आदधर्म मंडल के मेमोरेंडम 1932 में रंग लाए।
।।आदधर्म मंडल के मेमोरेंडम 1932 में रंग लाए।।
भारतवर्ष में गुलामों के गुलाम शूद्रों की आवाज बन कर उभरा आदधर्म मंडल ही ब्रिटिश सरकार को संतुष्ट कर सका था कि, केवल ब्राह्मणों ने ही मूल भारतीयों को जानबरों की जिंदगी जीने के लिए विवश कर रखा है। जब पहली बार लार्ड साईमन के नेतृत्व में आया शाही कमीशन भारत आया था, तब केवल पंजाब आदधर्म मंडल द्वारा उठाई गई, मांगों का जायजा लेने के लिए कमीशन लाहौर उतरा था, तब गांधी और उस के परपंचियों ने, उस का काले झंडों से बहिष्कार कर के सत्य से दूर रखने के लिए, जगह जगह सामूहिक लंगर, सामूहिक मन्दिरों में प्रवेश कर के पूजापाठ, सामूहिक कुओं से पानी भरने का झूठा नाटक रच कर, साईमन को गुमराह किया था, जिस का सच आदधर्म मंडल और उन के वकील डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने महाड़ तालाब पर भांडा फोड़ किया था, जब वे गंदगी से भरे तालाब के किनारे साईमन को घुमा रहे थे और गांधी के फरेब की पोल खोलने के लिए, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने सफेद कुत्ते को तालाब में धकेल कर उसे पानी में तैरने के लिए छोड़ दिया था और बाद में अछूतों को पानी पीने के लिए संकेत किया था, जैसे ही अछूत पानी पीने लगे वैसे ही सर्वणों ने लाठियों की वर्षा शुरू कर दी थी, जिसे देख कर साईमन समझ गया कि गांधी ही छल कपट और मक्कारी कर रहा है और मुझे सामूहिक खाना, पीना और पूजा दिखा कर, सरकार को गुमराह कर रहा है, उस के बारे जब वही रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को मिली तभी ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने 16 अगस्त सन 1932 को, भारत के उच्च वर्ण हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, एंग्लो इंडियन पारसी और अछूत लोगों के लिए अलग अलग चुनाव क्षेत्रों की व्यवस्था कर दी। जिस व्यवस्था से सभी वर्णों और वर्गों को न्याय और प्रतिनिधित्व मिला। मूलनिवासियों का खून चूसने वाले मनुवादियों ने इस ऐतिहासिक निर्णय को सांप्रदायकता का नाम देकर विरोध किया था। उच्च जातियों ने इस न्यायसंगत निर्णय को बांटो और राज करो के नाम से बदनाम किया था, जबकि ऐसा कुछ नहीं था, क्योंकि हिटलर ने, अंग्रेजों की आर्थिक हालत नाजुक कर दी थी, जिस से अंग्रेज तो हिटलर के भय से सभी उपनिवेशवादों को खत्म कर के अपने देश ब्रिटेन जाने की तैयारी कर रहे थे। यदि ये कानून लागू हो जाते तो भारत से जाने वाले अंग्रेज अपने साथ तो कुछ भी लेकर जाने वाले नहीं थे मगर ब्राह्मणों का बहिष्कार केवल अछूतों को मौलिक अधिकार नहीं देने के लिए ही था। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडॉनल्ड ने गांधी की फितरत को देख कर अछूतों को अधिकार देने के लिए निम्नलिखित घोषणाएं कर दीं थीं:---
कानून व्यवस्था में सदस्यों की संख्या दोगुनी कर दी गई।
अल्पसख्यकों की भी सीटें बढ़ा दी गई।
मुसलमानों, सिखों, अछूतों, पिछड़ी जातियों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो इंडियन को आरक्षण के दायरे रखा गया था।
सभी अल्पसख्यकों को भी अलग निर्वाचन और प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया गया।
अछूतों को सवर्णों से अलग मॉन्यता देकर पृथक निर्वाचन और प्रतिनिधित्व के अधिकार दिए गए थे।
स्त्रियों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया था।
गांधी इस मानवतावादी निर्णय से बड़ा दुखी हो गया था, इसी कारण अंग्रेजों को ब्लैकमेल करने के लिए, 18 अगस्त 1932 को प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडॉनल्ड को पत्र लिख कर, उन्हें धमकी दे दी थी कि, मैं इस निर्णय के खिलाफ 20 सितंबर 1932 को आमरण अनशन पर बैठ जाऊंगा। जब अंग्रेज सरकार ने गांधी के ड्रामें के आगे झुकना स्वीकार नहीं किया था, तो उस ने 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में सुरक्षित हो कर आमरण अनशन शुरू कर दिया था। इस अनशन के समानांतर साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी ने भी महात्मा गांधी की मक्कारी का पर्दाफाश करने के लिए पंजाब के गढ़शंकर में बारह दिनों तक आमरण अनशन किया था मगर उन के अनशन की परवाह किये बिना ही डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने, अकेले ही पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर कर के, सारे अधिकार त्याग दिए थे और गुलाम बादशाहों के लिए विधान सभाओं और संसद में दोगुनी सीटें आरक्षित करवा लीं थीं, पंजाब आदधर्म मंडल ने जो जान हथेली पर रख कर, संघर्ष कर के प्राप्त किया था उसे खो दिया गया था। आज जो सांसद और विधायक बन रहे हैं वे केवल ब्राह्मणों की जी हजूरी करते हैं, अछूतों की कोई बात नहीं करते हैं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मार्च 14, 2021।
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