हरि जपत तेऊ जना पदम कवलासपति।।

 

।।हरि जपत तेऊ जना पदम कवलासपति।।
                 ।।राग मल्हार।।
गुरु रविदास जी महाराज की वैज्ञानिक सोच ने सभी धर्मों की पोल खोल करके रखी हुई है। उन्होंने हिंदू मुस्लिम और ईसाई धर्मों के अवतारों और उनके सिद्धांतों को एक ही शब्द में तर्कपूर्ण ढंग से पूरी तरह खंडित कर के रद्द कर रखा है। गुरु महाराज फरमाते हैं, कि एक ही प्रकृति का विस्तार हुआ है अर्थात विज्ञान का नियम है कि केवल ऊर्जा से ही प्राणी जगत का धरती के ऊपर पदार्पण हुआ है और वही उर्जा इलेक्ट्रॉन न्यूट्रॉन और प्रोटॉन मैं खंडित होकर प्राणी जगत को जीवन और मरण प्रदान करती है। यही ऊर्जा व ज्योति है, जो सजीव प्राणी के बीच परिलक्षित होती है। इसी ज्योति को समझने वाले विशेष ज्ञान अर्थात विज्ञान को ज्योतिर्विज्ञान कहा गया है। इसी ज्योतिर्विज्ञान को विज्ञान ने शक्ति कहा है। यह शक्ति सभी प्राणियों में समान रूप से संचरण करती है। किसी में भी कम या अधिक नहीं होती है। यह महाशक्ति किसी को गुलाम, ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा, छूत-अछूत, काला-गोरा, शिया-सुन्नी, अमीर-गरीब का रुतबा प्रधान नहीं करती है। जब कि ये सभी कमियां हिंदू, मुस्लिम ईसाई धर्मों में विद्यमान है, फिर इन धर्मों के प्रवर्तक ऊर्जा के सिद्धांत को खंडित करते हैं। इसी कुतर्कपूर्ण विखंडन से सामाजिक विघटन हुआ है और यही सामाजिक विघटन आज मानवता का दुश्मन बना हुआ है। हिंदू, मुस्लिम का दुश्मन बना हुआ है, मुस्लिम, हिंदू का दुश्मन बना हुआ है, इसी तरह हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आपस में एक दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए हैं। ईसाई भी हिंदुओं और मुस्लिमों का दुश्मन बना हुआ है। सभी धर्मों के नाम पर एक दूसरे का कत्ल करते आ रहे हैं, एक दूसरे की सीमाओं का उलंघ्घन कर के जनता के खून की नदियाँ बहाते आ रहे हैं। जिस से स्पष्ट होता है कि धर्मों के प्रवर्तकों ने कभी भी यह नहीं सोचा कि हमारी निकृष्टतम सोच, इंसान को कहां ले जाएगी? भविष्य में उतपन्न होने वाली दुश्वारियों को देख कर के इन धर्मों के अवतारों ने धर्मो का आरंभ क्यों नहीं किया था? इन्हीं कमियों को दूर करने के लिए गुरुओं के गुरु, सतगुरु रविदास जी महाराज ने, आदर्श बेगमपुरा का सिद्धांत दिया है, जिस के अनुसार संपूर्ण ज्योतिर्मंडल ही एक साम्राज्य होगा और उसका शासक भी एक ही होगा, इस साम्राज्य की कोई सीमा नहीं होगी, कोई सैन्य शक्ति नहीं होगी, बस होगा तो केवल एक गम रहित समाज अर्थात ना कोई अमीर होगा ना कोई गरीब होगा, ना कोई छोटा होगा ना कोई बड़ा होगा, ना कोई ऊँच होगा ना नीच, ना कोई गोरा होगा ना सफेद, ना कोई भी काला कलूटा समझा जायेगा। इस प्रकार गुरु रविदास जी महाराज ने सभी धर्मों को अपने ज्ञान रूपी खंडे से खंडित किया हुआ है और धरती के ऊपर इंसानियत का राज स्थापित करने के लिए नए सिद्धांत को जन्म देने का प्रयास किया है, जिस विचारधारा को हिंदुओं ने बुरी तरह नेस्तनाबूद करने का प्रयास किया है मगर शाश्वत सत्य को कोई कुचल नहीं सकता है। वह एक दिन अवश्य फलीभूत होता है। गुरु रविदास जी महाराज ने सभी धर्मों के अवतारों की पोल खोल कर कहा है कि:---
