आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।
।। आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।
आदधर्म मंडल वैसे ही मूलनिवासियों को हिरदय से प्रेम करता था जिस प्रकार माता अपने पेट से जन्मे बच्चे को प्यार ही नहीं परवरिश भी करती है, भले ही वह खुद मर जाए, मगर अपने बच्चे को जरा भी आंच नहीं आने देती मगर अधिकतर सौतीली माताऐं तो सौतीली ही रह कर पराए बच्चे को दिली प्यार कभी नहीं करती हैं। यही अंतर था महात्मा गांधी और साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी के अछूतों के प्रति प्यार और हमदर्दी का। लेखक सीएल चुंबर जी लिखते हैं कि, चाहे आदधर्म मंडल का आदर्श समाज का मानवतावादी दृष्टिकोण था परन्तु वह मसलों को बिलकुल बखरे तरीके से महसूस करता था। हो सकता है, कि उन का दृष्टिकोण ऊपर से देखने में, महात्मा गांधी के बुनियादी तबदीली लाने की तरह ना हो, या फिर हो भी सकता था, आदधर्म वालों का ज्यादा असली हो मगर आदधर्मियों को लगता था कि, अछूत समाज के वर्ग को जिस मौजूदा हालात के बीच शक्ति और सम्मान मिले बिंना, आम सामाजिक बराबरी हासिल करने की कोई संभावना नहीं है। ड़ाक्टर मार्क जी लिखते हैं कि, ये अत्यंत जरूरी था कि शक्ति, स्तर और सम्मान निम्न जातियों को दिया जाता और तभी इन सब जातियों का कोई व्यक्ति उच्च जातियों से सही सत्कार की आशा कर सकता था। आदधर्म के सामाजिक बराबरी के इस समूह के एकतावादी दृष्टिकोण ने, आदधर्म मंडल को महात्मा गांधी की राजनीतिक युद्ध नीति के प्रत्यक्ष विरोध के बीच खड़ा कर दिया था, ठीक बिलकुल उसी तरह जिस प्रकार महात्मा गांधी की नीतियों को भी आदधर्म के बीच ला खड़ा कर दिया गया था। प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे को अंतरजातीय एक स्वरता की प्राप्ति के मार्ग के बीच रूकाबट समझता था। महात्मा गांधी का सोचना था कि, आदधर्म मंडल अपने सम्पूर्ण हिन्दू धर्म के बखरेपन के बीच आ कर खड़ा हो गया है। आदधर्म मंडल पुनः जातिवादी वर्णवादी विचारधारा को सख्ती से लागू कराना चाहता है, जब कि आदधर्म मंडल की सोच थी कि, महात्मा गांधी केवल दिखाबे मात्र एकसुरता वाली, ऊँच नीच वाली भावना के ऊपर पोचा पोची कर रहा है।
वास्तव में, यही चहलकदमी करते हुए मनुवादी मूलनिवासियों को हजारों वर्षों से मूर्ख बनाते आए हैं, जिसे मूलनिवासी राजनेता समझ नहीं पाते हैं, केवल साहिबे कलाम मंगूराम मुगोवाल जी, महात्मा ज्योतिवा फूले, बिरसा मुंडा और साहिब कांशीराम जी ही मनुवादियों के दांवपेंचों को समझ कर, मनुवादियों की जड़ों को उखाड़ते रहे। आज फिर मान्यवर वामन मेश्राम, वीएल मातंग, एडवोकेट भानू प्रताप, विलास राव जैसे ही मूलनिवासी राजनेता मनुवाद के साथ लोहा ले रहे हैं। बल्लभभाई पटेल जैसे ओबीसी नेता तो मनुवादियों के चाटुकार बन कर, उन के हाथों की कठपुतलियों की तरह ही नाचते रहे हैं, इन्हें बाबन प्रतिशत मूल भारतीय ओबीसी समाज की कोई चिंता नहीं होती थी और आज भी नही हो रही है, वे चाहे आज नीतीश कुमार हो, चाहे मुलायम, अखिलेश यादव, लालू यादव या फिर शरद यादव हों, सभी को मनुवादी रासलीला ही पसंद है, बाकी ओबीसी समाज जाए भाड़ में।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मॉर्च 25, 2021।
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