आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।
।।आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।
महात्मा गांधी का मरण व्रत, गुलामों के गुलाम मूलनिवासी जनता को गुलाम बनाने के लिए ही रखा गया मगर उन की आजादी के लिए उस के पास षड़यंत्र के अतिरिक्त कुछ नहीं था, अगर ये कहा जाए कि वह अछूतों के लिए भेड़ की खाल में भेड़िया था तो सही होगा। सीएल चुंबर जी लिखते हैं कि, कुछ इतिहासकारों ने कहा है कि, मिस्टर गांधी के मरण व्रत ने देश को खरतनाक मोड़ पर खड़ा कर के अपनी घबराहट को भी प्रदर्शित किया था। सारे देश को भी भँबल भूसे में डाल दिया था। वह पूर्ण विश्वास से सोचता और विचार किया करता था कि, उस का विचार अछूतों के हितों के लिए सर्वोत्तम है और उस की सोच थी कि, अलग चुनाव क्षेत्र उच्च और नीच जातियों के बीच केवल बिखराब और बंटबारे को ही बढ़ाएगा। गांधी के ही छल कपट से पूना पैक्ट हुआ परन्तु आज हम देख रहे हैं कि, उस की गलत सोच के कारण, उच्च और निम्न सभी जातियों में संघर्ष और तेज हो गया है। वास्तव में, गांधी के विचारानुसार समाज के बंटबारे से भाव था कि, उच्च जातियों अर्थात आर्यों के नीच जातियों अर्थात गुलामों के गुलाम मूल भारतीयों के ऊपर दबदबे को कायम रखना था। माननीय एमसी राजा सहित कुछ अछूत आगुओं ने गांधी का साथ दिया और विश्वास व्यक्त किया गया था कि, हमारा जीर्णोद्धार करना ही महात्मा गांधी का मौलिक उद्देश्य है। आदधर्म मंडल का नेतृत्व गांधी के विचारों से बिलकुल विपरीत था। उन का मंतव्य था कि, अछूतों की अलग नुमांयदगी की गारंटी के बिना किसी को भी कुछ भी मंजूर नहीं। आदधर्म के आगुओं के लिए गांधी के मरण व्रत में कुछ भी धार्मिकता नजर नहीं आ रही थी। आदधर्म के नेता मानते थे कि, गांधी के आत्मबलिदान की बात केवल शेखी बघारने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, ये मरण व्रत केवल अछूतों को गुलाम बनाए रखने के लिए, चतुर राजनीतिकरण की अति घृणित साजिश ही है। एमसी राजा और बाबू जगजीवन राम आदि और आदधर्म मंडल के विरोधी भेड़ की खाल में छुपे स्वार्थी, भाड़े के अछूत समाज सुधारक, गांधी के मरण व्रत की कुचाल को समझ नहीं रहे थे जिस के कारण आदधर्म मंडल की आजादी की लड़ाई की रफ्तार धीमी हो रही थी। ये बिकाऊ स्वार्थी लोग ही साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी के कारवां के लिए विभीषण बनते जा रहे थे। जहां इन अछूतों को एक मंच पर एकत्र हो कर, एक स्वर में ब्रिटिश सरकार को, अलग स्वतंत्र देश के लिए युद्ध लड़ना चाहिए था, वहीं ये लोग संसद, राज्यसभा विधानसभा के टिकट लेने की अपनी राजनीतिक तृष्ना को मन में पाले बैठे हुए थे। ये लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि, हम अपने मूलनिवासियों को खुद ही पुनः गुलाम बनाने की साजिश में शामिल हो रहे हैं। बाबू जगजीवन तो राम अजेय सांसद रहे मगर प्रधानमंत्री नहीं बन सके हैं, बल्कि मूलनिवासी लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बन भी गए तब भी उन्हें मार दिया गया और पुनः सत्ता छीन कर कांग्रेस ने अपने हाथ में ले लिया जिस के परिणाम आज देखे जा रहे हैं। मूलनिवासी अहंकारी, स्वार्थी नेता केवल संसद, राज्यसभा, विधानसभा के मेंबर बन कर संतुष्ट हो जाते हैं और अपने समाज को बेच कर खुद भी खाते जा रहे हैं और अपने वच्चों को भी खिलाते हैं। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी के समय में तो विधायकों को ना तो वेतन ही मिलता था और ना ही पेंशन जिस के कारण वे तो अंतिम दिनों में आर्थिक दृष्टि से भी परेशान ही रहे मगर वर्तमान राजनेताओं ने तो गरीबों का खून चूसने के लिए, अपने वेतन ही लाखों रुपये कर लिए हैं, यही लोग भारत के आधे बजट को हजम करते जा रहे हैं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मार्च 21, 2021।
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