85% मूलनिवासी मनुवादियों की गुलामी से कब मुक्त होंगे

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,

सोहम, जय गुरुदेव! 

गदरी बाबा स्वतंत्रता सेनानी साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया 1924 में तोप के मुंह से बच कर अपने गांव गढ़शंकर मुगोबाल वापस आ गए, तो मूलनिवासियों को गंदगी की जिंदगी जीते हुए देख कर, उन्हें आत्मग्लानि हो गई थी और अपना घर बार छोड़ कर के सारे भारत के जनसंपर्क अभियान के लिए निकल पड़े थे, जिस के परिणाम स्वरूप उन्होंने 11/12 जून 1926 को 85% मूलनिवासियों का सम्मेलन अपने ही गांव मुगोबाल (गढ़शंकर) पंजाब में आयोजित किया था, जिस को असफल बनाने के लिए मनुवादियों ने एड़ी चोटी का जोर लगा कर के गुंडागर्दी कर के रोकने का प्रयास किया था मगर उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को लिख कर के दिया था, कि हमें मनुवादी गुंडों ने धार्मिक सम्मेलन को रोकने के लिए डराना धमकाना शुरू कर दिया है, जिन को रोकने के लिए उचित कदम उठाया जाए। अंग्रेज सरकार ने सम्मेलन को आयोजित करने के लिए तत्काल पुलिस को आदेश कर दिए थे और यह सम्मेलन पुलिस के साए में किया गया था, जिस में यह घोषणा की गई थी, कि हम हिंदू नहीं हैं इसलिए आज हम घोषणा करते हैं, कि हम आदधर्म को मानने वाले आदधर्मी ही हैं और ये प्रस्ताव पास किए गए कि हम अंग्रेज सरकार को विवश करेंगे कि हमें हर सेक्टर में आरक्षण देकर के राजनीति और नौकरियों में हमारी हिस्सेदारी दे कर के 85% मूलनिवासियों को मनुवादियों की गुलामी से मुक्त किया जाए, जिस को ब्रिटिश सरकार ने मान लिया था और 85% अनुसूचित जाति के गुलाम अछूत मूलनिवासियों को राजनीति और नौकरियों में संरक्षण और आरक्षण दे दिया गया था। स्कॉलरशिप दे कर के मूलनिवासियों के बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक सहायता भी दी गई थी। दो विशेष बैच निकाल कर के अनुसूचित जाति के अध्यापक ट्रेंड किए थे और उन को ₹25 प्रति मासिक वेतन देकर के आर्थिक रूप से संपन्न करना शुरू कर दिया गया था। इसी निर्णय के परिणाम स्वरूप 1936 के असेंबली चुनावों में अछूतों के लिए आरक्षण लागू कर के भारत में कई मूलनिवासी विधायक चुने गए थे, मगर वर्तमान मनुवादी सरकार ने, जो स्वतंत्रता मिली थी, उस को खत्म करने के लिए संविधान को ही निरस्त करना शुरू कर दिया है। जिन लोगों को विधायक, सांसद और बड़े बड़े अधिकारी और कर्मचारी बनाया गया है, वे भी मनुवादी राजनीतिक दलों और उन की सरकारों के दल्ले,दलाल, गुलाम बन कर रह गए हैं। इसी आरक्षण के द्वारा मूलनिवासी बड़े बड़े अधिकारी, मूलनिवासियों की जनसंख्या के आधार पर बड़े बड़े पदों पर पहुंच चुके हैं, वे भी मनुवादियों के ही गुलाम और दलाल बन कर के मूलनिवासियों की पीठ में छुरा घोंप रहे हैं। तीस, चालीस वर्ष नौकरी करने के बाद भी ये लालची अधिकारी और कर्मचारी सबर नहीं कर रहे हैं और मनुवादियों के षड्यंत्र को समझ नहीं पा रहे हैं, रिटायरमेंट के बाद भी आरक्षण से अपनी तिजोरियां भर चुके, अमीर हो चुके मूलनिवासी अधिकारियों के रुतबे का लाभ उठाने के लिए, मनुवादी मुख्यमन्त्री और प्रधान मंत्री उन्हें ही विधायक, सांसद और कई प्रकार के लालच देकर के अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। ये लालची लोग तीस चालीस वर्षों तक धन कमा कर भी सबर नहीं करते हैं और मनुवादियों की अर्थी को उठाने के लिए उन के लालच में आ कर के