आदधर्म मंडल और1931 की जनगणना।।
।।आदधर्म मंडल और 1931 की जनगणना।।
पंजाबी लेखक सीएल चुंबर जी लिखते हैं, कि
जिस प्रकार ये रिपोर्ट संकेत करती है कि सिखों ने आदधर्म की बंगार को हिंदुओं से भी अधिक गंभीरतापूर्वक लिया था। बाद में एक आदधर्मी ने स्पष्ट किया था कि, हिंदुओं ने सिखों के कुछ लोगों को हिन्दू जनंसख्या रिकार्ड के बीच ले कर सिखों के साथ भी वहुत बुरा व्यवहार किया था। सिखों ने इस का बदला हमारे साथ दुर्व्यवहार कर के लिया था। एक व्यान के अनुसार सिखों ने ननकाना साहिब में एक आदधर्मी रैली को भंग करने के लिए, वहां की रसोई को नष्ट कर दिया था, जहां रैली के लिए भोजन तैयार किया जा रहा था। इस रैली में शामिल लोगों के ऊपर चावलों की गर्म गर्म पिछ भी फैंकी गई थी और वहुत सारे आदधर्मियों को मारा पीटा गया था।एक और व्यान के अनुसार,सिखों ने आदधर्म मंडल के दो संगठनकर्ता आदमी मार दिए थे। जनगणना की महत्ता को बढ़ाने के लिए इन सब घटनाओं को खूब बढ़ा चढ़ा कर प्रचारित किया गया था। हर संभव प्रयास किया गया था, ताकि अछूतों की इच्छा शक्ति को बरकरार रखा जा सके, जिस प्रकार निम्नलिखित गीत से ये प्रकट होता है:---
"निक्के मोटे झगड़े छोड़ के पिछाँह, ते बन्ह लओ सिर ते लाल पगां, असीं तां कोई वणाऊनी होर कौम ना, बल्कि वणाऊनी आपणी कौम आ,
इस लई आऊ आदधर्मियों तुसीं तकड़े हो जाओ।
वास्तव में, यह आंदोलन का सब से मजबूत समय था और अपनी लोकप्रियता का शिखर भी था। सन 1931 की जनगणना के अंतिम मोड़ के समय पंजाब में आदधर्मियों की जनसँख्या 418789 थी। ये जनसँख्या पंजाब में रह रहे ईसाईयों की संख्या के बराबर थी। जिस प्रकार मंगू राम ने संकेत दिया था, ईसाइयत अछूतों को पिछले पचास साल से अधिक समय से परिवर्तन करवाती आ रही थी, जबकि आदधर्म सिर्फ़ पांच सालों से अस्तित्व में सक्रिय हुआ है। जालंधर में 80 प्रतिशत छोटी जातियों ने, अपने आप को आदधर्मी कहा था। होशियार पुर जिले में भी आंकड़े लगभग इतने ही थे। आधी दर्जन अन्य जिलों में भी छोटी जातियों ने अपने आप को आदधर्मी जनगणना में दर्ज करवाया था। कुल आवादी में आदधर्मियों की संख्या जबरदस्त नहीं थी। ये सिर्फ डेढ़ प्रतिशत ही थी। शायद पंजाब में छोटी जातियों का ये केवल दसवां हिस्सा था । आदधर्मी नेताओं ने ये दावा किया था कि वहुत बड़े स्तर पर जो अछूतों के बीच डर पैदा किया गया था उस के कारण जो आंकड़े सामने आने चाहिए थे वे नहीं आ सके थे। वे अपने आप को आदधर्मी नही लिख सके थे। अखबारों की सभी रिपोर्टों और जनसँख्या की टिप्पणियों से यह स्वत ही सिद्ध हो गया था, इस के फलस्वरूप कुछ आदधर्मी नेताओं ने, ये महसूस किया था, कि जितनी संख्या रिकॉर्ड की गई थी, उस की अपेक्षा चार गुना अधिक लोग और रिकार्ड किये जा सकते थे। ये लोग दहशत और भय पैदा होने के कारण ऐसा नहीं कर सके थे, उन की गिनती आधा मिलियन से कम होने की बजाए दो तीन मिलियन होनी थी।
डॉक्टर मार्क जरगन जमाईर पीएचडी अपनी पुस्तक रिलीजन और सोशल विजन (भारत में इस पुस्तक को रिलीजन रेवल्ज इन पंजाब) में मंगू राम वर्सिज गांधी लेख में लिखते हैं कि, ये आधा मिलियन या दो मिलियन आदधर्मी कौन थे? जबकि जनसँख्या आंकड़े जिलेबार और जाति के अनुसार दिए गए थे, उन से जनसँख्या आंकड़ा विज्ञान का नक्शा बनाया जाना, जाति अंतर का चार्ट बनाया जाना दोनों ही संभव थे। जन आंकड़ा विज्ञान की बण्ड अर्थात विभाजन एक दिलचस्प रूपरेखा प्रकट करती है। नक्शा नंबर दो से दो अध चक्कर या उपरले चक्कर जो आदधर्म को सपोर्ट करते हैं, बिलकुल स्पष्ट हैं। एक जिला जालंधर दुआबे का इलाका (जिला जालंधर, होशियारपुर और कपूरथला का राज्य) और दूसरा लायलपुर का इलाका ( शेखुपुरा मुलतान और मिंटगुमरी सहित) जालंधर दोआबा में आदधर्म की शक्ति का कारण स्पष्ट है, क्योंकि ये स्थान आंदोलन का केंद्र था, परन्तु ये साफ साफ पता नहीं चलता है कि लायलपुर में इतने प्रभावशाली आंकड़े क्यों थे। एक स्पष्टीकरण ये भी हो सकता था कि, वहां नई शहरी कालोनियां होने के कारण इलाके में वहुत सारे लोक बाहर से आ कर वहां बस गए हों, जिन में से वहुत सारे जालंधर शहर के चमार हों।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अप्रैल 02, 2021।
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