चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन।।

।।चतुर्थ राष्ट्रीय आदधर्म अधिवेशन।। हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर में, नौ अप्रैल को आदधर्म गुरु श्री आरएन आदवंशी महाराज दिल्ली की अध्यक्षता में चल रहे दो दिवसीय आदधर्म अधिवेशन में बोलते हुए, जिला ऊना के गाँव धर्मपुर के निवासी अश्वनी भारद्वाज ने कहा कि हमारी चमार जाति धर्मों के कारण कन्फ्यूज हो चुकी है क्योंकि चमार जाति को ही क्रिश्चियन इस्लाम, बुद्ध, सिख, जैन और राधास्वामी आदि अनेकों धर्मों में तोड़फोड़ कर के इन में शामिल किया जा रहा है। आजकल एक और नया धर्म चर्चा का विषय बना हुआ है, जिस ने फिर मूल निवासी साधु, संतों, पीर, पैग़ंबरों को बांट दिया है। युवा पीढ़ी को भटकाया जा रहा है, युवाओं को ये समझ नहीं आ रहा है, कि कौन सा धर्म अच्छा है? कौन सा नहीं। अब तो कुछ युवा धर्म कर्म को ढकोसला मात्र ही समझ रहे हैं, जिस के कारण उन का इन का इन धर्मों से विश्वास उठता हुआ नजर आ रहा है। गुरु रविदास जी महाराज ने भले ही कहा है कि:--- आद से प्रगट भयो, जाको ना कोऊ अंत। आदधर्म गुरु रविदास का, जाने बिरला सन्त। इन पंक्तियों से तो स्पष्ट विदित होता है कि, आद से ही आदधर्म के संकेत मिलते हैं, गुरु रविदास जी महाराज का धर्म भी आदधर्म ही है मगर उन के ही नाम को विकृत कर के नए धर्म को आरंभ किया जा रहा है, जिस से युवाओं में ऐसे धर्म के ठेकेदारों के प्रति संदेह उतपन्न हो रहा है कि इस काम पीछे कहीं चमार जाति को विघटित करने का किसी का हाथ तो नहीं? जिस षडयंत्र को समझना जरूरी है। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी ने सन 1926 ईस्बी को आदधर्म की पुनर्स्थापना कर के,अछूतों को इस धर्म की एकता के कारण मूल भूत धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक सांस्कृतिक अधिकार प्राप्त किये थे जिस के परिणाम आज देखे जा सकते हैं, भूमालिक बनाना, शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार, रोजगार के अधिकार, ईस्बी सन 1937  से विधानसभाओं और संसद में आरक्षण लागू करवाने, छुआछूत खत्म करवाने के अधिकार दिला कर, समतामूलक समाज बनाने के ऐतिहासिक कार्य किये गए हैं। जिस धर्म के झंडे तले ये सब कुछ हुआ है, जिस धर्म को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी ने अंग्रेजों से मान्यता लेकर लागू करवाया था, उसी धर्म को अंवेदकर ने, स्वतंत्र भारत के संविधान में क्यों दर्ज नहीं किया था, जो संदेह के घेरे में आता है, कहीं हमारे ही नेता तो मूलनिवासियों के हितों को तो नहीं बेचते आ रहे हैं? कहीं ये लोग ही तो  हमारे ही खिलाफ ही कार्य नहीं करते आ रहे हैं! कहीं हमारे ही पैरोकार ही तो निजी स्वार्थों के लिए हमारे समाज को बेच तो नहीं रहे है, ये सब चिंतन का विषय है। मेरा मानना है कि, जब तक हम मूलनिवासियों का एक धर्म नहीं होगा, हम कभी भी एकता के सूत्र में नहीं बन्ध सकेंगे, ना ही हम अपने अधिकारों को प्राप्त कर सकेंगे, ना ही ब्राह्मणवादी गुलामी से कभी हम आजाद हो सकेंगे। आज जरूरत है कि हम आदवंशियों, आदिवासियों को एक मंच पर ला कर उन में विश्वास पैदा करें। अछूतों को हिंदुओं, मुस्लिमों सिखों, ईसाइयों के प्रलोभनों से बाहर निकाल कर आदधर्म में शामिल करें। आदधर्म ही तर्क की कसौटी पर ठीक लगता है, आदधर्म ही सारी मॉनवता को एकता के सूत्र में जोड़ सकता है। यही वह आदर्श धर्म है, जिस में कोई भी किसी भी प्रकार का अमानवीय कानून नहीं है, यही वह धर्म है, जो बेगमपुरा के सिद्धांत पर काम करता है, किसी को भी ऊँच नीच, छूत अछूत नहीं मानता है, कोई काले गोरे का भेदभाव नहीं रखता हैं। सन 1931 की जनगणना के आंकड़ों से ज्ञात होता है कि, आदधर्म में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और ब्राह्मण भी शामिल हो गए थे, जो किसी चमत्कार से कम नहीं था, इसीलिए हमें आदधर्म के रुके हुए कारवाँ को तीव्र गति से जन जन तक पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिए। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। अप्रैल 15, 2021।

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