गुरु रविदास जी ही मूलनिवासियों के गुरु।।
।।गुरु रविदास जी ही मूलनिवासियों के गुरु।।
गुरु रविदास जी ही भारत के पचासी प्रतिशत मूलनिवासियों के गुरु हुए हैं, जिन का अवतार मूलनिवासी राज परिवार चँववंश में हुआ था। गुरु रविदास जी महाराज ने ही, मूलनिवासियों के कल्याणार्थ जीवन अर्पित किया है, गुरु जी ने ही शूद्र वर्ग को समझा, परखा, जाना, पहचाना और उनके दुख दर्द को आत्मसात कर के, स्वयं चमार कहला कर, अछूत निम्न जातीय हीनता की भावना को मूलनिवासियों के मानसपटल से निकाल कर गर्व और स्वाभिमान से जीने का गौरव उतपन्न किया है, तभी तो उन्होंने कहा है:---
जोगीश्वर पावहि नाहिं तुझ गुण कथन अपार।
प्रेम भगती के कारने, कहु रविदास चमार।
कहि रविदास खलास चमारा।
जो हम शहरी सु मीत हमारा।
यूरेशियन लुटेरों ने खुद भी भारत को लूटा, ठगा और बाकी डच, हूण, फ्रेंच, मुस्लिमों और अंग्रेजों को भी लुटवाया और अपने घरों में निठल्ले बैठ कर मौज, मस्ती करते हुए ऐश्वर्यपूर्ण जिंदगी जी और विदेशी लुटेरों के रंग में रंग कर, उन्हें भी भारत को लूटने की पूरी छूट ही नहीं सहायता भी की।
जब ब्राह्मणों ने देखा, कि शूद्र तो अपने गुरुओं के बताए मार्ग पर चल कर ही, केवल निरंकार को अपना गुरु, भगवान, अवतार मानते है, तो इन्हीं ब्राह्मणों ने अपने ब्राह्मण और जाटों को बौद्ध, निरंकारी, राधास्वामी, जैनी, झूठा सौदा करने वाले सौदागर बना दिया और 85 प्रतिशत अछूतों को इन्हीं कल्पित सन्तों के मगर लगा लिया, जिनमें वापू आशाराम, उनके प्रिय, सुपुत्र नारायण स्वामी, मंदिर में दोनों वाप बेटे भक्ति के साथ सुरा सुंदरियों के डांस भी बताते, सिखाते रहे, वीरेंद्र दीक्षित रोहणी, इच्छाधारी भीमानंद 1997 से ही नागिन डांस सहित देह व्यापार का सत्संग देता आया है स्वामी परमानंद तामिलनाडु के तिराचिल्लापली आश्रम में भक्ति रंग के साथ साथ योन शोषण का संस्थान चला रहा था, राम रहीम तो सर्वसमाज के भक्ति जहाज के उपर सुंदरियों को चढ़ा रहे थे। स्वयंभू कल्कि साहिब के अवतार जाट रामपाल ने तो सतलोक का वहुआयामि भक्ति केंद्र चलाया हुआ था, जिनके सतलोक को कबीरपंथी समाज को सीधे ही भेजे जा रहा था, कबीर साहिब को भगवान सिद्ध करते करते ये, अबतार खुद ही जेल की बन्द हवा में निरंकार को देख रहे हैं, बाकी राधास्वामी जाट अभी कोर्ट की पेशियों में मशरूफ है, जिस ने भी अस्सी प्रतिशत, चमार जाति को ही अपने पीछे लगाया हुआ है और ये सन्त महात्मा जी, धर्मांध बना कर, रंकार, निरंकार, जोतनिरजंन सतनाम और सोहम नामक पांच विशालकाय यद्धपोतों पर सवार कर के सीधे सीधे निराकार निरंकार से साक्षात्कार