत को दफन कर दिया था। उन के बाद महात्मा ज्योतिबा फूले जी ने मूलनिवासियों के लिए शिक्षा के दरवाजे खोलने का प्रयास किया और नारी जाति को पढ़ाने के लिए भी उन्होंने ही क्रांतिकारी कदम उठा कर अपनी पत्नी सावित्रीबाई फूले को शिक्षित कर के नारी जाति को पढ़ाने के लिए तैयार किया था। मनुवादियों ने दोनों ही दम्पति अध्यापक और अध्यापिका को बहुत परेशान किया था, उस के बाद स्वामी अछूतानंद जी महाराज और साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया और उनके साथियों ने आदधर्म मंडल की स्थापना कर के भारत के मूलनिवासियों के लिए धार्मिक और राजनीतिक मंच तैयार किया था, जिस के कारण ही मूलनिवासियों ने मूलनिवासी क्रांति आरंभ की थी। अंग्रेज सरकार सभी भारतीयों के साथ समानता का व्यवहार करते थे, परंतु मनुवादी लोग मुस्लिमानो और अंग्रेजों के शासन काल में भी भारत के मूलनिवासियों के साथ छुआछूत, शोषण, अन्याय, अत्याचार, अनाचार, व्यभिचार बलात्कार और माबलिंचिंग आदि ना जाने कितने प्रकार के दुख दिया देते थे, मगर अंग्रेजों ने इन सब के खिलाफ कानून बना कर के मनुस्मृति के सभी कानूनों को रद्द कर दिया था, जिस के परिणाम स्वरूप भारत में कानून का शासन स्थापित होने लगा था। आजादी के बाद जो आरक्षण गुरु रविदास जी महाराज ने राजाओं, महाराजाओं और बादशाहों से ले कर के मूलनिवासियों को दिया था, जो आरक्षण मंगू राम मुगोवालिया और स्वामी अछूतानंद जी महाराज ने अंग्रेजों से ले कर के मूल निवासियों को लागू करवाया था,उसी के कारण सन 1936 में पहले असैंबली चुनाव में विधायक बने थे और राजसत्ता में भागीदारी सुनिश्चित की गई थी। आजादी के बाद इस आरक्षण को कानूनी जामा पहना कर के संविधान में स्थाई रूप दिया गया है मगर आरक्षण से जीतने वाले विधायक और सांसद अपने परिजनों के पेट भरने वाले स्वार्थी नेता बन गए। कहीं टिकट ना काटा जाए उस के डर से कांग्रेस, भाजपा और अन्य मनुवादी राजनीतिक दलों के गुलाम बन कर रह गए, जिन लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए इन लोगों को विधान सभाओं और संसद में भेजा गया है, उस काम को दरकिनार कर के अपने परिवार का पालन पोषण करने में जुट गए हैं। मूलनिवासियों के ऊपर अत्याचार हो जाने पर भी ये लोग मूक दर्शक और मौनी बाबे बने रहते हैं, जब कि इन लोगों को आरक्षण से मिली हिस्सेदारी की चौकीदारी करनी चाहिए ताकि मूलनिवासियों के अधिकारों पर कोई भी डाका ना मार सके। मगर ऐसा नहीं हो सका। इन आरक्षण से बने राजनेताओं ने अपने आप को अपने परिवार के ही नौकर मान लिया जिस के कारण इन लोगों से मूलनिवासियों का विश्वास टूटता जा रहा है मगर अभी भी इन विधायकों और सांसदों को मनुवादियों के अत्याचारों को देख कर के, चुनाव जीतने के बाद अपने दलों के अनुशासन को भुला कर, अपने दलों को किक मार कर अपना एक मूलनिवासी फ्रंट बना लेना चाहिए और अपना मूलनिवासी नेता चुन कर उन लोगों के लिए विधान सभाओं और संसद में लड़ाई लड़नी चाहिए, जिन के अधिकारों की रक्षा के लिए इन को संसद और विधान सभाओं में भेजा गया है, अन्यथा आप की रोजी रोटी अधिक देर तक नहीं चलेगी और आप को गाँवों में घुसना कठिन हो जाएगा। 

रामसिंह आदवंशी। 

महासचिव, 

वहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश। 


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