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Showing posts from September, 2021

।।अब कैसे छूटे नाम रट लागी।।

           ।। अब कैसे छूटे नाम रट लागी।। गुरु रविदास जी महाराज ही विश्व में एक ऐसे संत महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने प्राणी जगत का कल्याण करने के लिए तर्कसंगत सत्संग कर के प्राणियों को सांसारिक बंधनों से मुक्ति दिलाने के लिए आजीवन अत्याचारियों, पापियों, ढोंगियों, से संघर्ष किया था। मनुस्मृतियों, वेदों, पुराणों और ब्राह्मण ग्रंथों ने भारतीय मूल निवासियों का जीना दुश्वार कर रखा था। इन्हें पढ़ने लिखने पर पाबंदी थी, सत्संग सुनने पर पाबंदी थी, पढ़ने पढ़ाने पर पाबंदी थी, अच्छा खानेपीने पर कड़ी पाबंदी थी, इस के विपरीत यदि कोई धर्म कर्म की बात सुन भी लेता था तो उन के कानों में सिक्का ढाल कर भरा जाता था, ऊंचे स्थान पर कोई मूलनिवासी बैठ जाता था, तो उस के शरीर में कीलें ठोक दी जाती थी, अगर कोई भी भक्ति, पूजा पाठ, साधना करता था, तो राम जैसे राजाओं के द्वारा शंबूक जैसे महाऋषियों को कत्ल करवा दिया जाता था। ऐसे काले युग के चलते गुरु रविदास जी महाराज जी अकेले रण क्षेत्र में उतरे और इन काले कानूनों को रद्द करने के लिए दिन रात प्रयास किया। गुरु जी समझते थे, कि ब्राह्मणों की...

।।राम बिन संशय गाँठि न छूटे।।

      ।।राम बिन संशय गाँठि न छूटे।। गुरु रविदास जी महाराज ने मानव मन के, शक, संशयों, संदेहों को परमपिता परमेश्वर के मिलने के रास्ते में सब से बड़ी रुकावट बताया है। गुरु जी संगत को उपदेश देते हुए फरमाते हैं, जब तक मन के संदेह दूर नहीं हो जाते हैं, तब तक किसी को भी मानसिक सुख, शांति नहीं मिल सकती है, आदिपुरुष का सपना देखना तो, दिवा स्वप्न देखने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं। राम बिन संशय ना गाँठि ना छूटे।। काम किरोध लोभ मद माया इन पंचन मिलि लूटे।। टेक।। गुरु रविदास जी महाराज संगत को संशयों के बारे में विस्तार से समझाते हुए फरमाते हैं, कि हे संगते! जब तक आप के मन के संदेहों की गांठ नहीं खुलती हैं, तब तक परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरुष के दर्शन नहीं हो सकते हैं। उस के रास्ते में काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार डेरा डाले हुए हैं। इन पांचों ने मिल कर के प्रभु मिलन के रास्ते को रोक रखा है और जो भक्ति रूपी धन दौलत हम इकट्ठा करते हैं, उस को ये पांचों लुटेरे लूट लेते हैं अर्थात इन पांचों विकारों के आधिक्य से मनुष्य अपने भक्ति के मार्ग से भटक जाता है। इसलिए इन पांचों को वश में रख क...

।।। भाई रे राम कहां???

      ।।भाई रे राम कहां? गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, कोई कहता है कि राम अयोध्या में रहता है ,कोई कहता है कि, भगवान आगरा और मथुरा में ही रहता है, कोई कहता मक्का मदीना में रहता है, कोई कहता यरुशलम में रहता है, कोई कहता है अमृतसर में रहता है मगर इतने पवित्र स्थानों पर जब जा कर जब हम ने देखा और उस भगवान की तलाश की, तो वहां केवल पत्थर और पत्थर की ही बनी हुई मूर्तियां नजर आई हैं, जिन की देख रेख, सुरक्षा पत्थर दिल मानव ही करता है। उन को धूप, दीप, अन्न जल और दूध केवल आदमी ही सप्लाई करता है। उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए अनेकों प्रकार के हथियार हाथों में थामे हुए हैं। उन्हें देख कर ऐसा प्रतीत होता है, कि वे सहमे हुए किसी दुश्मन के आक्रमण का सामना करने के लिए तैयार हैं। गुरु रविदास जी महाराज इन सभी पवित्र तीर्थ स्थानों का भ्रमण कर के इस परिणाम पर पहुंचे थे, कि मुझे तो इन तीर्थों पर कहीं भी भगवान नजर नहीं आया, इसलिए इन सभी भगवानों के ठेकेदारों से गुरु रविदास जी महाराज प्रश्न करते हैं, अरे भाई! मुझे यह तो बताओ, भगवान कहां रहता है? कहां उस का ठिकाना है? भाई रे राम कहां मोहि बत...

