आदधर्म का साम्राज्य मक्का से लेकर कन्याकुमारी तक फैला था।।

।।आदधर्म का साम्राज्य मक्का से ले कर कन्याकुमारी तक फैला था।। विश्व के किसी भी देश में वह नहीं मिलता है जो भारत के हर कोने कोने में मिलता है। छः ऋतुएँ बारी बारी आती हैं और एक दूसरे के प्रकोप को भगा देती हैं, कभी गर्मी कभी सर्दी कभी आर्द्रता आती ही रहती हैं। इसी सुहावने वातावरण के बीच हमारा विशाल भारत अपना मस्तक ऊँचा कर के समूचे विश्व के सारे लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता आ रहा है। साऊदी अरब की राजधानी मक्का तत्कालीन विशाल भारत के सम्राट कैलाश जी महाराज की भी राजधानी हुआ करती थी। जब से यूरेशियन आक्रांताओं ने भारत पर घातनीति से कब्जा किया हुआ है, तब से ही पवित्र मक्का आदवंशियों से छीन लिया गया है, उस के बाद विशाल भारतवर्ष के खण्ड खंड होते गए, ईरान इराक आदि मुस्लिम मुल्कों में बांटे जाने के बाद केवल काश्मीर से लेकर  नेपाल, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, थाईलैंड बर्मा बांग्लादेश के विभाजन से भारत देश केरल कन्याकुमारी तक सिकुड़ चुका है। जिसे फिर भी यूरेशियन आक्रमणकारियों ने मूलनिवासियों से छीन लिया है। आदवंशियों का निवास:---विशाल भारतवर्ष में केवल आदपुरुख के वंशजों का ही निवास था। भारत देश की विशेषता ये थी कि, यहां पर आद के धर्मात्मा वंशज राज करते थे, जो आदधर्म को मानते हुए सत्य ईमान और सदभावना से जीवन बसर करते थे, सभी लोग सच्चरित्र थे। ये लोग छलकपट नहीं जानते थे, पराई वस्तु को हड़पना पाप समझते थे। अध्यापक और नारी का सब से अधिक सम्मान करते थे। भारत की कला अपनी चरमसीमा पर थी, जिस का अनुमान तो मोहन जोदड़ो हड़प्पा सभ्यता से लगाया जा सकता है। प्रोफेसर श्री लालसिंह जी अपनी पुस्तक "गुरु रविदास जी दा धर्म सिंधुघाटी दे आदिवासी अछूतां दा आदि धर्म" में लिखते हैं कि सिंधुघाटी मोहनजोदड़ो के आदिवासी शूद्र और अछूत, गुरु रविदास जी के बड़े बड़ेरे पूर्वज हैं, जिन की  वे सन्तान हैं। गुरु जी के जितने बड़े महान आदधर्म सभ्यता के पूर्वज दादे पड़दादे सृजनहार थे, गुरु जी ने उन के ही महान आदधर्म और सभ्यता के ऊपर आधारित चौदवीं शताब्दी के बीच उच्च स्तरीय समय के बीच उस से भी महान आदधर्म अर्थात विश्व धर्म और वैश्विक सभ्यता का सृजन किया है, जिसे संसार ने बड़ी प्रसन्न्ता के साथ स्वीकार कर लिया है। सिंधुघाटी की सम्पूर्ण सांस्कृतिक, राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक और मानवीय सभ्यता और संस्कृति को विदेशी हमालबरों ने समूल नष्ट कर दिया था, ताकि उस स्वर्ण युग का नामोनिशान तक का भावी पीढ़ियों को पता ही ना चल सके, मगर भारत की धरती तो आदपुरुख ने केवल अपने ही सत्पुरुषों के लिए सजाई सँवारी थी जिसे भले ही छदमी, पापी, अन्यायी, अत्याचारियों, बलात्कारियों ने छीन लिया है परन्तु यही वह धरती का भूभाग है जहाँ सत्य के मार्ग पर चलने वाले आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण अबतार हुए हैं। इन्हीं अवतारों में से केवल गुरु रविदास जी महाराज ही एक ऐसे अवतार हुए जिन्होंने आदपुरुख की पवित्र भूमि को दूषित प्रदूषित करने वाले म्लेच्छों को