आदधर्म मंडल का स्वर्णिम इतिहास।।
।।आदधर्म मंडल का स्वर्णिम इतिहास।।
अगर धरती पर स्वर्ग है तो केवल भारतवर्ष की धरती पर ही है, जिस का अहसास आदमी तो करता आया है मगर पशु-क्षी भी करते हैं, जिस का सबूत प्रवासी पक्षियों से लगाया जा सकता है। ज्यों ही ऋतुएँ बदलती हैं, यूरोप एशिया का जलवायु परिवर्तित होता है, वहां की धरती का वातावरण, जलवायु इन मासूम प्राणियों को सताता है, त्यों ही ये पक्षी लाखों किलोमीटर की उड़ान भर कर, भारत की धरती पर आ जाते हैं। जब ये गूंगे प्राणी भारत की धरती का सुख लेने के लिए आते हैं, अपना जालिम समय बिताते हैं और पुनः वापस हो जाते हैं, वहीं तेल और बर्फ की धरती पर जन्में मुसलमान, ईसाई और यहूदी भी सुख चैन की जिंदगी जीने के लिए भारत में आते रहे हैं, मगर इन लोगों ने पक्षियों से ये नहीं सीखा कि, पराई धरती पर अनाधिकार चेष्टा कर के, पराई धरती पर अनाधिकृत रूप से पक्का कब्जा नहीं करना चाहिए। इन स्वार्थी लोगों ने, अपनी छल कपट की घातनीति से, भारतीयों को अपना गुलाम बना कर, अपनी राक्षस प्रवृत्ति को नहीं छोड़ा है।
पांच हजार वर्ष पूर्व भारतवर्ष की धरती पर आए यूरेशियन यहीं पर बसे हुए हैं, अनादिकाल से चली मूलनिवासियों की संस्कृति का नामोनिशान मिटा दिया है, महापुरुषों का नामोनिशान मिटा दिया, प्राचीन इतिहास मिटा दिया है, सिंधुघाटी की सभ्यता का निशान तक नहीं छोड़ा, दैवीय शक्ति सम्पन्न भारत के वीर शासकों को राक्षस, दानव, दैत्य और दनुज लिख कर अपमानित कर रखा है। भारतवर्ष के मूल निवासियों को शिक्षा से वंचित कर के, इन की तार्किक सोच को ही समाप्त कर दिया है, केवल अपनी चाकरी के लिए अपना अछूत अनुचर बना कर, गुलामों की जिंदगी जीने के लिए विवश किया हुआ है। इसी भारतवर्ष में ही सृष्टि के सृजनकर्ता आदिपुरुष से चली मानव सभ्यता को खूंखार ही नहीं मानवता के दुश्मन यूरेशियन लोगों ने तहस नहस किया हुआ है।
आदिपुरुष ने अपनी पवित्र अंश से जुगाद बेटे को उतपन्न किया था, जिस से आगे नील, कैल, चंडूर, मंडल, कैलाश, सिद्धचानो, कोलचानो महादानो आदि हुए हैं, इन्हीं प्रतापी, यशश्वी वीर, बुद्धिमान शासकों, प्रशासकों, लेखकों, ज्ञानियों विज्ञानियों भूगर्भ शास्त्रियों, औषध शास्त्रियों, शिक्षा शास्त्रियों के सिंधुघाटी की सभ्यता तक अबतार हुए हैं। इन के ही समय में, सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बृहस्पति, बुद्ध, शुक्र, शनि महाज्ञानी हुए हैं, जिन के नाम पर ही, सृष्टि के प्रारंभ में नौ ग्रहों के नाम रखे गए हैं। कृतिका, अग्नि, सूर्य, रोहणी ज्योति, चन्द्र, मृगशिरा मंगल, राहू, शिव, पुनर्वसु, आदित्य, बृहस्पति, पुष्य, शनि, चित्रा, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूला, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्र, उत्तरभाद्र, रेवती, अभिजीत महापुरुषों के नामकरण भी आद्य शक्तियों के नाम से ही पड़े हुए हैं, जिन नामों का अनुमान वर्तमान नए नामों से लगाया जा सकता है। वर्तमान राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों, वैज्ञानिकों, वीर सपूत शहीद सेनानियों, सैनिकों, महानायकों और महापुरुषों के नाम को चिरस्थायी बनाने के लिए इन विशिष्ट इतिहास पुरुषों के नाम से कई योजनाओं परियोजनाओं, सड़कों, बांधों, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, पार्कों के नामकरण किये जा रहे हैं मगर सिंधुघाटी की श्रेष्ठ सभ्यता तक जन्में महापुरुषों के इतिहास को यूरेशियन शासकों और लेखकों ने हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है। भारत के सभी ग्रहों, उपग्रहों, नक्षत्रों, नदियों, सागरों और पर्वतों के नामकरण भी इन्हीं आदपुरुषों के नाम से हुए हैं, जिन्हें इतिहास के पन्नों से विदेशी आक्रांताओं ने ओझल कर दिया है, जिसे पुनः आदधर्म मंडल ने जिंदा करने का ऐतिहासिक कार्य किया है। यदि 1924 ईस्बी में आदधर्म मंडल के महानायक व अध्यक्ष स्वतंत्रता सेनानी साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी हुंकार नहीं भरते, सोई हुई कौम को नहीं जगाते, अपने धर्म मूल "आदधर्म" को पुनर्जीवित नहीं करते और आदधर्म को 1931 की जनगणना में शामिल ना करवाते तो आज हम यूरेशियन के ही गुलाम रहते। मूलनिवासियों को अपना आदधर्म अपनाना पड़ेगा तभी एकता स्थापित होगी और मूलवासी राज आएगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अप्रैल 07, 20211।
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