85% मूलनिवासियों को भूमिहीन रख कर के गुलाम बनाया गया है

 

मेरी 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
भारत ही एक ऐसा देश है, जिस में जनता को बेकार रख कर के मुफ्त और जहरीले सस्ते राशन के ऊपर जीवन बिताने के लिए विवश कर दिया गया है, इस सस्ते राशन के कारण गरीब लोग भी इतने आराम परस्त हो गए हैं, कि ये लोग काम कर के खाना पसंद नहीं कर रहे हैं। इन गरीब लोगों की औरतें तो यहां तक कहती हैं, कि हमारे लिए तो कांग्रेस सरकार ही अच्छी है, जिस ने नरेगा में आरामदायक काम दे कर सुखी कर दिया है। सस्ता राशन दे कर के हमें घर पर ही आरामदायक खाना उपलब्ध कराया हुआ हैं, इसलिए हम किसी भी दूसरी पार्टी को वोट देना पसंद नहीं करते हैं। इस में सच्चाई क्या है? इस को ये गरीब 85% मूलनिवासी लोग नहीं समझ पा रहे हैं और ना ही समझते हैं कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सगी बहन हैं और दोनों ही मिल कर के 85% भोलेभाले मूलनिवासी गरीबों के खिलाफ  एक गहरा षड्यंत्र रच कर इन्हें अपना वोट बैंक बना कर के, 15% मनुवादी शासन कायम क्या हुआ है, इसी मनुवादी राज को बनाए रखने के लिए मनुवादी अपनी कपटी सरकार बनाते हैं। ये चतुर चालाक मनुवादी भोले भाले, अनपढ़ मूलनिवासियों को मूर्ख बना कर के सस्ते राशन के ऊपर पाल रहे हैं, मगर इन निठ्ठले बेकार लोगों को रोजी रोटी के साधन उपलब्ध नहीं करवा रहे हैं ताकि ये लोग अपने पांव पर खड़ा हो कर के हक हलाल की कमाई खा सकें और आत्मनिर्भर बन कर के अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकें, मिट्टी, गारे के कच्चे  मकानों को पक्का बना सकें।
भारत की धरती बन्जर पड़ी है:--- भारत की 70% उपजाऊ जमीन कुछ खाली पड़ी हुई है, कुछ बेकार के पेड़ों से दबी हुई है, जब कि धरती से ही सब कुछ पैदा किया जाता है। सोना चांदी, हीरे, मोती, जवाहरात, इस्पात, लोहा, ताम्बा, मूल्यवान धातुएं, अनाज, दालें, सब्जियां, फल, फूल सूखे मेवे आदि धरती से ही उत्पन्न किए जाते हैं और उन के बल पर ही सभी देश समृद्ध और खुशहाल होते हैं। विदेशी जमीन से ही सब कुछ पैदा करके ऐश्वर्याशाली जीवन जीते आ रहे हैं, मगर भारत ही एक ऐसा देश है जहां जमीन को खाली रख कर जनता को भूमि से वंचित रख कर बेकार और निठल्ला बना कर खाना खिलाया जाता है, जो मूलनिवासियों को गुलाम बना कर रखने के लिए मनुवादी काग्रेस, भाजपा और आप पार्टी का आपसी आंतरिक समझौता है। भारतवर्ष की सरकारों ने सारी धरती को अपने कब्जे में लेकर के मूलनिवासियों को बंधुआ मजदूरों की तरह शोषण जारी रखा हुआ है। यही 85% मूलनिवासी लोग भारत भूमि के ऊपर कृषि करते हैं मगर धरती के मालिक नहीं हैं, जिस के कारण ये भी उतना ही काम करते हैं, जितना इन को मेहनताना, वैसे भी ये लोग पराई धरती के ऊपर अपनी जान क्यों मारें? मनुवादी लोग खुद आराम से अपने महलों में बैठ कर के मौज मस्ती करते हुए आनंदमय जीवन बिताते हैं। भारत के मूल निवासियों को अपने नौकर समझ कर के काम लेते हैं और मनुवादी सरकारें उन्हीं का साथ देती हैं। मूलनिवासियों को भूमिहीन रख कर के उन का शोषण करती हैं। भारतवर्ष की उपजाऊ धरती को बेकार, बन्जर बना कर रखा गया है, जो मनुवादियों का एक षड्यंत्र है।
मैं षड्यंत्र इसलिए कह रहा हूं कि भारतवर्ष के असली मूलनिवासियों को भूमिहीन इसलिए रखा गया है ताकि ये लोग अपने लिए जमीन से खाद्य पदार्थ पैदा ही ना कर सकें। मनुवादियों की जमीन में गुलाम, बंधुआ मजदूरों की तरह खेती-बाड़ी करते रहें। उन के रहमो कर्मों पर अपने परिवार का पालन पोषण करते रहे और मनुवादी सरकार बनवाने के लिए वोट देते रहें। यदि इन मूल निवासियों को भूमि अलाट कर दी जाए, तो ये लोग आत्मनिर्भर हो जाएंगे, जिस से इन के अंदर राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक चेतना जागृत हो जाएगी, जिस को रोकने के लिए ही इन लोगों को निठल्ले बनाकर वर्षों से खेतों में गल सड़ रहे राशन को खिलाया जा रहा है, जिस से ये गरीब लोग बीमारियों के शिकार हो कर असमय में ही मौत के मुँह में जा रहे हैं। ये भूमिहीन मूलनिवासी मुसलमानों और अंग्रेजों की गुलामी से तो पूर्णत: आजाद हो गए मगर मनुवादियों ने इन को पुन: नये तरीके से अपनी नौकरी-चाकरी और गुलामी करने के लिए विवश कर रखा है
