आदधर्म मंडल और 1931 की जनगणना।।

।।आदधर्म मंडल और1931 की जनगणना।। लायलपुर मिंटगुमरी में, जो आदधर्म मंडल के आह्वान पर, आदधर्म लिखने वाले आंकड़े सामने आए थे, उस से सभी धर्मों के पैरोकार चकित हो गए थे। उस समय जनगणना की जो रिपोर्ट सामने आई थी, उस के आधार पर यह कहा जा सकता था कि, वहां पर जालंधर शहर के लोग आ कर अधिक वस गए थे, जिन्होंने बड़े गर्व से बढ़चढ़ कर अपना धर्म आदधर्म लिखा था। ये भी संभव हो सकता था कि, कांगड़ा जिले के पहाड़ी इलाकों से अठारह प्रतिशत आदधर्मी वहां रोजगार के लिए आ वसे हों। शाहपुर और गुजरात के उत्तर पश्चिमी इलाकों के अछूतों ने अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के कारण सामुहिक रूप से खड़े हो कर अपनी एकता का सबूत दिया हो। इन इलाकों के मनुवादी लोग हररोज छोटी जातियों के ऊपर अत्याचार करते आए हैं, जिस के कारण उन्होंने अपनी जबरदस्त नाराजगी और रोष जाहिर कर के शक्तिशाली संगठन के साथ जुड़ कर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की हो। ये बड़ी अजीब बात थी कि, किस तरह कुछ आदधर्मी अमृतसर में भी जनगणना में शामिल हो गए थे। इस स्पष्ट अनमेल के लिए यही साधारण व्याख्या या स्पष्टीकरण हो सकता था कि, वहां सेडीयूल्ड कास्ट (एससी) लोग कम गिनती में थे, जो अनुपात के आधार पर निष्पक्ष गिनती में जालंधर शहर के बीच तुलना करने से 1,35, 000 थे, वहां पर आधर्मी लोग लगभग 30,000 अमृतसर में और 50,000 लाहौर में थे। इस के इलाबा एससी चमारों के मुकाबले चूहड़े अधिक थे और आदधर्म की स्पोर्ट के लिए ज्यादा गिनती चमारों में से आई थी। उन के रहने के इलाकों के इलाबा जनगणना तबदीली, हमें उन लोगों की सामाजिक विशेषताओं के बारे में भी स्पष्ट दर्शातीं हैं कि, जिन्होंने अपने धर्म को आदधर्म  का नाम दिया था, उदाहरण के लिए आदधर्म को मानने वालों की पढ़ाई लिखाई दूसरी निम्न जातियों से दोगुनी से भी अधिक हो गई थी। ये संभावित है कि उमर का भी कोई संकेत हो, जब कि नौजवानों के लिए शैक्षिक अवसरों तक अधिक पहुंच थी। इस बात की भी संभावना है कि, वे आर्थिक पक्ष से भी अच्छे हो गए थे, जब कि उन की संख्या पंजाब के अमीर इलाकों के बीच अधिक थी। अंत में जनगणना नतीजों से यह स्पष्ट हो गया था कि, आदधर्म को मानने वाले सब जातियों के आ गए थे, परन्तु अधिक गिनती चमार जाति की ही थी, चाहे कुछ एक वाल्मीकियों ने, अपने आप को आदिधर्मी लिखवाया था, परन्तु ये कुछ खास इलाकों में ही हुआ था और वह भी बड़े ही महत्वपूर्ण तरीके के साथ हुआ था। उपरोक्त दोनों ही जातियों ने, आदधर्मियों की गिनती बढ़ाने का जो ऐतिहासिक सबूत दिया था उस से ही ब्रिटिश सरकार, आदधर्म मंडल की सभी समस्याओं के समाधान के लिए विवश होती रही थी, यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार भारत के सभी मूलनिवासी अछूतों को दो बोट का अधिकार देने के लिए सहमत हो गई थी, जो साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी का ही चमत्कार था। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। अप्रैल 03, 2021।

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