हरि जपत तेऊ जना पदम कवलासपति।।
तास सम तुलि नहीं आन कोऊ।।
ऐक ही ऐक अनेक होइ बिस्थारिउ,
आन रे आन भरपूरि सोऊ।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, हिंदुओं के तीनों मुख्य अवतारों और तैतीस करोड़ देवी देवताओं को निरंकार द्वारा पैदा किया हुआ बताया है, इसीलिए परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरुष के बराबर धरती के ऊपर कोई नहीं है। आदपुरुष ने एक से अनेकों की रचना कर के, धरती के ऊपर प्राणी जगत का विस्तार किया हुआ है। केवल और केवल वही सभी प्राणियों के बीच स्वत: ही भरपूर है अर्थात सभी सजीव प्राणियों में उस का ही अंश विद्यमान रहता है मगर निर्जीव वस्तुओं में वह नहीं रहता है, जैसा कि हिंदू विचारधारा कहती है की आदपुरुष कण-कण में विद्यमान है, जो तर्क संगत नहीं है।
जा कै भागवतु लेखीऐ अवरू नहीं पेखीऐ,
तास की जाति आछोप छीपा।।
बिआस महि लेखीऐ सनक महि पेखीऐ,
नाम की नामना सप्त दीपा।।१।।
जिन्होंने केवल और केवल एक निरंकार भगवान की भक्ति कर के उन की स्तुति में लिखा है, कि उन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं देखा है अर्थात उन्होंने किसी भी देवी देवता का नाम नहीं लिया है, उस सतगुरु नामदेव की जाति अछूत छींबा थी। महा ऋषि वेदव्यास ने वेदों और पुराणों में जो लिखा है और महाऋषि सनक के ग्रंथों को भी देखा जाए, तो उन्होंने भी केवल और केवल एकमात्र निरंकार की ही भक्ति की है और उस के बारे में लिखा है अर्थात अछूत छींबा जाति में जन्में सतगुरु नामदेव, शूद्र झीबरी के गर्भ से जन्मे वेदव्यास जी और शूद्र गुरु के शिष्य संनक ने भी एक निराकार का सिमरन कर के उन की स्तुति में जो लिखा है, उस का प्रकाश सात दीपों में फैला हुआ है अर्थात सारे संसार में प्रसिद्ध है।
जा के ईदी बकरीदि कुल गऊ रे बधु करहि,
मानीअहि शेख शहीद पीरा।।
जा के बाप वैसी करि पूत ऐसी सरी,
तिहू रे लोक परसिद्ध कबीरा।।२।।
जिस के कुल के लोग ईद और बकरीद के दिन गायों का कत्ल करके अपने शेखों, शहीदों, पीरों की मन्नत किया करते थे, उसी कुल अर्थात वंश के पिता, पितामह भी वैसा ही हलाल कर्म किया करते थे मगर उनके वंश के सपूत सतगुरु कबीर ने ऐसा नहीं किया और कहा:---
बकरी खाती पाती है ताकि काढ़ी खाल।
जे नर बकरी खात है तिन का कौन हवाल।।
