साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल का ब्रिटिश सरकार पर प्रभाव।
।।साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल का ब्रिटिश सरकार पर प्रभाव।।
जब कभी भी शारीरिक और मानसिक यातनाएँ आदमी को झेलनी पड़ती हैं, तब अत्याचारियों के खिलाफ, पीड़ित की आत्मा विद्रोह कर देती है और उसी व्यवस्था को बदलने के लिए, संघर्ष करना शुरू कर देती है, जब साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी को, ब्राह्मण अध्यापक पोहलो राम ने बड़ी नृशंसता से पाशविक पिटाई की थी, तभी साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी की आत्मा ने, खूंखार भेड़ियों को सबक सिखाने की बात मन में ठान ली थी। इसी कारण वे अमेरिका जा कर गद्दर पार्टी में शामिल हो गए थे। यहीं पर वे गद्दरपार्टी के लाला हरदयाल और रास विहारी बोस के विचारों की भठ्ठी में तप कर, कुंदन बन कर, अछूतों के कल्याण के लिए ब्राह्मणवाद के खिलाफ जंगे मैदान में उतर आए थे, जिन्हें वहुत कम लोगों ने, समझा, पहचाना और उन के पथ का अनुशरण किया, कुछ स्वार्थी तो भटक कर, मनुवादी दलाल बन गए थे और उन के आदधर्म मंडल को ही मिट्टी में मिला गए।
साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी ने, लार्ड साईमन को मेमोरेंडम देने की जो बिसात विछाई थी, उस का ही अनुशरण स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज कानपुर जी ने किया था। वे भी साईमन कमीशन को मिलते रहे और वहुजन समाज की गुलामी के बारे में, उन के माध्यम से ब्रिटिश सरकार को अवगत कराते रहे, जिस से साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी के मेमोरेंडमों को भी बल मिलता रहा। इन्हीं दुख भरे मेमोरेंडमों की सुनबाई के लिए ब्रिटिश सरकार ने भी 12 नबंबर 1930 से लेकर 13 जनवरी तक लन्दन में गोलमेज सम्मेलन बुलाया था। भारत में सभी वर्गों के बढ़ रहे असंतोष को देख कर ही लार्ड इरविन ने ब्रिटिश सरकार पर दबाब डाला था कि भारतीय समस्याओं के समाधान के लिए कुछ ना कुछ अवश्य किया जाए, जिस की योजना को तत्कालीन प्रधानमंत्री ने स्वीकार कर लिया था और हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई बड़े बड़े भूमालिकों, अछूतों, यूरोपियनो, भारत के कटररपंथियों, उदारपंथियों, राजाओं, इंग्लैंड के सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को प्रथम गोलमेज सम्मेलन में बुलाया था। मानवता के दुश्मन गांधी को इतने प्रतिनिधियों को बुलाना अच्छा नहीं लगा था। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जान चुके थे कि, गांधी एंड कंपनी मूल भारतीयों के खिलाफ ही सम्मेलन में बोलेंगे इसी कारण वे, अपने युवा एडवोकेट डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को ढूंढते हुए उन के निवास पर पहुंचे थे, क्योंकि उस समय ऐसा कोई भी अछूत पढ़ा लिखा नहीं था जो अछूतों की बात अंग्रेजी में, ब्रिटिश सरकार को समझा सके। जब सम्मेलन के लिये आमंत्रण मिला तो, आदधर्म मंडल ने, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को अपना प्रतिनिधि घोषित कर के, गोलमेज सम्मेलन में भेजा था। जब सम्मेलन में, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपने आप को अछूतों का प्रतिनिधित्व बताया तो गांधी ने उन का विरोध किया और कहा कि, मैं ही उन का प्रतिनिधि हूँ। जब साहिबे कलाम मंगूराम मुगोवाल जी को डॉक्टर अंवेदकर ने इस बाबत सूचना दी थी,तो उन के समर्थन में उन्होंने थोक में टेलीग्राम भेजीं, जो गांधी की टेलीग्रामों से अधिक निकलीं, जिसे अंवेदकर को प्रतिनिधि की मान्यता मिल गई और गांधी गुस्से से भड़क कर वापस भारत लौट आया था।
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने, गोलमेज सम्मेलन में वहुजन समाज की दोहरी गुलामी की विस्तार से व्याख्या की और ब्रिटिश सरकार को ब्राह्मणों की हैवानियत की पूर्ण जानकारी दे दी, जिससे ब्रिटिश सरकार अछूतों की नहीं भारत के सभी अल्पसख्यकों के अधिकारों के प्रति सोचने लगी जिस से समूचा ब्राह्मणवाद सकते में पड़ गया था। प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडॉनल्ड ने सुझाब देते हुए कहा कि, भारतवर्ष के सभी प्रांतों को पूर्ण स्वायत्तता देदी जाए। अछूतों और अल्पसख्यकों के हितों की रक्षार्थ विशेष अधिकार गवर्नर के पास ही रखे जाएं। केंद्र में संघ की स्थापना की जाए, जिस में ब्रिटिश प्रांतों और देशी रियासतों के प्रतिनिधि शामिल किये जाएं। केंद्र में दोहरा शासन स्थापित किया जाए। प्रधानमंत्री की सभी बातों पर प्रतिनिधि सहमत हो गए, केवल एक 85 प्रतिशत मूलनिवासियों को अधिकार देने पर कोई सहमत नहीं हुआ। मुहम्मद अली जिंन्हा अपनी चौदह मांगों पर अड़ा रहा। आदधर्म के मांगपत्र के ऊपर डॉक्टर भीमराव अंवेदकर भी अड़े रहे, जिस के कारण इस सम्मेलन में कोई निर्णय हो सका।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मार्च 10, 2021।
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