आदधर्म मंडल और 1931 की जनगणना।।

।।आदधर्म मंडल और1931 की जनगणना।। सन 1931 ईस्बी में जनगणना ऑपरेशन शुरू होने से पूर्व पंजाब आदधर्म मंडल ने पंजाब सरकार को एक बेनती पत्र भेजा था, जिस में कहा गया था कि, दबियाँ-कुचलियाँ श्रेणियों को जनगणना के समय आदधर्म के बीच प्रवेश करने की आज्ञा दी जाए, ताकि हम आदधर्म को अपना धर्म मान सकें क्योंकि हम भारतवर्ष के मूलनिवासी, आदिवासी समाज में से हैं और हमें हिन्दू अपने से दूर रखते हैं। आदधर्म मंडल के प्रधान को यह सूचित कर दिया गया था कि, जनगणना कोड के बीच एक धारा निर्धारित कर दी गई है, ताकि वे लोग जो आदधर्म के बीच वापस आना चाहते हैं, वे आ सकें। एक बार जब कि आदधर्म जनगणना सूची में शामिल कर लिया गया था, इस बात को यकीनी बनाने के लिए वहुत ज्यादा कोशिश की गई, कि इस धर्म को अपना वास्तविक धर्म ऐलानिया था, आदधर्म को आदधर्म मंडल ने अपनी शाखाओं के दफ्तरों और वहुत सारे गांवों के करिन्दों की मदद से फैलाया गया ताकि अपना मकसद पूरा किया जा सके। ये वहुत ही ज्यादा तनाव का समय था, जब कि आदधर्म मंडल गरीबों के कुछ तबकों के बीच लाभ लेने का प्रयत्न कर रहा था। आदधर्म मंडल अपने विशाल तबके के लोगों की शक्ति को वापस लेने के लिए, अछूतों का ध्यान आकर्षित करने की पूरी कोशिश कर रहा था। आदधर्म मंडल की तत्कालीन घटनाओं का विवरण:--- डॉक्टर मार्क लिखते हैं कि, यदि जनगणना की गिनती के समय कोई आदधर्म शब्द का जिक्र भी करता था, तो उच्च जाति के लोग उस के साथ चलते तक नहीं थे, जिस का भावार्थ है, सामाजिक बहिष्कार। मनुवादी लोग आदधर्मियों का सामाजिक बॉयकाट कर देते थे। आदधर्मियों कि अनुसार, उच्च जाति के लोग हमें भाई कहते हैं मगर हमारे साथ कुत्तों बिल्लों की तरह व्यवहार करते हैं, खास कर के अकाली सिख लोगों ने हमारे लोगों के लिये और भी बड़ी मुश्किलें खड़ी करना शुरू कर दीं हैं। जब हम ने जनगणना दौरान ये कहा कि, हम मूल भारतीय आदधर्मी हैं, तब उन्होंने हमें अपने घरों के बीच दरवाजों के बीच कण्डियाली बोरां और कांटेदार टहनियों को रख कर, उस के अंदर ही बन्द रखा और वहुत दुखी किया था। वे हमें कुओं से पानी तक भरने के लिए नहीं जाने देते थे। उन्होंने हमें दुकानों से सामान तक खरीदने नहीं दिया था। ये लोग हमें घटिया नामों से पुकारते और परेशान  करते थे। हमारे पशुओं को भी बाहर घुमाने के लिए जाने नहीं देते थे। हमारी  जवान लड़कियों को सड़कों पर पकड़ कर बलात्कारी बलात्कार करते और उन की बेइज्जती भी करते थे। कई बार तो उन्होंने हमारे घर भी जला दिए थे। घरों की लूटमार कर के लूट लिया करते थे। इस साल के दौरान हमारी छः महीने की दिहाड़ियों की मजदूरी तक नहीं दी। हमारे पशु तक छीन लिए थे। हमारे घरों के आगे कख कांटे फैंक कर आग लगा कर हमें जिंदा जलाने की कोशिश भी कीं थीं, यहां तक कि हमें गांवों के गंदे तालाबों से पानी तक पीने नहीं दिया गया था। गंदे तालाबों के चारों ओर उन की राखी (रक्षा) के लिए, खड़े हो कर सिख स्वयंसेवक पहरा देते थे ताकि कोई भी अछूत पानी तक भर कर ना पी सके। बिंना किसी कारण से ये लोग हमारे ऊपर गैर कानूनन आरोप लगा देते और हमें बंदूकों, पिस्तौलों और तलबारों के साथ धमकाते थे। हमारे बच्चे और पशु भोजन और पानी के बिना मर रहे थे परन्तु उच्च वर्ग के पास हमारे लिए कोई दया नहीं थी। डॉक्टर मार्क लिखते हैं कि, उन के पिता जंगल को जाते थे और भोजन के लिए घास काटते थे, इस पर भी सिख स्वयंसेवक उन के भांडे बर्तनों को तोड़ देते थे परन्तु जनगणना के समय इतनी ज्यादा तंगियों अर्थात मुशीबतों के बाबजूद भी आदधर्म के लोगों ने, अपना सन्देश प्रसारित करना जारी रखा था। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। अप्रैल 01, 2021।

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