आदधर्म मंडल और1931 की जनगणना।।

।।आदधर्म मंडल और 1931 की जनगणना।। सन 1931 भारत के मूलनिवासियों के लिए शुभ वर्ष था। आदधर्म मण्डल ने, पांच हजार सालों से चली आ रही विदेशी यूरेशियन लोगों की गुलामी की जड़ों को दीमक लगा दी थी, आदधर्म मंडल के अस्तित्व में आने पर मूलनिवासी शासन की पुनः नींव पड़ गई थी, जिस से मनुवाद की चूलें हिल गईं थी। अपनी छद्म नीति से यूरेशियन लोगों ने अपने ही शत्रु वानिये मोहन दास कर्म चन्द गांधी को आगे कर के, मूलनिवासियों के खिलाफ तैयार करके, उसे प्रयोग किया था, क्यों कि ये लोग जानते हैं कि, वानिये भी मूलनिवासी समाज का ही एक अंग है, इसीलिए 2002 में अयोध्या राम मंदिर के एक परमहंस साधु ने भी कहा था कि, हम शूद जिलाधिकारी को शिला दान नही कर सकते, जिस से सावित होता है कि, आज भी ब्राह्मण, वाणियों को अछूत ही मानता है मगर वाणियाँ समाज इस सत्य को हजम नहीं करता है। आदधर्म मंडल ने, सारे मूलनिवासियों को एक मंच पर ला कर इकठ्ठा कर दिया था और अपने खोए अधिकार भी ब्रिटिश सरकार से वापस ले लिए थे। ये सभी उपलब्धियां केवल सन 1931 की जनगणना के करिश्मों से ही संभव हुई थीं। इस जनगणना ने ब्रिटिश सरकार को प्रमाणित कर दिया था कि, भारत के मूलनिवासी केवल और केवल शूद्र वर्ग ही है। वास्तव में अब शूद्र शब्द ही मूलनिवासी समाज का पर्यायवाची शब्द है, जिसे ब्राह्मण लेखकों ने नेगेटिव  अर्थात ऋणात्मक बना रखा है। जनगणना वरदान:---भारत के मूलनिवासियों के लिए, सन 1931 की जनगणना एक वहुत बड़ा वरदान सिद्ध हुई थी, जिस ने सारे संसार को ब्राह्मणों की राक्षस प्रवृति को समझा दिया था। ब्राह्मणों की अमानवीय घात और छद्म नीति को जगजाहिर कर दिया था। सारे भारत के अछूतों को भी आदधर्म मंडल के अस्तित्व में आने से एक मंच पर संगठित होने के लिए मार्ग प्रशस्त हो गया था। स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज का आदि हिन्दू आंदोलन, आदि आंध्रा आंदोलन और आदि कर्नाटका आंदोलन, आदि द्राविड़ आंदोलनो के, आंदोलनकारियों को भी बल मिला था। ये वही आदधर्म मंडल आंदोलन था जिस ने सारे भारत के अछूतों को नेतृत्व की ललक पैदा की थी, जिस के परिणामस्वरूप ही 1937 के असेंबली चुनाबों में सभी राज्यों में अछूत विधायक चुने गए। सरदार बल्लभभाई पटेल की नासमझी के कारण ही, ओबीसी को विधायक तक बनने का सौभाग्य नहीं मिला था। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी ने ही यह करिश्मा कर दिखाया था, जिस से बाहर के अछूत बन्धुआ मजदूरों को विधानसभाओं और संसद का मुंह देखने को मिला था, जब कि अंदर के ओबीसी बन्धुआ मजदूर वहीं के वहीं रह गए थे, जहां के वे थे। अगर आदधर्म मंडल संघर्ष ना करता तो तेली तंबोली तो वही काम करते रहते जो मनुस्मृतियों में दर्ज काले कानूनों के अनुसार करना पड़ता था। वास्तव में ही साहिबे कलाम गद्दरी बाबा मंगू राम मुगोवालिया जी, पचासी प्रतिशत मूलनिवासियों के लिये पैगम्बर ही थे, जिन्होंने अपने जीवन को वहुजन समाज के लिए कुर्वान कर दिया था, उन के बाद पंजाब के ही साहिब कांशीराम जी ने भी, अपने जीवन के सभी सुखों, प्रथम श्रेणी के उच्च पद को वहुजन समाज की गुलामी को समाप्त करने के लिए होम कर दिया है, उन्होंने साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी के रास्ते पर चलते हुए, उन का अनुकरण और अनुसरण करते हुए वहुजन राज स्थापित कर दिया। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। अप्रैल 06, 2021।

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