आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।
।।आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।
जब महात्मा गांधी और सभी कांग्रेसी नेता अपने अछूत पिठ्ठुओं के कंधों पर बंदूकें तान कर के, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी के आदधर्म मंडल को निशाना बना रहे थे, तब दोनों पक्षों के बीच कुड़तन इतनी बढ़ गई थी कि, जो लड़ाई अंग्रेजों के साथ लड़नी चाहिए थी, वही लड़ाई हिंदुओं और आदधर्मियों को आपस में लड़नी पड़ गई। सन 1930 में जब नमक आंदोलन चल रहा था तब मूलनिवासी आदधर्मियों और नमक आंदोलनकारियों के बीच जालंधर में जबरदस्त झड़पें होने लगी। इण्डियन नैशनल कांग्रेस की पंजाब शाखा महात्मा गांधी के नमक आंदोलन की हिमायत में, विदेशी नमक का बायकाट करने और स्वयं नमक बनाने का निर्णय ले कर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संघर्ष शुरू किया हुआ था मगर आंदोलन में अछूतों को ही प्रयोग किया जा रहा था और उन्हीं के अधिकारों पर मनुवादी डाका भी डाल रहे थे। मूलनिवासियों की गुलामी को बनाए रखने के लिए ब्रिटिश सरकार के साथ ही महात्मा गांधी एंड कम्पनी काम करती जा रही थी, जिस के कारण साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल और उन के आदधर्मी भी, कांग्रेस के विरोध में मुजाहरे रैलियां और जलूस निकाल रहे थे। एक दिन तो शाम के समय तक आदधर्मियों ने, नमक बनाने वाली बड़ी बड़ी हंडियों को तोड़ फोड़ दिया था, बुरी तरह बर्तनों और सभी देगचों को बर्बाद कर दिया। इस घमासान युद्ध के बीच ये स्वाभाविक ही था कि कांग्रेसी भी आदधर्मियों के साथ मारपीट धकमधक्का करते मगर उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया ताकि आदधर्म मंडल कहीं और कड़ा कदम उठा कर, गांधी के भीतर घात को कोई आंच ना पहुंचा सके। सीएल चुंबर जी लिखते हैं कि, ये घटना मद्धम मुकाबलों की कड़ी चरम सीमा थी, जो आदधर्म की ओर से कांग्रेस के निशानों की राह में रूकाबट बनने के बाद घटी, उदाहरण के तौर पर सन 1928 ईस्बी में मोती लाल नेहरू की ये (मुसलमानो को छोड़ कर) अलग चुनाव क्षेत्रों को खत्म कर देने की अपील पर आद धर्मियों की कड़ी प्रतिक्रिया थी, आदधर्म मंडल का कहना था कि, 'हम आशा करते हैं कि, छुआछूत का भूत नेहरू रिपोर्ट को रावी दरिया के बीच डुबोने पर डूब जाएगा" मगर जब सन 1928-1932 को लन्दन में इस विषय को उठाया गया तब आदधर्म मंडल भी कांग्रेस की पोजिशन के सख्त विरोध में खड़ा हो गया था। जब महात्मा गांधी ने गोलमेज कांफ्रेंस में कहा कि, मैं ही अछूतों का प्रतिनिधि हूँ और डॉक्टर भीम राव अम्वेदकर नहीं है, तब बाबू मंगू राम मुगोवाल जी ने ही, अछूतों के नुमांइदे डॉक्टर भीम राव अंबेडकर के पक्ष में, आदधर्म की ओर से हिमायत की तारें भेज कर, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को ही प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दिलाई थी। जब अछूतों के लिए अलग चुनाव क्षेत्रों के सवाल पर समझौते की गलबात टूट गई तब बाबू मंगू राम जी डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के पक्ष में खड़े हो गए और गांधी के सख्त विरोध में आ गए थे, जिससे महात्मा गांधी और सारी कांग्रेस बुरी तरह से बौखला गई थी। पिछड़ी जातियों का नेता सरदार बल्लभभाई पटेल ही गांधी के साथ कंधे से कंधा मिला कर, मूलनिवासियों के पेट में छुरा घोंप रहा था जिस की कीमत पिछड़ी ही नहीं सभी मूलनिवासियों को मंडल आंदोलन में खून बहा कर चुकानी पड़ी थी।
मूलनिवासियों की वास्तविक लड़ाई तो केवल आदधर्म मंडल ही सड़कों पर लड़ रहा था मगर उसी आदधर्म मंडल की टांगे गद्दार मूलनिवासी नेता खींच रहे थे, जिस से कांग्रेस की अर्थी उठा कर, खुद तो मंत्री, सांसद और विधायक बन कर अपने और अपने परिवार के पेट भर कर मौज मस्ती करने लग पड़े हैं, मगर बाकी मूलनिवासी समाज आज तक मनुवाद की गुलामी की चक्की तले पिसता आ रहा है, जिस के लिए, केवल साहिब कांशीराम जी ने ही घोर युद्ध लड़ कर, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी के रुके वहुजन राज की नींव पर वहुजन राज स्थापित किया मगर उसे भी उस के नालायक चेलों ने रोक दिया है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मार्च 19, 2021।
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