करवा रहे हैं, और अपने धंधों के प्रॉडक्ट बेचने के लिए, विशाल सत्संगों के आयोजन करके खूब सारा जूस, बिस्कुट बेच लेते है, रनबेक़सी और रेलिकेयर की दवाईयां बेच कर खूब धन संग्रह किया जा रहा। फोर्टी हस्पतालों से मुर्दे तभी देते आए हैं, जब मुर्दे की बीमारी का पूरा धन बसूल हो जाता है, अन्यथा देते ही नहीं। निरंकारी डेरा सिरसा भी अछूतों के बल पर चलता आया है। व्यास डेरा से कुछ लोग नाराज हो गये तो एक इन्होंने, डिसिडेंट ग्रुप के लिये ब्रांच सच्चा सौदा के नाम से, सिरसा में शुरू कर दी और जो कुछ अछूत नाराज हो गए थे, वे वहां अपना धन दौलत लुटा रहे हैं।
इन प्रकाण्ड सन्तों ने, मूलनिवासियों को ही पट्टी पढ़ाई हुई है कि, पूजा तो केवल जिंदा गुरुओं की करनी चाहिए, मरे हुए गुरुओं की नहीं, मैं इन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि क्या, ये जो आप के गुरु आपके जहन में ऐसी बातें बैठा रहे हैं, क्या ये इन महापुरुषों को शोभा देतीं हैं? क्या ये कहना तर्कसंगत हैं। :----
गुरु रविदास जी, गुरु कबीर जी, मीराबाई को जान से मारने के कितने घृणित कार्य गए मगर उन्हें कोई भी मार नहीं सका।
जेलों में बंद किया गया मगर जेलें भी उन के लिए अपने ताले खोल देती थीं।
लाठियां तलबारें उन्हें मारने के लिये उठाई गईं मगर वे भी उन तक पहुँचने से पहले ही रुक जाती थी।
खूनी हाथियों को उन्हें सजाए मौत देने के लिए तैयार किया गया था, लेकिन वह भी उन्हें चूम कर, नमन कर के वापस चले जाते थे। उन के लिए जहर भी अमृत बन जाया करते।
चकियाँ पिसाई गईयाँ मगर चकियाँ भी गुरुओं के सम्मान में आ गइयाँ और खुद ही चल कर, गुरुओं को दुख नहीं आने दिया।
गुरुओं को ये कमेंट करना कि हम जिंदा गुरुओं को ही मान्यता देते हैं, क्या वर्तमान गुरुओं की औकात पूर्व गुरुओं के समान है?
अपनी आत्मा से पूछो कि, वर्तमान गुरुओं के आशीर्वाद से तुम कितने सुखी हो?
अपनी आत्मा से पूछो कि, आप सभी के घरों में कितनी सुख शांति है?
चिंतन करो कि आपके वर्तमान सतगुरुओं के आशीर्वाद से आप की देह कितनी सुखी है?
आप के वर्तमान गुरुओं के सत्संग से आप को कितनी मानसिक और आर्थिक सुख शान्ति मिली हुई है?
सत्संग सुनने से आप की आत्मा की कितनी शुद्धि हुई है जिससे आपको सभी इंसानों और अपनी सन्तानों के बीच कितना अंतर मालूम होता है।
अपनी आत्मा से पूछो कि, हम अपने भाई को कितना प्यार करते हो?
अनुमान लगाओ कि, आप के घरों में कितना अनुशासन है?
आप अपने ईमान से चिंतन करो कि, आप अपने बजुर्गों की कितनी सेवा करते हो।
अपनी आत्मा से पूछो कि, आप के पड़ोसी आप के व्यवहार से कितने सुखी हैं?
