आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।
।।आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।
कांग्रेस का मुखौटा महात्मा गांधी, केवल अपने आप को अवतार घोषित करने के चक्कर में, छलकपट की छद्म नीति का सहारा लेता हुआ गन्दी राजनीति करता रहा, जिस का फल उसे उन लोगों ने दिया जिन के लिये ये व्यक्ति गरीबों की छाती पर चढ़ कर, अमीरों, शोषकों के लिए लड़ रहा था। मूलनिवासी मजलूमों की जिंदगी से खेलने वाले मानवता के दुश्मन महात्मा को दण्ड भी उसी के फर्माबरदारों ने ही दे दिया है। देर है अंधेर नहीं, एक दिन अन्याय की सजा आदपुरुष अवश्य देता आया है। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी दिल से गरीबों, मजलूमों, गुलामों की आजादी की लड़ाई लड़ते आ रहे थे जिन की आवाज को धीमा ही नहीं बन्द करने के लिए, बिकाऊ मूलनिवासी छदमी स्वार्थी नेताओं ने, मंत्री पद, सांसद, विधायक बनने के लिए अपने समाज को बर्बाद करने में जरा भी संकोच नहीं किया। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी के पंजाबी गद्दारों ने, अछूत उद्धार मंडल बना कर, शाही कमिशनों के पास पेश हो कर, उन की मुखालफत करते हुए, कांग्रेस का साथ दिया था, मगर सत्य को कोई छुपा नहीं सकता, सत्य एक दिन सामने अवश्य आ ही जाता है। आदधर्म मंडल ने जो सड़कों पर खून बहाया, जिस का जिक्र किसी भी अखबार, किसी भी लेखक ने नहीं किया और मूलनिवासियों की आजादी की दर्दनाक गाथा को छुपा दिया था, वह आज सारे विश्व मे जगजाहिर होती जा रही है।
प्रसिद्ध पंजाबी लेखक सीएल चुंबर लिखते हैं कि, महात्मा गांधी का हरिजन प्रेम छलकपट से भरा पड़ा था, उस का अछूतों को हरिजन नाम देना भी मूलनिवासियों के साथ छल ही था, इस गंदे शब्द से वह मूलनिवासियों का घोर अपमान करना चाहता था, अगर अछूत हरि के जन हैं तो ब्राह्मण, वानिये, राजपूत क्यों हरि के जन नहीं बताए गए। महात्मा गांधी का अछूत प्रेम कृत्रिम प्रेम था जबकि बाबू मंगू राम जी का अछूत प्रेम वास्तविक प्रेम था। चुंबर जी कहते हैं कि, यही अंतर हैं, जो आज तक भी गांधीवादियों और खाड़कू अछूतों के बीच चले आ रहे हैं। महात्मा गांधी द्वारा स्थापित हरिजन सेवक संघ का उच्च जातियों की भरमार वाला कपटी धंधा मात्र ही है, जिस में निम्न गुलाम अछूत जातियों के लोगों के लिए कोई स्थान नहीं है, इस हरिजन सेवक संघ के लिए किसी भी अछूत को नेतृत्व करने के लिए उत्साहित नहीं किया गया है। इस ढोंगी मनुवादी संस्था का मुख्य मंन्तव्य केवल उच्च अधिकारियों के लिए निम्न गुलाम जातियों की मदद करने का साधन पेश करना मात्र है। इन उच्च जातियों को नीची जातियों के विरुद्ध पुस्त दर पुस्त की गई बदसलूकी के पछताबे के लिए साधन पेश करना है। जो वास्तव में आदिवासी, मूलनिवासियों के लिए संघर्ष करने वाले खाड़कू हैं, उन्हें ये छली अधिकारी अपनी राजनीतिक इच्छाएँ पूरी करने वाले सिद्ध करते हैं, ताकि मूलनिवासी उन पर विश्वास कर ही ना सकें। ये गांधीवादी इन खाड़कुओं पर दोषारोपण करते हैं कि, ये आदधर्मी अपनी राजनीतिक शक्ति का आधार बनाने के लिए,अपने लिए बखरे अर्थात अलग चुनाब क्षेत्र बनवाना चाहते हैं।
अपनी अछूत समाज की हमदर्दी की छद्मनीति के द्वारा ही मनुवादी राजनेता मूलनिवासी नेतृत्व को असफल करते आए हैं, जिस छलकपट को वर्तमान मूलनिवासी राजनेता समझ नहीं पा रहे हैं। एक दिन अपनी प्रधानमंत्री बनने की ललक के कारण पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी, साहिब कांशीराम जी के पास जा कर दोनों हाथ जोड़ कर खड़ा था, मगर साहिब कांशीराम जी ने, उस की ओर टेढ़ी नजर तक नहीं डाली थी, मगर बाद में उसी व्यक्ति ने कहा है, कि मैं तो कांशीराम को एक दृष्टि से देखना तक पसंद नहीं करता हूँ। आज मूलनिवासी राजनेताओं को साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी, स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज, स्वामी ईशरदास जी महाराज, साहिब कांशीराम जी के संघर्ष और बलिदान से सीख कर, एकता के सूत्र में बंध कर वर्तमान मनुवादी राक्षस राज से मुक्ति दिला कर, मूलनिवासियों को आजाद करवाने के लिए, एक मुठ्ठी हो जाना चाहिये।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मॉर्च 26, 2021
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