गुलामी का नया तरीका:---- जब आजादी की लड़ाई चल रही थी, तब मनुवादियों को यह पता चल गया था, कि अंग्रेज भारत छोड़ कर के जाने वाले हैं और राजसत्ता हमारे हाथ आने वाली है इसलिए ये लोग घात लगा कर यही सोच रहे थे कि जो शासन मनुस्मृति के अनुसार चलता था उस को पुन: जिंदा कैसे किया जाए? इसलिए इन्होंने गुलामी का नया तरीका इजाद कर लिया, कि हम इन को अपना नौकर और गुलाम बनाने के लिए भूमिहीन ही रखेंगे, ताकि ये लोग हमारी भूमि के ऊपर खेतीवाड़ी कर के केवल अपना पेट ही भरते रहे और जो ये लोग हमारे घरों में मेहनत, मजदूरी कर के नौकरी, चाकरी कर के धन अर्जित करेंगे, वह सारे का सारा हमारा अनाज खरीदने में खर्च हो कर हमारे ही पास आ जाएगा और हुआ भी ऐसे ही। भले ही आरक्षण से कुछ मूलनिवासी धन इकट्ठा करने में कुछ हद तक कामयाब हो गए मगर वह सारे का सारा धन वहीं खर्च हो गया, जहां उन्होंने नौकरी की है। यही मनुवादियों का लक्ष्य भी था अगर ये लोग नौकरी भी करेंगे, तो इन लोगों को हम दूरदराज के क्षेत्रों में ही तैनात कर के नौकरी करने के लिए विवश कर देंगे और वहां पर भी जो धन कमाएंगे, वहीं रोजी-रोटी पर खर्च कर के खाली हाथ ही रहेंगे, वास्तव में हुआ भी ऐसा ही है। भले ही मूलनिवासी आरक्षण के द्वारा बाबू, वैज्ञानिक, आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर प्रोफेसर आदि ऑफिसर बन गए मगर इन्होंने जो कुछ भी कमाया या जो कुछ वहां पर कमाते हैं, मकान किराए, बसों के किराए, दूध, दही और अनाज आदि खाद्य पदार्थ खरीदने पर ही खर्च कर देते हैं, जिस से वे ना तो जमीन खरीद सकते हैं और ना ही अच्छे मकान बना सकते हैं और ना ही अपने बच्चों को देश, विदेश में अच्छी शिक्षा दिला सकते हैं, ये मनुवादियों का मूलनिवासियों को गुलाम बनाए रखने के लिए नए तरह का षड्यंत्र और तरीका है।
आरक्षण को निष्प्रभावी बना दिया:--- जब मंडल आयोग लागू कर के अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों को उनचास प्रतिशत आरक्षण देना पड़ा तो कांग्रेस पार्टी ने आरक्षण को ही निर्थक, निष्प्रभावी बनाने के लिए सरकारी सेक्टर को ही खत्म करना शुरू कर दिया और आधा सरकारी सेक्टर अपने अमीर लोगों को कौड़ियों के भाव बेच दिया, जो कुछ बचा था, वह 2014 से लेकर आज तक भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने बेच कर अपने लोगों को मालामाल कर दिया। यह मनुवादी सरकारों की सोची-समझी नीति के अनुसार आरक्षण को निष्प्रभावी करने के लिए मनुवादी राजनीतिक दलों ने एक बहुत गहरा षड्यंत्र रचा हुआ है। पूना पैक्ट कर के दो वोट का अधिकार छीन कर के, एक वोट देने का अधिकार देने का समझौता किया गया था, जिस को भी वोटिंग मशीन के द्वारा वोट चुरा कर के मनुवादी सरकार बनाई जा रही हैं, उस वोट के अधिकार को फिर छीन लिया गया, जिस के आधार पर जो मूलनिवासी एमएलए और सांसद बनते भी हैं, वे भी इन के गुलाम और दलाल बन कर मूलनिवासियों की आवाज विधान सभाओं और संसद में नहीं उठाते हैं, जिस से भारत के 85% मूलनिवासी गुलामों, मजलूमों, बंधुआ मजदूरों की जिंदगी जीने के लिए विवश हो गए हैं।
यदि 85% मूलनिवासी केवल एक पार्टी के डण्डे और झंडे के नीचे इकट्ठे हो कर के चुनाव लड़ें, तो मूलनिवासियों की सरकार बन सकती है और भारत की धन और धरती बांटी जा सकती है मगर दुख इस बात का है कि थोथे, अहंकारी मूलनिवासी राज नेता कभी भी एक पार्टी के झंडे के नीचे इकट्ठे नहीं होते हैं। कांग्रेस और भाजपा के लिए वोट दिलाने वाले दल्ले, दलाल बन कर रह गए हैं, जिन से मुक्ति पाने के लिए सभी मूल निवासियों को केवल बहुजन मुक्ति पार्टी को मजबूत बनाने के लिए एकजुट हो जाना चाहिए, तभी भारतवर्ष में सभी जातियों के गरीबों को न्याय मिलेगा, भूमि और नौकरी मिलेगी और गरीबी का अंत हो सकेगा।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।

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