चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन।।
।।चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन।।
नौ अप्रैल 2021के सायं सात बजे चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन का समापन करते हुए आद धर्म गुरु आरएन आदवंशी जी महाराज ने, अपने अध्यक्षीय संबोधन में, अपने विचार रखते हुए कहा, कि मैं रामसिंह आदवंशी जी का तो सब से पहले आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद करता हूँ कि, इन्होंने अपने खर्चे पर आदधर्म अधिवेशन आयोजित कर के हम सब को यहाँ इकठ्ठा किया है। मेरे लिए ये भी अति सौभाग्य का विषय है कि, मुझे इस ऐतिहासिक आदधर्म अधिवेशन की अध्यक्षता करने का भी शुभ अवसर मिला है। सभी राज्यों से आए प्रतिनिधियों का भी मैं स्वागत करता हूँ, कि आप ने इस सम्मेलन को सफल बना कर, भावी पीढ़ियों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए विचार मंथन किया है, आप ने सारा दिन बिंना एक क्षण बर्बाद किये यहाँ बैठ कर जो कर्तव्यपरायणता दिखाई है, लगन से विचार गोष्ठी को सफल बनाया है, उसे इतिहास हमेशा अपने आँचल में संजोए रखेगा।
आदपुरुष से चली आ रही मानव सभ्यता को उस समय ग्रहण लग गया था, जब भारतवर्ष के मूलनिवासियों को आर्यों ने छलबल से गुलाम बना लिया था। आदपुरुष से चले आ रहे आद धर्म को भी इन्हीं आक्रांताओं ने मलियामेट कर दिया था, फिर भी कुछ बलिदानियों ने अपने शौर्य, वीरता और साहस से आदधर्म को जिंदा रखा हुआ है और उस की रक्षार्थ अपने प्राण भी न्यौछाबर कर दिए हैं, जिन शूरवीरों में शंबूक गुरु भी एक हुए हैं, जिन का यहाँ पर उल्लेख करना, उन को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। शंबूक गुरु को इसीलिए रामचन्द्र ने कत्ल किया था कि वह आदधर्म का प्रचार प्रसार कर रहे थे जिस से विदेशी आर्य चिढ़ते थे, वे आदवंशियों से ईर्ष्या करते थे, वे भारत के मूलनिवासियों को ज्ञान का धन वितरित करते थे मगर उन्हें शहीद कर दिया गया था। उन के बाद आदधर्म का कारवां रुक गया था, फिर चौहदवीं शताब्दी में गुरु रविदास जी महाराज ने आदधर्म को पुनर्जीवित किया और कहा कि:---
आद से प्रगट भयो जा को ना कोऊ अंत।
आदधर्म रविदास का जाने बिरला सन्त।
वास्तव में, गुरु रविदास जी महाराज ने, खूनी युग में अकेले ही वह कर दिखाया था, जो कोई भी बलशाली सेना नहीं कर पाती है। बादशाहों के खूनी युग में जिस में बेटा ही सत्ता के लिए अपने वाप बादशाह का कत्ल तक कर देते थे उस समय कोई माई का लाल ऐसी जुर्रत नहीं कर सकता कि, राजसत्ता के खिलाफ मुंह खोल सके, मगर गुरु रविदास जी महाराज ने, इन्हीं खूंखार बादशाहों का मुंह हमेशा के लिए बंद कर के अपना बेगमपुरा शहर उन्हीं से आबाद करवा लिया था, जो किसी चमत्कार के कम नहीं था। गुरू जी के अवसान के बाद, आर्यों ने अपनी छद्म नीति के तहत उन का सम्पूर्ण साहित्य नष्ट कर दिया ताकि उन की विचारधारा को समाप्त किया जा सके मगर गुरु जी के बाद फिर त्रैहगुन राज ने आदधर्म को फिर जिंदा किया था, उन के बाद अठाहरबीं शदी तक फिर परम सन्त त्रिलोचन सिंह त्रेहलेप गुरु ने इस परंपरा को चला कर पल्लवित पोषित किया था। जब ये धारा भी धीमी होती होती धीमी हो ही गई तब फिर आदधर्म के ध्वज वाहक गद्दरी बाबा साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी का अभ्युत्थान 1886 इस्बी में हुआ था, जिन्होंने 11/12 जून सन 1926 को आदधर्म को पुनः जीवनदान दिया, उन के साथ स्वामी ईशरदास जी महाराज हुए जिन्होंने सन 1916 में केवल मात्र सोलह वर्ष की बाल्यावस्था में आदधर्म का पुनरूत्थान करने के लिए, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी के साथ हाथ बंटाना शुरू कर के जोखिम उठा लिया था, उन्होंने आदधर्म के प्रचार प्रसार के लिए गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ की रचना कर के, इस धर्म की कमी को पूरा किया है। ऊनीसवीं शताब्दी में ही परम सन्त त्रिलोचन सिंह त्रेहलेप जी महाराज ने, अत्यंत मधुर भाषा में अमृत गम्भा काव्यात्मक शैली में सुंदर रचना की है। ये शताब्दी हमें और आदधर्म के लिए वहुत ही महत्वपूर्ण रही है, जिस में गद्दरी बाबा साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी ने पंजाब आद धर्म मंडल की स्थापना कर के, लुप्त आदधर्म का पुनरूत्थान किया है। इस संगठन के झंडे तले उन्होंने क्रांतिकारी, उग्र आंदोलन के माध्यम से भारतीय मूलनिवासियों को मौलिक अधिकार दिलाए हैं, जिन के कारण आज मूलनिवासी सुख की सांस ले रहे हैं। उन के बाद बीसवीं शताब्दी में सन्त पालसिंह त्रेहलेप जी ने अघमी वाक और अमृत गरम अशर्फियाँ नामक ग्रँथ लिख कर मूलनिवासियों को पवित्र पुस्तक उपलब्ध करवाई है। मेरी रचना दिव्य अघमी वेद भी शीघ्र ही आप को उपलब्ध करवाया जाएगा।
आदधर्म की विशेषता:---आदपुरुष के इतिहास को गुरु परम्परा द्वारा आगे से आगे सँगत तक गुरुओं, पीरों द्वारा पहुंचाया जा रहा है। आदधर्म सर्वशक्तिमान आदपुरुख द्वारा प्रदत्त सृष्टि का प्रथम और सर्वश्रेष्ठ एवं मूल धर्म है। आदपुरुख जीवन मरण और दृश्यादृश्य के उस पार अदमा धाम में बसा हुआ हुआ है। अदमाधाम कहते हैं नरिभकार (निर्विकार) को जिस का अर्थ है, महा खुखलान खुदा यानि आप ही पिता और आप ही माता। आदपुरुख, निरंकार अदमाधाम के खोखले खोल में समाया हुआ है, आदपुरुख का स्वरूप शब्द जोत है। मैं एक से अनेक हो जाऊं, मेरा विस्तार हो जाए, आदपुरुख के इस शब्द से वह एक से अनेकों रूपों में विकसित हुआ है। आद धर्म के इस सिद्धांत को हमें भी सीखना होगा और बड़ी मजबूती से इसे थामे रखना है। क्रमशः
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अप्रैल 25, 2021।
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