सन्त तुझी तनु संगति प्राण।।
।।संत तुझी तनु संगति प्राण।।
।। राग आसा।।
गुरु रविदास जी महाराज साधु-संतों और आद पुरुष की विशेषताओं का वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि हे परमपिता परमेश्वर! आप देवताओं के देवता हैं, आप ही ज्योतिर्ज्ञानी गुरु हैं, आप ही सँगत और संतों के मानसपटल पर विद्यमान हैं, आप ही साधु संतों की सँगत के स्वास हैं अर्थात सन्त तो केवल देखने में ही संत नजर आते हैं मगर वास्तव में आप ही उन की अंतरात्मा में निवास करते हैं। सर्वश्रेष्ठ गुरु के ज्योतिर्ज्ञान से ही पता चलता है कि, संत ही देवताओं के बीच पूजनीय देवता हैं, क्योंकि संतों और आदपुरष के बीच तनिक भी अंतर नहीं है। पूर्ण सन्तों की अंतरात्मा में आप वास करते हैं।
सन्त तुझी तनु संगति प्राण।।
सतिगुर गिआन जाने, संत देवा देव।।१।।
हे आदपुरष! आप ही सन्तों के शरीर हैं, केवल ज्योतिर्ज्ञानी गुरुओं की सँगत ही आप के श्वास हैं। हे ज्योतिर्ज्ञानी सतगुरु जी! संतों ने आप के ज्ञान को समझ लिया है, वे आप के ज्ञान और रहस्य को जान गए हैं, आप संतों और देवताओं के देवता हैं।
संत की संगति, संत कथा रसु।।
संत प्रेम माझे दीजै देवा देव।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज आद पुरुष से प्रार्थना करते हैं कि, मुझे सन्तों की सँगत करने और उन के लयात्मक शब्दों को संगीतात्मक धुन में सुन कर आनंदमयी रस मिलता है। इन्हीं पूर्ण सन्तों की सँगत के प्रेम के बीच आप सभी देवताओं के देवता दर्शन देते (दीजै) हुए नजर आते हैं।
संत आचरण, संत चो मारगु।।
संत च उलंग उलुगणि।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज आदपुरष से विनम्रता पूर्वक प्रार्थना करते हैं कि, कि हे आदपुरुष ! मुझे संतों के व्यवहार, आचरण ही अच्छे लगते हैं अर्थात उन का सानिध्य मन को भाता है। मैं भी संतों के रास्ते पर चलकर आपकी और संतों की सेवा बड़ी विनम्रता से करता हूँ।
अउर इक मागउ भगति चिंतामणि।।
जणी लखावहु असंत पापी सणि।।३
गुरु रविदास जी महाराज आद पुरुष से प्रार्थना करते हैं कि हे आद पुरुष! मुझे चिंताओं को नष्ट करने वाली मणि रूपी भक्ति का वरदान दे दो। (हिंदुओं का आडंबर है कि चिंतामणि नामक पत्थर से चिंताएं खत्म हो जातीं हैं, जो तर्कसंगत नहीं लगता।) ताकि मैं पथभ्रष्ट, अज्ञानी लोगों को सन्मार्ग पर ले जा सकूं, मुझे दुर्जनों, पापियों को देखने का कभी अवसर मत देना (जणी) ना ही कभी उन का साथ (सणी) मुझे मिले।
रविदास भणे जे जाणे सो जाणु।।
संत अनंतहि अंतरु नाही।।४।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज आदपुरुष की महिमा और उन के गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि, जो आद पुरुष को समझ लेता है, पहचान लेता है, जान लेता है, वही सच्चे अर्थों में ज्ञानी (समझदार) हो सकता है, वही जान सकता है कि संतों और प्रभु के बीच कोई अंतर नहीं है। वही जानता है कि, संत और परमात्मा दोनों एक ही हैं।
शब्दार्थ:--- तुझी- तेरा। तनु- शरीर। सतिगुर- ज्योतिर्ज्ञानी गुरु, परिपूर्ण गुरु। जाने- समझना, पहचान लेना। देवादेव- देवताओं का देवता, आदपुरष। ची- की। रसु- रस, आनंद। माझे- बीच में, मुझे। दीजै- देदो। आचरण- व्यवहार, चाल चलन, बर्ताव। चों- में से, का के की। मारगु- रास्ता, राह। उलंग उलनगणि- संतों की जूठन साफ करना, विनम्रता सहित शरणागत होना। अउर- और, अन्य। चिंतामणि- हिंदुओं की कल्पित कथानुसार चिंतामणि ऐसी मणी है जो मनवाँछित फल देती है। जणी- कभी भी नहीं। लखावहु- दिखाई देना। सणी- साथ मिली हुई। भनै- वर्णन करना, कहना। जाणे- समझे। जाँणु- परिचित, पहचानना। अनंतहि- बेअंत, आदपुरष, ईश्वर। अंतरु- भेद, फर्क।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।
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