इस से ज्ञात होता है कि, सतगुरु कबीर जी जीव हत्या के खिलाफ खड़े हो गए थे। इसी कारण वे सारे संसार में प्रसिद्ध हो गए थे अर्थात जिस सतगुरु कबीर के कुल के बाप, दादा, पड़दादा ईद और बकरीद के दिन कुर्बानी देने के नाम पर गायों का कत्ल कर के हत्या करते थे। उस कुल के पिता, पितामह और पूर्वजों ने भी वैसा ही किया था मगर सतगुरु कबीर ने ऐसा वैसा नहीं किया अर्थात अपने वंश के पूर्वजों की तरह ही जीवों का कत्ल नहीं किया है, मगर इस्लाम धर्म के रीति-रिवाजों और क्रिया कर्मों को खंडित कर दिया और इस्लाम धर्म के निरंकार अल्लाह जो सातवें आकाश में रहते हैं, उन को त्याग कर के सजीव प्राणी जगत के कण-कण में व्यापक आदपुरुष का सिमरन कर के उसे प्राप्त किया है, इसी कारण सदगुरु कबीर साहेब सारे संसार में प्रसिद्ध हो गए हैं।
जा कै कुटुंभ के ढेढ सभ ढोर ढोवंत फिरहि,
अजहू बानारसी आस पासा।।
आचार सहित बिप्र करहि डंडाऊति,
तिन तनै रविदास दासन दासा।।३।।
जिसके परिवार के सभी चमार आज भी बनारस के आसपास मरे हुए पशुओं को ढ़ोते फिरते हैं, उसी परिवार के दासों के दास सतगुरु रविदास जी महाराज को केवल और केवल एक निरंकार की भक्ति करने के कारण, बड़े सम्मानजनक ढंग से, आदर सत्कार के साथ ब्राह्मण दंडवत हो कर के, दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम और झुक कर बंदना करते हैं, अर्थात जिस के परिवार के चमार जाति के लोग आज तक बनारस के आसपास मरे हुए पशुओं को ढोते फिरते हैं, उन के सपूत दासों के दास सतगुरु रविदास जी महाराज चमार को हिंदू धर्म ग्रंथों के बड़े-बड़े ज्ञाता और पारंगत विद्वान ब्राह्मण, प्रकांड पंडित भी अपने अवतारों देवी -देवताओं को खंडित कर के बड़ी विनम्रता के साथ दंडवत हो कर, झुक झुक कर विम्रता के साथ नमस्कार करते हैं। ये ब्राह्मण केवल और केवल एक निरंकार और गुरु जी के बेगमपुरा के सिद्धांत और उन की विचारधारा को स्वीकार कर के, गुरु रविदास जी चमार को बड़े आदर और सम्मान के साथ अपना आदर्श गुरु मानते हैं।
शब्दार्थ:--- तेऊ-वही। जना-लोग, श्रद्धालु। पदम-कमल के फूल के ऊपर रहने वाले विष्णु। कवलासपति-कैलासवासी हिंदुओं के देवता महेश। तास-उस। सम-बराबर। आन-दूसरा, अन्य। कोऊ-कोई। ऐक ही ऐक-केवल एक ही ऐक। अनेक होइ बिस्थारिउ-अनेकों जीवों की आत्मा में निवास कर के विस्तार किया हुआ। भरपूरि-भरपूर, व्यापक। सोऊ-वही। जाके-जिस के। भागवतु-परमात्मा। अबरू-और, अन्य। पेखीए-देखा। आछोप-अछूत। छीपा-छींबा जाति। बिआस-झीबर का पुत्र अर्थात व्यास। सनक-शूद्र गुरु का शिष्य। नाम की नामना-नाम जपने के कारण प्रसिद्धि। सप्त दीपा-सातों द्वीप। बकरीद-गाए की कुर्बानी। बधु-कत्ल, हत्या। करहि-करते हैं। मानीअहि-मान्यता होती। वैस करहि-वैसे किया। ऐसी सरी-ऐसा हुआ। तिहू लोक-तीनों लोक। ढेढ-चमार। ढोर-मरे हुए पशु। अजहू-आज, अभी। आचार सहित-मर्यादा सहित। बिप्र-ब्राह्मण। डंडाऊति-दंडवत। तिन तिनै-उन के पुत्र रविदास को। दासन दासा-दासों के गुलाम।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

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