आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।

।।आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।। पूना पैक्ट हो गया था, मगर इस से यह स्पष्ट नहीं हो रहा था कि, इस से कितने लोगों को लाभ होगा, जिस की कोई गारंटी ये समझौता नहीं दे रहा था, ये भी गारंटी नहीं दे रहा था कि, कितनी सीटें दी जाएंगे, जिस से साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी बड़े आहत थे, इसीलिए उन्होंने अपना आमरण अनशन जारी रखा हुआ था। स्वर्गीय सीएल चुंबर अपने वहुजन बुलेटिन में लिखते हैं कि, अछूतों को विधान सभाओं में कितनी सीटें दीं जाएँगी, उन का कोई जिक्र नहीं किया जा रहा था, जिस के कारण बाबू मंगू राम जी ने पुनः आंदोलन की घमकी दे दी, जिस के कारण पंजाब को केवल आठ विधानसभा की सीटें घोषित की गईं, भले ही इन आरक्षित सीटों पर मनुवादियों के पिछलग्गू जीतने वाले थे मगर फिर भी आदधर्म मंडल वहुत खुश था कि, उन के संघर्ष सदका वहुजन समाज को विधानसभा और संसद में बैठने का दरवाजा तो खुला। जब पंजाब में आठ सीटों की घोषणा की गई थी, तब जालंधर शहर के बीच वहुत बड़ा समागम किया गया था जिस में बाबू मंगू राम मुगोवालिया जी ने आमरण अनशन समाप्त किया था। आमरण व्रत को तोड़ते समय साहिबे कलाम मंगू राम जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा था, कि सब प्रकार की उपलब्धियां उनके प्रस्तुतिकरण के ढंग के कारण ही प्राप्त हुई हैं। उन्होंने महात्मा गांधी को घेरते हुए कहा था कि, यदि आप छली हिदुओं के लिए मर मिटने के लिए तैयार हो तो, मैं भी गुलाम अछूतों के लिए मर मिटने के लिए तैयार हूं। सीएल चुंबर लिखते हैं कि, ये सब कुछ बाबू जी की निजी जुर्रत और मुढले तौर से अपने लोगों से मिले जन समर्थन के कारण ही हो सका था। अमीर व्यापारी सेठ किशन दास बूटा मंडी जालंधर ने सारे प्रबंध किए थे और लोक प्रबंध का कार्य संभाला था, कुछ मदद यूनिनिष्ट पार्टी पंजाब से भी मिली थी, मगर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर से उन्हें कोई भी सीधे रूप में आर्थिक और प्रबन्ध की सहायता नहीं मिली थी। सरकार की ओर से भी केवल पुलिस गार्ड के अतिरिक्त कोई सहायता नहीं मिली थी। ये जद्दोजहद बाबू मुगोवालिया जी ने, महात्मा गांधी के साथ बड़ी खास दुख भरी स्थिति में की थी क्योंकि इससे आदधर्म मंडल व गांधीवादियों  के सांझे मसलों के विशाल क्षेत्रों के बिखराब को ही उजागरता मिलती थी। महात्मा गांधी और बाबू मंगू राम मुगोवालिया जी, दोनों ही अछूतों की हालत सुधारने और समानतावादी समाज की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे थे, लेकिन फिर भी दोनों पक्षों की युद्धनीति के विषयों और बड़े उच्च स्तर पर सामाजिक दृष्टिकोण के प्रमुख मतभेदों के कारण आपस में बंटे हुए थे। महात्मा गांधी की आदर्श समाज की सोच समानतावादी नहीं थी। गांधी का साम्यवाद केवल दिखाबे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। वह मनुस्मृतियों के काले कानून ही मूलनिवासियों के ऊपर थोंपने का षडयंत्र रच रहा था, जब कि बाबू मंगू राम मुगोवालिया जी आंतरिक और मानसिक रूप से, मूलनिवासियों के समानतावादी अधिकारों की सुरक्षा के लिए, अपने प्राणों की बाजी लगा रहे थे। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। मॉर्च 24, 2021।

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