चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन।।

।।चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन।। नौ अप्रैल 2021 से शुरू हुए दो दिवसीय राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन की अध्यक्षता आदधर्म गुरु आरएन आदवंशी दिल्ली को संबोधित करते हुए पूर्व बैंक प्रबंधक श्री पीसी भाटिया जी कहा कि, धर्म मानव को मानव से ही नहीं सारे प्राणिजगत से जोड़ता है। धर्म मेरे विचारानुसार तर्कसंगत, सदविचारों के समूह को कहते हैं, जिनके कारण ही व्यक्ति सभ्य सुसंस्कृत ईमानदार, और आदर्श व्यक्ति कहलाता है। ऐसे व्यक्ति ही विश्व में याद किये जाते हैं। ऐसे व्यक्ति ही विश्व में पूजनीय होते हैं मगर कुछ को इतिहास मिट्टी में ही मिला देता है, जिस के पीछे उस उच्छृंखल व्यक्ति का कटु व्यवहार, अबगुण और विचार ही होते हैं। धार्मिक व्यक्ति ही आदर्श धर्म का वाहक, सभ्य समाज का निर्माता होता है। ऐसे व्यक्ति सफल और आदर्श शासक कहलाते हैं, इसीलिए व्यक्ति का धर्म के प्रति रुझान, आकर्षण और प्रेम होना अति आवश्यक है। धार्मिक शासक ही जनता के दिलों पर शासन करते आए हैं और भविष्य में भी ऐसे हो लोग पूज्य होंगे। आज हिमाचल प्रदेश में आदधर्म का चल रहा, राष्ट्रीय अधिवेशन इस दिशा में महत्वपूर्ण रोल निभाएगा ऐसा मेरा मानना है और अनुमान भी है। मुझे ये जान कर बड़ी प्रसन्नता हुई कि 12 जून 1926 को पंजाब के गाँव मुगोबाल में, आदधर्म के राष्ट्रीय अधिवेशन में ये प्रस्ताव पारित किए गए थे कि, आदधर्म के पैगम्बर सन्त शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज, कबीर जी, नामदेव जी, सेन जी, सदना जी और वाल्मीकि जी ही होंगे। वास्तव में इन्हीं महापुरुषों ने अवतारों का काम कर के गुलाम मूल भारतीयों को आजाद करवाया है। आदधर्म के नेताओं ने ये वहुत ही महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास किया था कि, जातिपाँति को मिटा कर अंतरजातीय विवाह कर के एक ही पंक्ति में बैठ कर, हम आपस में सहभोज कर के मूलनिवासी समाज बनाएंगे। यदि कोई किसी मूलनिवासी के ऊपर हमला करता है, तो सभी एकजुट होकर हमलाबर को लाइन पर लायेंगे। ये प्रस्ताव भी मुझे बड़ा आकर्षक लगा है कि, आदधर्मी गुरुओं की ही वाणी का प्रवचन किया जायेगा और बुत पूजा का बिल्कुल बहिष्कार किया जायेगा। शूद्र लड़के लड़कियों को बीए तक अवश्य शिक्षा दिलाए जाएगी। जिन हिन्दू पुस्तकों में छुआछूत, जातिपाति, ऊँच नीच का वर्णन है, उन का पूर्ण बहिष्कार किया जायेगा। सरकार गरीबों के वच्चों का सारे का सारा खर्चा खुद उठाए, मूलनिवासी केवल खेतीबाड़ी करते हैं, जिन्हें भूमि उपलब्ध करवाई जाए। लायलपुर, शेखुपुरा, सरगोधा, मिंटगुमरी, मुलतान, कांगड़ा उतर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार और जंगलों में रह रहे वनबासियों को अधिक रोजगार के अवसर दिए जाएं। ये भी ठीक ही कहा गया था, कि भारत के मूलनिवासियों का धर्म "आदधर्म" है ना कि हिंदू। आदधर्म मंडल के नेताओं ने उचित ही कहा था कि, सभी भारतीय मूलनिवासियों को म्युनिसिपल कमेटियों, खण्ड, जिला समितियों, विधानसभाओं, पुलिस और फ़ौज, में बनती नुमांयन्दगी भी उपलब्ध करवाई जाए। आदधर्म मंडल के नेताओं की ये माँग भी अति महत्वपूर्ण थी, कि अंग्रेज सरकार भारत की जनता को तब तक आजाद घोषित ना करे जब तक, सभी अछूत और मूलनिवासियों को बराबर नहीं माना जाता है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो ये ब्रिटिश सरकार के लिए एक वहुत बड़ा कलंक होगा। मेरा सुझाव है कि, आज भी इन सभी प्रस्ताबों को कार्यवाही में पुनः शामिल किया जाए और वर्तमान सरकार से भी इन पर अमल करने के लिए दबाव बनाया जाए क्योंकि आज भी गरीबों का शोषण जारी है जिसे पूर्णरूपेण बन्द कराना केवल आदधर्म मंडल का ही काम लगता है, बाकी संगठन केवल कागजों में ही हैं, सड़कों पर उतरना आदधर्म मंडल के ही कार्यकर्ताओं और नेताओं का ही काम है, क्योंकि सन 1931 की जनगणना में भी चमार जाति ने ही जाटों के अत्याचार सहन किये थे। मैं आप सब को वहुत वहुत वधाई देता हूँ कि आप वास्तव, अछूतों और मूलनिवासियों के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं, आप ही आदर्श धर्म को अपनाए हुए हैं, आप ही साहिबे कलाम मंगू राम मुगोबालिया के कारवां को ले कर, सिर पर कफ़न बॉन्ध कर घर से निकले हुए हैं, हम भी आप के साथ चलेंगे और भारत को खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः बहाल करेंगे। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। अप्रैल 23,2021।

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