चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन।।
।।चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन।।
नौ अप्रैल को हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर में, आदधर्म गुरु आरएन आदवंशी जी महाराज की अध्यक्षता में, चल रहे चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन में, तेलंगाना प्रदेश से शिरकत कर रहे विशिष्ट अतिथि हिस्सा आंदोलन के अध्यक्ष श्री विद्या प्रकाश कुरील जी ने, अधिवेशन में बुलाने के लिए, रामसिंह आदवंशी का आभार प्रकट किया और अधिवेशन की सफलता की कामना करते हुए कहा कि, साहिबे कलाम मंगू राम जी मुगोवालिया एक दृढ़ इरादे वाले महापुरुष हुए हैं, वे निःस्वार्थी, निर्भीक वीर स्वतंत्रता सेनानी मूलनिवासी भारतीयों के मसीहा थे। उन्होंने जो आदधर्म मंडल के झंडे तले आदधर्म आंदोलन चलाया था, वह हमेशा ही इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। आप का भी इस अधिवेशन में भाग लेना इतिहास के पन्नों पर हमेशा बना रहेगा। हिमाचल प्रदेश की सुरम्य पहाड़ियों, पहाड़ों, नदी, नालों की अद्वितीय सुंदर स्वरलहरियों की मधुर संगीत भरी धुनों के बीच आज जो मूलनिवासियों की मुक्ति के लिए विचार मंथन चल रहा है, वह प्रशंसनीय ही नहीं महत्वपूर्ण भी है। रामसिंह आदवंशी जी ने भारत के मूल निवासियों में सद्भावना और समरसता की बात कही है, वह वहुत ही महत्वपूर्ण है और चिंतनीय भी है। वास्तव में समरसता का भाव समझना वहुत आवश्यक है।
आदधर्म के नियम सिद्धांत अति सरल और सत्य पर आधारित प्रकृति के नियमों के अनुसार हैं, यही एक ऐसा धर्म है, जिस में किसी भी प्रकार का किसी भी प्राणी से भेदभाव नहीं है, यही धर्म इंसान को इंसान बन कर जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करता आया है। साहिबे कलाम मंगू राम और उन की आदधर्म मंडल की टीम ने, विश्व को अपने समय में दिखा दिया था, कि मानवता के क्या अर्थ हैं? सभी धर्मों में स्त्री को दोयम दर्जे का इंसान समझ रखा है, जबकि आदधर्म नारी को विधवा तक रखने नहीं देता है। विधवा को सती करना एक अपराध मानता है। किसी को भी किसी का गुलाम, दास और बन्धुआ मजदूर बनाना मानवीय उसूलों के खिलाफ समझता है।
साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया और स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज की जोड़ी ने ही, गुरु रविदास जी महाराज के बेगमपुरा शहर को नांऊँ संविधान समझ कर, उस के अनुसार कार्य किया है, जिस के कारण ही उन्होंने सन 1937 तक अछूतों के लिए आरक्षण लागू करवा कर गुलामों के गुलाम अछूतों को मुख्यधारा में ला खड़ा कर दिया था। शिक्षा, समानता, नौकरी और भूमि के अधिकार दिला दिए थे। आदधर्म की स्थापना कर के धार्मिक आजादी दिला दी थी। स्वतंत्रता के बाद तो आदधर्म को धर्म का दर्जा ही समाप्त कर दिया गया और अधर्मी जाति के रूप में एक नई जाति को संविधान में लिखा गया जो अछूतों के साथ छल किया किया गया है। दो बोट का अधिकार आजादी से पूर्व ही छीन लिया गया है, फिर इस अधूरी आजादी के क्या मायने हैं? इस धोखे को समझ कर हमें साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया और स्वामी अच्छूतानंद महाराज के रास्ते पर चल कर आदधर्म को विश्व के कोने कोने में ले जाना होगा तभी भारतवर्ष सहित सम्पूर्ण विश्व में बेगमपुरा स्थापित हो सकेगा।
हमें आदधर्म के इतिहास को मूलभारतीयों को ही नही समझाना होगा, अपितु जन जन तक पहुंचाना होगा, जिस के लिए हम कल राष्ट्रीय योजनाओं को अंतिम रूप देंगे। आदधर्म के सिद्धांतों को हर व्यक्ति को समझाना होगा और आने वाली जनगणना में, धर्म के कालम में सभी को आदधर्म लिखने के लिए समझाना होगा और खुद भी आदधर्म लिखना होगा। मेरी आप सब से अपील है कि, आप भी अपने अपने क्षेत्र में, अपनी अपनी प्रतिभा के अनुसार सच्ची लगन से कौम के उत्थान के लिए कार्य करें, लेखक वृन्द लेखन जगत में अपनी क्रांतिकारी लेखनी से झंडे गाड़ें, समाजसेवी मूलनिवासियों को जागरूक करने के लिये इतिहास बनाएँ, सभी राजनेता भी समाज को प्रगति की ओर ले जाने के लिए काम करें, तभी जीवन सफल होगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अप्रैल 19, 2021।
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