विधायक सांसद और बोर्डों के चेयरमैन वन कर अपने समाज के लिए कोई काम नहीं करते हैं। ये केवल यही देखते हैं, कि रिटायरमेंट के बाद फिर उन को पांच साल के लिए नौकरी मिल गई है, यदि ये लोग अपने मूलनिवासियों को अपने पांव पर खड़ा होने के लिए साहब कांशीराम जी के अधूरे आंदोलन को पूरा करने के लिए काम करें, तो भारत के 85% मूलनिवासी भी शासक बन सकते हैं और ये उच्च शिक्षित लोग इतनी सामर्थ्य अवश्य रखते हैं, कि वे चुनाव लड़ सकते हैं, इन लोगों के पास शैक्षिक योग्यता और शासन, प्रशासन का भी अनुभव होता है, जिस से गरीबों की सरकार बन सकती है और 85% मूलनिवासी मनुवादियों की गुलामी से स्वतंत्र हो सकते हैं। केवल 85% मूलनिवासी ही स्वतंत्र नहीं होंगे अपितु गरीब मनुवादी भी अपनी गरीबी से छुटकारा पा सकते हैं। गरीबों को गरीब बनाए रखने के लिए अमीर ब्राह्मण, राजपूत, खत्री और अमीर मूलनिवासी भी आंतरिक रुप से एक हो गए हैं, जो आपस में मिल कर के गरीबों का खून पी रहे हैं, जिस षड्यंत्र को सभी जातियों के गरीब लोग समझ नहीं पा रहे हैं और ये लोग कभी भी आपस में आंतरिक समझौता कर के गरीबों, मजदूरों, मजलूमों, शोषितों और बंधुआ मजदूरों की सरकार नहीं बनाते हैं। सभी संपन्न मूलनिवासी लोगों की मूलनिवासी समाज के प्रति गद्दारी के कारण ही ये सब कुछ हो रहा है, यदि ये योग्य सेवानिवृत्त मूलनिवासी अधिकारी और कर्मचारी मनुवादियों के छल कपट और षड्यंत्र को समझ जाएं और इन की राजनीतिक पार्टियों के झांसे में आ कर के विधायक, सांसद और अन्य लालची पदों के ऊपर धन कमाना बन्द कर के केवल साहब कांशीराम जी के बहुजन आंदोलन को सफल बनाने के लिए काम करें, तो अमीर मनुवादियों का शासन-प्रशासन खत्म हो सकता है और 85% मूलनिवासियों का शासन प्रशासन स्थापित हो सकता है, मगर सेवानिवृत्त स्वार्थी, लालची, अभिमानी, घमण्डी कर्मचारियों और अधिकारियों के कारण ही साहब कांशीराम जी का वहुजन आंदोलन खत्म होता जा रहा है, यदि 85% मूलनिवासी सर्वसम्मति से निर्णय कर के राजनीतिक आरक्षण खत्म करवा लें, तो  मनुवादी राजनीतिक पार्टियों की सरकारों से दलाली खाने वाले और मूलनिवासियों के साथ गद्दारी करने वाले विधायक और सांसद नहीं बन पाएंगे। सभी मूलनिवासी एक झंडे के नीचे इकट्ठे हो कर के केवल और केवल अपने ही योग्य मूलनिवासी विधायक और सांसद चुने, तो भारत की दशा और दिशा तत्काल बदल जाएगी। ये लोग मनुवादियों के गुलाम बादशाह नहीं रहेंगे और स्वतंत्र हो कर के गरीबों के लिए कानून बना कर, सुधारवादी नीतियां तैयार कर के, भारत की धरती को बाँट कर के, धरती का दोहन कर के, सभी जातियों के लोगों को आत्मनिर्भर बना सकते हैं। यह काम केवल बहुजन मुक्ति पार्टी ही कर सकती है, केवल यही एक ऐसी पार्टी है जो सामंतवादी ब्राह्मणवादी,  लूटवादी विचारधारा की राजनीतिक पार्टियों का विरोध करती है और बाकी जितनी मूलनिवासी राजनीतिक पार्टियां हैं, वे सभी की सभी की सभी मनुवादियों की दलाल पार्टियां हैं, जो मनुवादियों के दरबार में जा कर के रात के अंधेरे में आप के अधिकारों की सौदेबाजी कर के अपना उल्लू सीधा करती हैं, जिन से बचने के लिए 85% मूलनिवासियों को बहुजन मुक्ति पार्टी को सत्ता में लाने के लिए तत्काल लामबंद हो जाना चाहिए। इसी में आप सभी का भविष्य उज्जवल होगा।

राम सिंह आदवंशी।

महासचिव,

बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश। 


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