आदधर्म का मुख्य केंद्र सिंधुघाटी सभ्यता।

।।आदधर्म का मुख्य केंद्र सिंधुघाटी। सिंधु नामकरण:---सम्राट सिद्धचानो महाराज के नाम पर ही लद्दाख, तिब्बत, जम्मू काश्मीर से निकलने वाली नदी का नाम सिद्ध से बिगड़ कर सिंधु नदी पड़ा था। यही विश्व की सब से अधिक प्राचीनतम नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता हुई है। इसे हड़प्पा सभ्यता और सिंधु सभ्यता के नाम से भी विश्व में जाना जाता है। ये सभ्यता आदिकाल से चली आ रही थी, जो आज से पांच हजार साल पूर्व यूरोप और एशिया से आने वाले यूरेशियन आक्रांताओं ने बुरी तरह से तवाह कर के मनुवादी सभ्यता का निर्माण किया है। इस सभ्यता का भूभाग पाकिस्तान और पश्चिमी भारत तक फैला हुआ है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ के विश्व प्रसिद्ध पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर जनरल जान मार्शल ने सन 1924 में सिंधुघाटी सभ्यता का रहस्योउद्घाटन किया था। भारत की संस्कृति की झलक:---मोहन जोदड़ो हड़प्पा और सिंधुघाटी में आदधर्म की तत्कालीन संस्कृति के संकेत साफ झलकते हुए नजर आते हैं। खुदाई से मिले मनुष्यों के निवास स्थलों, उन की मूर्तियां, स्नानागार, अन्नागार, नर्तकियों की कांस्य मूर्तियां, दाड़ी युक्त मानव मूर्तियां, पशुपति शिव के सिक्के, हाथ से बने कपड़े, हिरण, अग्नि के फेरे लगाने वाली वेदी, भेड़ बकरियों, पशुओं ऊंट और घोड़ों की हड्डियाँ, लकड़ी के हल, बैल, मनके, जल कुंड, जल निकास सिस्टम आदि सब कुछ आदधर्म के रीति रिवाजों, व्यवस्थाओं के ही प्रतीक दृष्टिगोचर होते हैं, जिन का ब्राह्मण लेखकों ने मनुवादीकरण किया हुआ है। सिंधुघाटी के सबूत आदधर्म की पहचान:---जो अवशेष सिंधुघाटी में मिले हैं, उन से साफ साफ जाहिर होता है कि, भारत में केवल आदधर्म ही था। आदधर्मी शादी करते समय केवल लकड़ी से बनी वेदी में ही बैठ कर, जीवन साथी बनने की सौगन्ध खाते थे और आज भी खाते आए हैं। आदिपुरुष को साक्षी मॉन कर अग्नि के फेरे लेते थे और आज भी ले रहे हैं, जब कि यूरेशियन लोग स्वयंवर करते थे जो आज भी जारी है, ये आज भी मंच पर दूल्हा दुल्हन के गले में केवल जयमाला डालते हैं, दुल्हन भी दूल्हे के गले में हार डालती हैं क्योंकि ये लोग जब भारत में घुसे थे, तब इन की माली हालत दयनीय थी जिस के कारण ये लोग केवल गले में हार डाल कर ही विवाह की सारी रश्में पूरी करते थे। भारत के मूलनिवासी आदवंशी कृषि करके ही पेट पालते थे, जिस के लिए बैलों की जोड़ी के पीछे लकड़ी का हल जोड़ कर खेती करते थे, जो वर्तमान में भी जारी है। भवन निर्माण की कला:---सिंधुघाटी की भवन निर्माण की कला से भी पता चलता है कि, पांच हजार साल पूर्व तत्कालीन आदवंशी मूलनिवासी वर्तमान भवन कला के अनुसार भवन निर्माण किया करते थे। हमारे पूर्वज वाप और दादा भी मकान बनाते समय मकानों की दीवारें मोटी मोटी बनाते थे, जिन की समानता तत्कालीन भवन निर्माण कला से की जा सकती है। सिंधुघाटी से धर्म का सबूत नहीं मिला:---इस ऐतिहासिक घाटी की सभ्यता से किसी भी अन्य धर्म का कोई सबूत नहीं मिला है, जो तर्कसंगत ही लगता है। प्राचीनतम धर्म, बुद्ध धर्म को ही कहा जा रहा है, जो पच्चीस हजार साल पुराना है, जब कि धरती पर प्राणिजगत का विकास अरबों खरबों वर्ष पूर्व हुआ है। बुद्ध धर्म के बाद ही इस्लाम, हिन्दू और क्रिश्चियन धर्म की आयु मिलती है, जिस से साफ साफ ज्ञात होता है कि, भारत में सिंधुघाटी के समय तक केवल और केवल आदधर्म ही फैला हुआ था, जिसे मिटाने का काम यूरेशियन लोगों ने किया है, जो आज भी जारी है। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। अप्रैल 08, 2021।

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