मनुवादी मूलनिवासी कलाकारों गायको अधिकारियों को हाईजैक कर लेते हैं
मेरे 85% मूल निवासियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
बड़ी हैरानी की बात है कि भारतवर्ष के 85% मूलनिवासी ही उच्च कोटि के महान कारीगर, चित्रकार, कलाकार, गायक, अधिकारी और कर्मचारी होते आए हैं, परंतु ये भी बड़े दुख की बात है, कि जब वे इतने लोकप्रिय हो जाते हैं कि देश-विदेश में, इन लोगों का मान-सम्मान बढ़ जाता है और इन की लोकप्रियता जनमानस के हृदय में समा जाती है, तो भारतवर्ष के मनुवादी राजनेता इन की लोकप्रियता का लाभ उठाने के लिए इन को पंच, उपप्रधान, प्रधान, बीडीसी मैंबर, जिला परिषद मेंबर, विधायक, सांसद, राज्यपाल, राष्ट्रपति, कमीशनों और बेकार के बोर्डों, निगमों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और मैंबर बना कर के अपने जाल में फंसा लेते हैं, ताकि कहीं बड़े बड़े पदों से सेवानिवृत अधिकारी और कर्मचारी अपने मूलनिवासी समाज के लिए, अपने स्टेट्स, मान-सम्मान और लोकप्रियता के कारण निडर हो कर के राजनीति करना शुरु ना कर दें। मूलनिवासी राजनीति से दूर रखने के लिए ही ये चतुर मनुवादी इन लोगों को मूर्ख बना कर के, इन बड़े-बड़े पदों पर आसीन कर देते हैं और ये लोग भी धन दौलत और ऐश्वर्य के लालच में आ कर के अपने 85% मूलनिवासी समाज को धोखा दे कर के धन कमाने के लिए, इन के जाल में फंस कर खुद भी बर्बाद होते हैं और अपने समाज को भी बर्बाद करते हैं, इसी कारण आज 80% मूलनिवासी ही नहीं अपितु गरीब सवर्ण भी इन मनुवादियों के गुलाम हैं। 5% मूलनिवासी लोकप्रिय, सुशिक्षित और योग्य होते हुए भी उन लोगों को समझ नहीं पाते हैं, जो छल कपट से मूलनिवासी लोगों को गुलाम बनाए हुए हैं, जिस कारण ये प्रतिभा सम्पन्न, धन सम्पन्न लोग अपने समाज के साथ गद्दारी करते आ रहे हैं। यदि ये लोग मूलनिवासी राजनीतिक पार्टियों में शामिल हो कर के चुनाव लड़ें तो भारत के सारे गरीब सवर्ण और अवर्ण गरीबी से जूझते हुए नारकीय जीवन नहीं बिताएंगे।
कलाकार:--- ये भी बड़ी हैरानी की बात है कि भारत के मूलनिवासी जन्मजात ही उच्च कोटि के कलाकार होते हैं और उन की श्रेष्ठ कला का रसास्वादन मनुवादी अधिक करते हैं, परंतु जब ये लोग अपनी कड़ी मेहनत से कंगाल से धन संपन्न हो जाते हैं और जनमानस के दिलों में घर कर के प्रसिद्ध हो जाते हैं, तो इन को मनुवादी टुकड़ा डाल देते हैं, जिस के अंतर्गत इन को विधायक, सांसद, कमीशन के सदस्य आदि बना कर के इन को मूलनिवासियों से दूर कर देते हैं, यदि ये लोग साहब कांशी राम जी के मिशन को बढ़ाने के लिए आगे आएं तो भारतवर्ष में ये धन संपन्न लोग विधायक, सांसद और अधिकारी बन कर के मनुवादियों की गुलामी और लाचारी से अपने मूलनिवासियों को मुक्त करवा सकते हैं मगर ये लोग लोकप्रियता के नशे में इतने पागल हो जाते हैं, कि इन को केवल कल्याण मंत्री पद, राष्ट्रपति, विधायक, और सांसद आदि बनने का ही नजारा ही नजर आता है जब कि इन को कभी भी प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, विदेशमंत्री, रक्षा मंत्री, योजना मंत्री आदि बिल्कुल नहीं बनाते हैं। उदाहरण के तौर पर प्रसिद्ध पंजाबी लोक गायक कलाकार हंस राज "हंस" की लोकप्रियता सारे देश, विदेश और प्रदेश में फैली हुई है, इस लोकप्रिय कलाकार को मनुवादियों ने हाईजैक कर के अपने जाल में फंसा कर बहुजन समाज से दूर कर दिया है और संसद में बैठ कर भी अपने मूलनिवासी समाज के लिए कुछ नहीं कर पाता है, इसी तरह और भी कई कलाकारों की यही विडंबना है।
बड़े बड़े कर्मचारी, अधिकारी:--- अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति, अल्पसंख्यक वर्गों के कर्मचारी और अधिकारी जो बड़े-बड़े पदों पर आसीन होने के बाद लोकप्रिय और धन संपन्न हो जाते हैं, वे भी मनुवादियों के जाल में फंस जाते हैं। कहीं ये लोग अपने मूलनिवासी समाज के लिए राजनीति करना शुरु ना कर दें, जिस से रोकने के लिए मनुवादी इन को भी हाइजेक कर के विधायक, सांसद और बोर्डों के चेयरमैन, मैंबर लगा कर के धन की लालसा पैदा कर के, अपने समाज से दूर कर देते हैं और ये लोग भी धन के लालच में आ कर के, अपने समाज के साथ धोखा करते हैं, जब कि ये लोग आरक्षण का लाभ लेकर के इन पदों पर आसीन होते हैं, इस के बाबजूद भी ये आरक्षण के नाम पर कलंक बन जाते हैं। जिन मूलवासी लोगों के के अधिकारों की रक्षा करने के लिए, ये स्वार्थी लोग विधानसभाओं और संसद में जाते हैं, उन के लिए इन की जुवान बंद रहती है, कहीं इन लोगों का टिकट ना कट जाए इसलिए मुँह बन्द रख कर उन के अधिकारों की कोई पैरवी भी नहीं करते हैं। वहां भी इन स्वार्थी लोगों को केवल अपना ही परिवार नजर आता है, ये धन लोलुप लोग अपने समाज के लिए कुछ भी नहीं कर पाते हैं और अंत में दलित हो कर मर जाते हैं, इसलिए 85% मूल निवासियों को केवल अपने मूलनिवासी राजनीतिक दल बहुजन मुक्ति पार्टी और उस के संयुक्त मोर्चे के ही योग्य उम्मीबारों को जिता कर के विधानसभाओं, पंचायतों और संसद में भेजना चाहिए और जो जो अधिकारी और कर्मचारी अपने समाज के अधिकारों की रक्षा ना कर सकें, उन सभी का पूर्ण सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए अन्यथा मूलवासी जिस हालत में आज जी रहे हैं, वैसे ही भविष्य में भी इन को अभिष्पत जीवन जीना पड़ेगा, इसलिए मूलनिवासियों को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए केवल और केवल अपने वोटों के बल पर ही अपने प्रतिनिधि चुन कर सरकारें बनानी चाहियें।
रामसिंह आदवंशी।
महासचिव,
वहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।
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