।।। भाई रे राम कहां???
।।भाई रे राम कहां?
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, कोई कहता है कि राम अयोध्या में रहता है ,कोई कहता है कि, भगवान आगरा और मथुरा में ही रहता है, कोई कहता मक्का मदीना में रहता है, कोई कहता यरुशलम में रहता है, कोई कहता है अमृतसर में रहता है मगर इतने पवित्र स्थानों पर जब जा कर जब हम ने देखा और उस भगवान की तलाश की, तो वहां केवल पत्थर और पत्थर की ही बनी हुई मूर्तियां नजर आई हैं, जिन की देख रेख, सुरक्षा पत्थर दिल मानव ही करता है। उन को धूप, दीप, अन्न जल और दूध केवल आदमी ही सप्लाई करता है। उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए अनेकों प्रकार के हथियार हाथों में थामे हुए हैं। उन्हें देख कर ऐसा प्रतीत होता है, कि वे सहमे हुए किसी दुश्मन के आक्रमण का सामना करने के लिए तैयार हैं। गुरु रविदास जी महाराज इन सभी पवित्र तीर्थ स्थानों का भ्रमण कर के इस परिणाम पर पहुंचे थे, कि मुझे तो इन तीर्थों पर कहीं भी भगवान नजर नहीं आया, इसलिए इन सभी भगवानों के ठेकेदारों से गुरु रविदास जी महाराज प्रश्न करते हैं, अरे भाई! मुझे यह तो बताओ, भगवान कहां रहता है? कहां उस का ठिकाना है?
भाई रे राम कहां मोहि बताओ?
सत राम ताते निकट ना आओ।।टेक।।
गुरु रविदास जी महाराज भगवानों के ठेकेदारों से प्रश्न पूछते हैं, कि हे धर्मों ठेकेदारो! मुझे यह तो बताओ कि भगवान राम कहां रहते हैं? मुझे तो यह ज्ञात हुआ है, कि सच्चा राम आप लोगों के समीप तो आता ही नहीं है।
राम कहत सब जगत भुलाना,सो राम न होई।।
करम अकरम करुणामई कैसो करत नाँव सु कोई।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज पूछते हैं, हे भगवान के ठेकेदारों आप यह समझाते हैं, कि भगवान को पाने वालों को अपना सर्वस्व भुला कर के, जगत से अपना नाता तोड़ कर जंगलों में जा कर के, राम को ढूंढना पड़ता है मगर मैं कहता हूं राम जंगलों में नहीं रहता है और ना ही ऐसे भगवान को राम कहा जा सकता है, जो जंगलों में रहता है अर्थात राम तो घट घट में विद्यमान है, वह तो हर क्षण क्षण हमें अच्छे बुरे कर्मो और अकर्मों का एहसास करवाता है और अच्छे कर्मों का अच्छा फल देता है और बुरे कर्मो का बुरा फल अवश्य देता है, फिर तुम किस राम का नाम लेते हो?
जा रामहि सबै जग जानी भरम भूले रे भाई।।
आप आप तें कोई ना जानें कहै कौन सा जाई।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि अरे भाई! यदि राम को सारा संसार जानता होता, तो फिर यह संसार भ्रम में भटक क्यों रहा है? क्यों भूल कर जंगलों में ढूंढ रहा है? आदमी अपने आप को नहीं पहचानता है, कि उस के अंदर कौन रहता है? उस को जानने वाला कौन व्यक्ति है?
तन मन लोभ परस जीतै मन गुना प्रश्न नाहिं जाई।।
अलख राम जाको ठौर न कतहूँ क्यूँ न कहो समुझाई।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज भगवानों के ठेकेदारों को पूछते हैं, कि हे भाई! आप तन और मन से लालच में फंसे हुए, उस राम को तो तुम छू तक नहीं पाते हो अगर आप लोग राम को जानते होते तो उस के रहने का स्थान क्यों नहीं बताते हो? क्यों नहीं उस के बारे में विस्तार से समझाते हो?
भन रविदास उदास ताहि ते करता क्यूँ है भाई।।
केवल करता एकहि सिर सत राम तेहि ठाईं।।४।।
गुरु रविदास जी महाराज भगवानों के ठेकेदारों से पूछते हैं, कि आप के इन झूठे आडंबरों और पाखंडों के कारण ही मैं उदास हूं, आप लोग ऐसे नाटक क्यों करते हो? मैं तो समझता हूं, कि वह कर्ता, काम करने वाला, दुनिया को चलाने वाला केवल एक ही सिर वाला है और उसका रहने का स्थान सत्य है, अर्थात जिस के मन में सच्चाई होती है, धर्म होता है, ईमान होता है, निष्कपट होता है, उस के शरीर में ही भगवान रहता है। नोट:--- इस शब्द की भाषा शैली गुरु रविदास महाराज की नही है और ऐसा प्रतीत होता है, कि इस शब्द की भावनाओं को गुरु महाराज जी के अनुयायियों ने अपने शब्दों में बांध कर इस शब्द की रचना की हुई है, क्योंकि शब्द के विन्यास में गुरु रविदास महाराज की भाषा शैली, अक्षरों और शब्दों की बनावट मेल नहीं खाती है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।
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