।।अब कैसे छूटे नाम रट लागी।।

           ।।अब कैसे छूटे नाम रट लागी।।

गुरु रविदास जी महाराज ही विश्व में एक ऐसे संत महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने प्राणी जगत का कल्याण करने के लिए तर्कसंगत सत्संग कर के प्राणियों को सांसारिक बंधनों से मुक्ति दिलाने के लिए आजीवन अत्याचारियों, पापियों, ढोंगियों, से संघर्ष किया था। मनुस्मृतियों, वेदों, पुराणों और ब्राह्मण ग्रंथों ने भारतीय मूल निवासियों का जीना दुश्वार कर रखा था। इन्हें पढ़ने लिखने पर पाबंदी थी, सत्संग सुनने पर पाबंदी थी, पढ़ने पढ़ाने पर पाबंदी थी, अच्छा खानेपीने पर कड़ी पाबंदी थी, इस के विपरीत यदि कोई धर्म कर्म की बात सुन भी लेता था तो उन के कानों में सिक्का ढाल कर भरा जाता था, ऊंचे स्थान पर कोई मूलनिवासी बैठ जाता था, तो उस के शरीर में कीलें ठोक दी जाती थी, अगर कोई भी भक्ति, पूजा पाठ, साधना करता था, तो राम जैसे राजाओं के द्वारा शंबूक जैसे महाऋषियों को कत्ल करवा दिया जाता था। ऐसे काले युग के चलते गुरु रविदास जी महाराज जी अकेले रण क्षेत्र में उतरे और इन काले कानूनों को रद्द करने के लिए दिन रात प्रयास किया। गुरु जी समझते थे, कि ब्राह्मणों की पूजा पद्धति आडंबरपूर्ण है, जिन आडंबरों को उन्होंने अपने ज्ञान की तर्क नामक तलवार से बुरी तरह काट कर आदिपुरुष की तर्कसंगत पूजा पद्धति को जन्म दिया और ब्राह्मणों के आडंबरों का भी अपनी ज्ञान रूपी तलवार से कत्लेआम किया है। इसीलिए इस शब्द में गुरुजी संगत को अपनी भक्ति के बारे में समझाते हैं:---
अब कैसे छूटे नाम रट लागी।।टेक।।
गुरु रविदास जी महाराज परमपिता परमेश्वर को संबोधित करते हुए कहते हैं, कि हे आदपुरुष! अब मैंने आप का लड़ पकड़ लिया है, अब आप किस प्रकार छूट सकते हैं? अब मेरे मन में तो यही लगन लगी हुई है, कि आप का ही ध्यान करूं और आप को ही देखूँ।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग-अंग बास समानी।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज ब्राह्मणों के तिलक आदि आडंबरों का कत्लेआम करते हुए फरमाते हैं, कि ये लोग पानी के साथ चंदन को घिस कर, किस प्रकार पत्थर की मूर्तियों को तिलक लगाते हैं, परंतु गुरु जी तो संगत को फरमाते हैं, कि प्रभ तो सुगंधित चंदन का पेड़ हैं और हम पानी की तरह हैं, जिस से चंदन घुल मिल जाता है और उस की सुगंध हमारे अंग अंग में समा जाती है।
प्रभुजी तुम घन हम मोरा।
जैसे चितवत चंद चकोरा।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज परमपिता परमेश्वर की तुलना बादलों से करते हैं और फरमाते हैं, कि हे आदपुरूष! तुम तो घनघोर बादल हो और मैं उन बादलों की भयभीत करने वाली आवाज के बीच नाचने वाला मोर हूं। आप मन को मोहित करने वाले चांद हो और मैं आप को एक टक दृष्टि से देखने वाला चकोर हूं।
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोति बरै दिन राती।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज आत्मा और परमात्मा के अटूट संबंध को बताते हुए संगत को समझाते हैं, कि ईश्वर दीपक की तरह है और हम सभी आत्माएं बाती की तरह हैं, जो उस दीपक के बीच दिन रात जलती रहती हैं और चारों ओर प्रकाश होता रहता है।
प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।।४।।
गुरु रविदास जी महाराज तिलकधारी ब्राह्मणों के फूल मालाओं के आडंबरों का भी पर्दाफाश करते हुए कहते हैं, कि प्रभु तो मोती है और हम धागे हैं, जिस के बीच मोतियों को पिरो कर के माला बना कर, परमपिता परमेश्वर के गले में डाली जाती है। गुरु रविदास जी महाराज आत्मा और परमात्मा के संबंध के बारे में बताते हैं, कि आदिपुरुष सोना है, और हम उसके साथ वैसे ही मिलकर रहते हैं जैसे सुहागा रहता है।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भक्ति करै रविदासा।।५।।
गुरु रविदास जी महाराज संगत को समझाते हुए फरमाते हैं, कि आदपुरूष हमारा स्वामी है और हम उस के सेवक हैं अर्थात परमात्मा मालिक है और आत्मा उस की अनुचर है। गुरु जी संगत को फरमाते हुए कहते हैं, कि मैं रविदास चमार परमपिता परमेश्वर की ऐसी भक्ति करता हूं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

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