चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन।।

।।चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन।। अदमाधाम क्या है?:---अदमाधाम आदपुरुख का ऐसा स्थान है, जहाँ पर जीवन मरण, दृश्य और अदृश्य कहीं नहीं है अर्थात वह निरंकार है।कुदरत और नश्वरता उस महा खुखलान खुदा की दो भुजाएँ हैं। कुदरत जीवन का संपोषण करती है और नश्वरता विनाश करती है। अदमाधाम की गोदी में प्रेहपुरहन्त सृष्टि, अंड और करोड़ों देव अगमों व गमों का बसेरा है। देव अगमों में करोड़ ज्योतिर्मंडल एवं करोड़ों करोड़ों गगन व आकाश हैं। आकाशों में भी करोड़ों, करोड़ों धरती, सूर्य, चांद, सितारे और आकाशगंगाएं बसी हुई है। आदपुरुख निरंकार अदमाधाम का शब्द शक्ति बल है। शब्द से ही सब कुछ सृजित हुआ है। शब्द में अदभुत आकर्षण शक्ति का समावेश है। अपने शब्द शक्ति बल से आदपुरुख ने, सम्पूर्ण सृष्टि, अंड तथा सर्वदेव अगमों-गमों एवं सर्व ज्योतिरमण्डलों को ठहराया हुआ है। यदि यह शब्द शक्ति बल नहीं होता तो सारे ज्योतिर्मंडल, आकाश, आकाश गंगाएं, धरती, सूर्य, चांद, तारे और सितारे सब के कब के विलीन हो चुके हुए होते। सर्प्रथम शून्य था:---अरबों वर्ष पूर्व जब कहीं भी प्रकाश नहीं था, केवल अंधेरा ही अंधेरा था, तब अंधेरे में पार ज्योतिर्माया, एक जोत अलंभु की जुड़वीं जोत प्रकट हुई जिस से नर और मादा का शुभारंभ हुआ, जिस में ईश्वरीय ऊर्जा का संचार हुआ था। पार ज्योतिर्माया की ईश्वरीय ऊर्जा के भीतर सृजनात्मक शब्द शक्ति बल का प्रवेश हुआ था, जिससे राखी के पिंड में बम्ब शब्द का प्रगटन हुआ। इस महाविस्फोट से पदार्थ जगत की उतपत्ति हुई। सभी ज्योतिर्मडलों, आकाशों, पदार्थों, अणुओं, परमाणुओं और ईश्वरीय ऊर्जा का महाविस्तार प्रारंभ हो गया था। साथ ही पार ज्योतिर्माया ज्योत अलंभु की संयुक्त ज्योति से सत-ज्योति प्रगट हुई। पार ज्योति से धर्म कर्म जत सत सलूक प्रेम तथा माया से सत्य समर्थ शक्ति। इस सम्पूर्ण संसार को पार ज्योति की तलाश है, सभी उस को पाना चाहते हैं परन्तु माया ने ऐसा कौतुक रचा हुआ है कि इस ने सब को ही नचा कर रखा है। इस वैज्ञानिक सोच से यह निष्कर्ष निकलता है कि शब्द से ही सब कुछ बनता और बिगड़ता है अर्थात शब्द जोत ही सब कुछ है। संसार के सभी पदार्थों का उदभव एक ही शब्द से ही हुआ है और अंत में ये सर्वस्व उसी में विलीन होता रहता है। आदधर्म का ज्ञान:---प्रारंभिक आदधर्म के पास जो नैसर्गिक ज्ञान, विज्ञान है वह सर्वशक्तिमान आदपुरुख निरंकार का बताया हुआ ज्ञान है। हम इसी ज्ञान को ग्रहण करते हैं या नहीं यह हमारी आस्था और विश्वास पर निर्भर करता है परन्तु यह पूर्णरूपेण सच है कि केवल मात्र आदधर्म का ज्ञान सम्पूर्ण मानवता के लिए आध्यात्मिक व सामाजिक विकास का प्रतीक है। आदधर्म का आद ज्ञान हमें सीधा सर्वशक्तिमान आदपुरुख प्रैह्मण की ओर ले जाता है। एक केवल आदधर्म ही है, जो मानव के टूटे पड़े विश्वास को स्थायी बना सका है और बनाए रखेगा। इस से जो अति महत्त्वपूर्ण है, वह यह है कि आदधर्म मानव को जीवन और शक्ति के अनन्त स्त्रोतों तक पहुंचाता है। यह अपने सतनाम योग के द्वारा व्यक्ति को उस की आंतरिक शक्तियों को केंद्रित करने की क्षमता प्रदान करता है। आदधर्म विकास और परिवर्तन का द्योतक है। वर्तमान में आदधर्म ही मानवता की सब से बड़ी आवश्यकता है क्योंकि जिस प्रकार जड़ों के बिना पेड़ खोखला ही रहता है, ठीक उसी तरह ही धर्म के बिंना इंसान का जीवन खोखला ही रह जाता है। धर्म मानव के जीवन में विशेष ही नहीं है, महत्त्वपूर्ण भूमिका भी निभाता है। आदधर्म की विशेषताएँ:---आदधर्म ही ऐसा धर्म है, जिस का संबंध आदपुरुख से ही है, यही मूल एवं प्राचीनतम धर्म है, यही सभी मत-मतान्तरों का पितामह है, यह प्राचीनतम होते हुए भी युवा और नवीन है। यह नैसर्गिक प्रकृति प्रदत्त धर्म है, जो मानवकृत नहीं है। यही धर्म तर्क की नींव पर टिका हुआ है तर्कसंगत सर्वश्रेष्ठ धर्म है। आदधर्म की आत्मा सब से पहली और सब से वृद्ध और युवा आत्मा  है। भारत के मूलनिवासियों का धर्म केबल आदधर्म ही है। आने वाली जनगणना में सभी मूलनिवासियों को अपना धर्म "आदधर्म" ही दर्ज करना होगा। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। अप्रैल 26,2021।

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