भी सन्मार्ग पर लाने के लिए भरसक प्रयास किये हैं। आदपुरुख ने गुरु रविदास जी महाराज को ही भारत में भेजा था, जिन्होंने इन बहिशियों को सुधारने का आजीवन भरसक प्रयास किया मगर वहुत कम लोग अपने जीवन को सुधार सके। गुरु रविदास महाराज के तुल्य ज्योतिरमण्डलों में कोई भी ज्योतिर्ज्ञानी नहीं हुआ है, चाहे कोई भी धर्म हो, किसी भी दूसरे धार्मिक मत में कोई भी महापुरुष उन से साम्य रखने वाले अबतार का जन्म होंना तो दूर की बात रही है मगर कोई भी महापुरुष नहीं हुआ है, क्योंकि गुरु जी 151 वर्ष तक जीवित रहे हैं, जिस अबधि के दौरान कोई भी माई का लाल उन को कोई आंच तक नहीं पहुंचा सका था, जब कि यूरेशियन बहिशियों ने अपना एड़ी चोटी का पूरा जोर लगा लिया था, ताकि उन्हें सांसारिक पर्दे से हटा कर के, मूल भारतीयों को गुलाम बना कर रखा जा सके। दुष्ट म्लेच्छों ने, सभी धार्मिक मतों के संचालकों को यातनाएँ दीं है मगर वे संचालक अपने आप को बचा नहीं सके, किसी को सूली पर चढ़ाया गया, किसी को जीते जी ही गर्म गर्म तबों पर जलाया गया, किसी की जीते जी जिस्म से चमड़ी उतारी गई, किसी को आरों से चीरा गया, किसी का तो शीश उतारा गया, किसी को जिंदा क़ब्रों में दफन किया गया था, किसी को खूनी हाथियों के पास फेंका गया था, किसी को नदी में बहाया गया है, किसी को मारने के लिए नागों को पिटारों में बंद कर के भेजा गया, किसी वीर को जिंदा जलाया गया। ऐसे ही कत्लेआम करने की बड़ी बड़ी साजिशें गुरु रविदास जी के लिए भी घड़ी गईं थीं मगर सभी नाकाम रहीं, फिर भी कुछ दुष्ट लेखकों ने गुरु जी के पवित्र दामन पर कालिख पोतने के लिए अनर्गल बातें लिख डाली हैं, गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि:--- चमरठा गाँठि नहीं जानी-----मगर कुछ मूर्ख जाताभिमानियों ने फिर भी गुरु रविदास जी के सामने चर्मकारों की तरह चमड़े का काम करते हुए दिखाने के लिए, पत्थर की सिला के ऊपर राँबी, टांकना, अथरु, धागे, चमड़ा रख कर तश्वीरें बना बना कर, उन्हें चर्मकार सिद्ध करने का कुप्रयास किया है मगर गुरु जी के उन वंशज चँवरवंशियों ने भी कभी अपनी बुद्धि, विवेक और सामान्य ज्ञान से, अपने मनोविज्ञान से ये सोचने का तनिक प्रयास नहीं किया है, कि जब गुरु रविदास जी महाराज खुद ही फरमान कर रहे है कि, हम तो चमड़ा गाँठना नहीं जानते हैं फिर भी चमार लेखक और रिसर्चर भी गुरु जी को चमड़े का कर्म करने वाले ही पुस्तकों में लिखते आ रहे हैं, जो इन लोगों की मनुवादी गुलामी का ही असर नजर आता है। प्रोफेसर श्री लालसिंह जी लिखते हैं कि, गुरु रविदास जी महाराज ज्योतिर्ज्ञानी हुए हैं, वे तो ज्योतिरमण्डलों का गहन और आध्यात्मिक ज्ञान रखते हैं, वे उच्चतम पाये के चिंतक, विचारक, और भविष्य द्रष्टा हुए हैं, उन की गहरी, पारखी सोच, वैज्ञानिक दृष्टि, विश्व व्यापी प्रौढ़ सूझ बूझ ने आदधर्म बनाम विश्व धर्म की विचारधारा को पुनः सुरजीत कर के नया जन्म दिया है। फिर उन के दामन पर काला धब्बा लगाने वालों ने ऐसा क्यों किया? जिस का अनुमान सभी लगा सकते हैं। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। अप्रैल 30, 2021।

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