मूल निवासी हिन्दू नहीं।

 मेरे प्यारे भारत के मूलनिवासी साथियो,

सोहम, जय गुरुदेव!

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हिंदू शब्द का प्रयोग मुसलमानों और अंग्रेजों ने भारत वासियों को एक गाली के रूप में प्रयोग किया है मगर विदेशी यूरेशियन आर्यों ने इसे अपना धर्म मानकर अपने अपने विदेशी लोगों को एक झंडे तले इकट्ठा करने के लिए स्वीकार कर लिया है और इस धर्म के अवतार राम, कृष्ण को मान कर अपनी आर्यों की एकता स्थापित की हुई है, जिन के काले नियम मनुस्मृतियों में भरे पड़े हैं, जिन का अध्ययन करने से इंसान के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ये आर्य लोग इतने निर्दयी हैं, कि अपनी ही विधवा बहू बेटियों को सती के नाम पर जिंदा जलाते आए हैं। 

यदि भारत में मुसलमान और अंग्रेज ना आते तो शायद आज भी विधवा युवतियों को जिंदा ही जलना पड़ता। इन लोगों ने मूल भारतीयों को गुलाम बना कर के ऐसे कड़े फरमान जारी कर रखे थे, कि आदमी आदमी को स्पर्श नहीं कर सकता था। ये लोग आदमी की बलि देकर के अपने देवताओं को खुश करते थे, जो घृणित काम आज भी जारी है। यदि मूल निवासी इन लोगों के सामने ऊंचे स्थान पर बैठ जाता था, तो उस के पिछवाड़े में कीलें ठोक देते थे, अगर कोई धर्म-कर्म की कथा सुनने का श्रेष्ठ कार्य करते तो उसके कान में सिक्का भर दिया जाता था। यदि कोई मूलनिवासी इन की औरत की ओर सम्मान से भी देख लेता था, तो उस की आंखें निकाल दी जाती थी। यदि कोई सत्संग प्रवचन करता था, तो उस के मुंह में गरम गरम सलाखें या गरम गरम गुड डाल दिया जाता था। धार्मिक स्थलों और मंदिरों में मूल निवासियों को घुसने नहीं दिया जाता था, जो काम आज भी जारी है। मनुवादी आर्यों के छूने से ये लोग अपवित्र और भ्रष्ट हो जाते थे, जिन को गंगा के दूषित पानी से पवित्र किया जाता था। भारत के मूलनिवासियो को ऐसे दर्दनाक तसीहे दिए जाते थे।

जब धर्म के आधार पर भारत के टुकड़े किए जाने लगे, जिस के लिए धर्मों की पहचान की गई और उन धर्मों की जनसंख्या के अनुपात में भारत के टुकड़े होने लगे, तब मोहनदास करम चंद गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल, आदि लोगों ने छल कपट और प्रपंच की नीतियां बना कर के भारत के अछूत, मूल निवासियों को भी हिंदू के रूप में अंग्रेजों के सामने प्रचारित किया था और अपनी जनसंख्या को बढ़ाया था। नाई को ठाकुर, राजा कहा गया, कुम्हार को प्रजापति कहा गया, चमार को सिल बहिया मियां कहा गया, झींबर को क्षत्रिय कहा गया। इन अनपढ़ लोगों को ऐसा जनगणना में दर्ज करने के लिए प्रेरित किया गया मगर बाद में जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान बने उस समय फिर इन लोगों को अछूत हिंदू ही घोषित कर दिया गया और उनके साथ आज भी रोटी बेटी का संबंध नहीं किया जाता है। आज भी मनुवादी मंदिरों में लिखा गया है, कि मंदिर में अछूत का प्रवेश वर्जित है, यहां तक कि वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को और उसकी पत्नी को मंदिर में घुसने तक नहीं दिया। 

दोस्तो यदि भारत के असली मूलनिवासी मनुवादियों के साथ रोटी बेटी का संबंध नहीं कर सकते हैं, जिस मूर्ति के ऊपर कुत्ते, बिल्ले, चूहे उछल कूद कर सकते हैं, उस मूर्ति के पास मूलनिवासी सिर झुका कर के पूजा नहीं कर सकते, जिन मूल निवासियों के छूने से मनुवादी अपवित्र हो जाते हैं, मूल निवासियों की परछाई से मनुवादी भ्रष्ट हो जाते हैं, फिर उन्हीं भारत के मूल निवासियों को हिंदू किस प्रकार कहा जा सकता है? 

वास्तव में भारत के मूलनिवासी आदिकाल से चली आ रही परंपरा के अनुसार आद धर्म को मानने वाले आदिधर्मी, आदिवासी है, आदवंशी हैं, मूल निवासी है, इसलिए भारत के 85% मूलनिवासियों को हिंदू नहीं कहा जा सकता है और आने वाली जनगणना में अपना धर्म, आद धर्म ही लिखें, तभी भारत के मूल निवासियों की एकता स्थापित हो सकेगी और मूलनिवासी शासन भी स्थापित होगा अन्यथा मनुवादियों के गुलाम ही रहेंगे।

राम सिंह आदवंशी.

महासचिव,

बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश


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