।।जीवन चारि दिन का मेला रे।।

       ।। जीवन चार दिन का मेला रे।। गुरु रविदास जी महाराज किसी जाति विशेष या धर्म विशेष के समर्थक नहीं थे, उन्होंने मानव निर्मित धर्मों, जातियों की बुराइयों का तर्कसंगत पोस्टमार्टम किया हुआ है। जिस में उन्होंने सभी प्रकार के आडंबरों, पाखंडों का खंडन किया है। भोले भाले लोगों को लूटने वाले ठगों, लुटेरों का बुरी तरह पर्दाफाश किया हुआ है। गुरुजी जीवन की वास्तविकता और सत्य को प्रकट करते हुए इस शब्द में फरमाते हैं, कि मनुष्य ही, मनुष्य को लूट कर, ठग कर बड़ी निर्दयतापूर्वक शोषण करता है, जबकि यह जीवन क्षणिक है। जीवन चारि दिन का मेला रे। बामन झूठा, वेद झूठा, झूठा ब्रह्म अकेला रे।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि यह जीवन एक मेंला है, जो सिर्फ चार दिन का है और उस के बाद यह मेला अर्थात मनुष्य का मिलन समाप्त हो जाता है। ब्राह्मणों ने जो यह वेदों, पुराणों में सच झूठ लिख कर के संगत को मूर्ख बना कर लूट मचाई हुई है, उस के प्रति संगत को समझाया है कि, पंडित वेद और ब्रह्मा के नाम पर घड़ा गया ब्रह्म शब्द भी झूठ है। मंदिर भीतर मूरति बैठी, पूजती बाहर चेला रे। लड्डू भोग चढ़ावति, म...

।। आरती गुरु रविदास जी महाराज द्वारा रचित।।

            । । नामु तेरो आरती।।              ।। राग धना सरी । गुरु रविदास जी महाराज ने, विश्व के सभी धर्मों के  नियमों और सिद्धांतों का अनुशीलन और गहन अध्ययन कर के अनुभव किया है, कि सभी धर्मों के प्रचारको ने अपने अपने पैगंबरों के गुणगान किए हैं और अपने अपने भगवानों की स्तुति में अपनी अपनी प्रार्थनाएं इजाद कर रखी हैं, जिन में कोई भी तर्कसंगत स्तुति नजर नहीं आती है, जो कुछ भी निरंकार को अर्पित करते हैं, वह सारे का सारा निरंकार द्वारा निर्मित है। निरंकार ने सृष्टि की रचना इस ढंग से की हुई है, कि एक प्राणी दूसरे प्राणी के ऊपर जीवन यापन करने के लिए निर्भर किया हुआ है, मगर उसी की दी हुई सामग्री को मनुष्य निरंकार को अर्पण कर के, अपनी भक्ति का थोथा प्रदर्शन करता है, इसलिए गुरु रविदास जी ने इन धर्मांध लोगों को उन की वास्तविकता का अहसास करवाते हुए कहा है, कि यह संसार "कूप भरिउ जैसे दादरा कछु देश विदेश न बूझ" अर्थात यह सारा संसार वैसे ही भरा हुआ है, जैसे कुएं के बीच मेंढक भरे हु...

।।मिलत पिआरे प्राण नाथु कवन भगति ते।।

  ।।मिलत पिआरे प्राण नाथु कवन भगति ते।।                  ।।राग मल्हार।। मैंने पहले भी कहा था कि, गुरु रविदास जी महाराज जन्मजात परिपूर्ण सन्त, गुरु, सर्वोच्च आध्यात्म के केंद्र हुए हैं, जिन का धरती के ऊपर कोई भी साम्य नहीं रखता है। जिन व्याख्याकारों ने गुरु रविदास जी को साधक के रूप में चित्रित कर के संबोधित करते हुए शब्दों की व्याख्या की है, उन्होंने गुरु जी के कद को घटाने का ही काम किया गया है। गुरु जी ने, सांसारिक कमजोरियों के भंडार मनुष्य की मुक्ति के लिए, आदपुरुष से अरजोई करते हुए, उस के पास जीव जगत और मानव के कल्याणार्थ वकालत की है। वे धरती के ऊपर आदिपुरुष के भेजे गए सम्पूर्ण अवतार थे, जिन्होंने ब्राह्मणों के आतंक से केवल भारत के मूलनिवासियों को ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व के लोगों को मुक्त कराने के लिए अपने आप को अनेकों तसीहे सहन करने के लिए प्रस्तुत किया था। गुरु जी ने शांतिपूर्ण तरीके से ब्राह्मणों को सत्य को समझने के लिए प्रेरित किया मगर भूले भटके ये लोग सत्य को नहीं समझ सके और गुरु जी को अपना ...

हरि जपत तेऊ जना पदम कवलासपति।।

  ।।हरि जपत तेऊ जना पदम कवलासपति।।                  ।।राग मल्हार।। गुरु रविदास जी महाराज की वैज्ञानिक सोच ने सभी धर्मों की पोल खोल करके रखी हुई है। उन्होंने हिंदू मुस्लिम और ईसाई धर्मों के अवतारों और उनके सिद्धांतों को एक ही शब्द में तर्कपूर्ण ढंग से पूरी तरह खंडित कर के रद्द कर रखा है। गुरु महाराज फरमाते हैं, कि एक ही प्रकृति का विस्तार हुआ है अर्थात विज्ञान का नियम है कि केवल ऊर्जा से ही प्राणी जगत का धरती के ऊपर पदार्पण हुआ है और वही उर्जा इलेक्ट्रॉन न्यूट्रॉन और प्रोटॉन मैं खंडित होकर प्राणी जगत को जीवन और मरण प्रदान करती है। यही ऊर्जा व ज्योति है, जो सजीव प्राणी के बीच परिलक्षित होती है। इसी ज्योति को समझने वाले विशेष ज्ञान अर्थात विज्ञान को ज्योतिर्विज्ञान कहा गया है। इसी ज्योतिर्विज्ञान को विज्ञान ने शक्ति कहा है। यह शक्ति सभी प्राणियों में समान रूप से संचरण करती है। किसी में भी कम या अधिक नहीं होती है। यह महाशक्ति किसी को गुलाम, ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा, छूत-अछूत, काला-गोरा, शिया-सुन्नी, अमीर-गरीब क...