मुझे तो उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर किसी के घर में नहीं मिले हैं, फिर इन वर्तमान गुरुओं के ऐसे निम्न स्तर के उपदेशों को, आप क्यों अपने मन में आत्मसात करते हो? क्यों वर्तमान गुरुओं की शक्तियों का अहसास झूठी अफवाहें फैला कर किया जाता? जिससे भोलीभाली संगतों का ही जीवन दुखमय और कष्टमय हो जाता है।
जो कार्य वर्तमान गुरु करते जा रहे, वैसे कार्य पूर्व गुरुओं ने नहीं किये हैं। ये काम वर्तमान गुरु ही कर रहे हैं, भद्दे नागिन डांस तो जिंदा गुरु ही सीखा सकते, ज्योतिर्लीन गुरु रविदास जी, गुरु कबीर, गुरु नामदेब, गुरु सेन, गुरु सधना, गुरु धना, गुरु मीराबाई तो ज्योतिर्मंडल से उतर कर आ नहीं सकते, अब उनके तो मुंह हैं नहीं, जिन से ऐसे मन को जीतने वाले सत्संग वे कर सकें, जिनसे खट्टा मीठा स्वाद दे या ले सकें। इन सब प्रकाण्ड सन्तों को जेलों में रोना धोना पड़ता है, मगर रामपाल के कबीर साहिब भी और उनके कबीरपंथी भी उन्हें जेल में मिलने भी नहीं जाते, राधास्वामी के चमार सत्संगी भी दिल्ली हाईकोर्ट में जा कर न्यायधीशों को नहीं समझाते कि केस खत्म कर दो। रनबैक्सी मेडीशन फैक्ट्री बिकने से नहीं बचाते, रेलिकेयर की भी कोई केयर नहीं करते, सिंगापुर के मालिकों के मुंह भी बंद नहीं करते कि भाई तुम क्यों महात्मा जी को कोर्ट में परेशान मत करो।
वास्तव में ज्योतिर्मंडल से गुरु रविदास जी और उनकी समस्त सन्त मंडली के नायक देख रहे हैं, कि ये बेचारे सन्त हमारे नामो को चार चांद लगा रहे हैं, तो क्यों ना इन की सेवा जेल में बंद कर के करवाई जाए? क्यों ना इनकी परीक्षा ले ही ली जाए, कि आपके तप के बल पर जेलों में सर्व सुख मिल रहे? दोस्तो! 2005 में सुप्रीमकोर्ट के निर्णय से गांव संतोषगढ़ जिला ऊना, हिमाचल प्रदेश के चब्बा ब्राह्मण परिवार ने, गुरु रविदास जी के मंदिर की जमीन सुप्रीमकोर्ट के निर्णय से हड़प ली और बाईस जनबरी को रात के अंधेरे में दस हजार पुलिसकर्मियों के द्वारा मंदिर तुड़बा दिया गया, जिसके दण्ड स्वरूप जिस चब्बा परिवार ने जमीन ली थी, वह 2009 में पूरे के पूरे सात सदश्य इकठ्ठे काल क्वलित हुए, जिन्हें इकठा जलाया गया। जिस ने 22 जनवरी की सुबह सबसे पहले, जे सी बी से गुरु रविदास मंदिर की दिबार को दस हजार पुलिसकर्मियों के सामने सब से पहले टक्कर मारी थी, उसकी दोनों टांगें ही तेरह अप्रेल 2005 को ही, गुरु रविदास चौक नंगल में दुर्घटना में जर्जर हो गईं थी। जिस दिल्ली कोर्ट के जज ने निर्णय दिया था वह भी अमर हो गया था, 2018 में पुनः दिल्ली उच्च न्यायालय के जज ने, तुग़लकावाद दिल्ली गुरु रविदास मंदिर की सात सौ कनाल जमीन दिल्ली प्राधिकरण को दे दी थी, वह भी बेचारा मौत के घाट उतर चुका है, सुप्रीमकोर्ट दिल्ली ने भी कोई न्याय नहीं किया और मंदिर दस अगस्त दो हजार उनीस को गिरा दिया है जिस के निर्णय भी चौकाने वाले होते जा रहे हैं, अभी और क्या क्या होगा देखते जाओ, पूर्व गुरु क्या क्या करते जाएंगे, आप सब के सामने आते जाएंगे।
आज से पांच सौ साल पूर्व हमारा कोई रहबर नहीं था जो हमारी रक्षा करता, इन्हीं गुरुओं ने हमारी रक्षा की है, इसीलिए उन्हीं के मंदिरों में झुको, उन्हीं को मन से गुरु धारण करो, और कोई गुरु धारण मत करो, उन्हीं को नमन करो, तभी कल्याण संभव है।
रामसिंह आदवंशी
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अक्तूबर 07,2020।
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