गुरु रविदास जी और एक माटी के सब भांडे।

।।गुरु रविदास जी और एक माटी के सब भांडे।।
गुरु रविदास जी, मानव जाति के विभाजन से अति हैरान थे कि, कोई ईसाई, मुस्लिम, पारसी यहूदी, बौद्धि, महायानी, हिंनियानी, वज्रयानी और शँखयानी, पादरी, मुल्ला, शेख, मौलाना, जैनी और भिक्षु बनकर सफेदपोश, कालेपोस, नीलेपोस, हरेपोस, गेरुएपोस, लालपोस, बने हुए हैं, कोई मठ में, कोई चर्च में, कोई मस्जिद में, तो कोई मन्दिर में, कोई कुल्ली में बैठकर, कोई लंबे लंबे बाल रखकर, कोई मूँड़ मुंडाकर, कोई आधे बाल कटवाकर, कोई दाड़ी बढाकर, कोई दाढ़ी घटाकर, कोई दाढ़ी और सिर के आधे आधे बाल कटबा कर, कोई बढ़ा कर, भक्ति करता जा रहा है, जब वे आसपास में रास्ते से गुजरते समय मिलते हैं, तब एक दूसरे को भौं चढ़ाकर देखते जाते हैं, क्या मजाल कि वे आपस में एक दूसरे को गले भी मिलकर सदभावना व्यक्त कर सकें। ये लोग लिवास तो साधु, संतों, महंतों, फकीरों, सन्यासियों, काजियों के पहने हुए हैं मगर आत्मा के अंदर तो कोई और ही कपटी वास करता है।
गुरु रविदास जी, हैरान थे कि, सभी सजातीय जानबरों, पशुओं, पक्षियों, जलचरों, नभचरों, की शक्लें एक जैसी हैं, सभी के एक जैसे रंग रूप और आकार हैं, उन की ध्वनियां, निवास, खाना-पीना, रहना और सोना एक समान ही है जबकि गुरु रविदास जी महाराज मानव के बारे में फरमाते है कि :-----
एकै ही माटी कै सभ भांडे, सब का एकौ सिरजनहारा।
रविदास विआपै एकौ घट भीतर, सभ को एकै घड़ै कुम्हारा।।
रविदास इक ही नूर ते, जिमि उपजयो सगल संसार।
ऊँच नीच किह विध भये, बाहमण वाणियां अरु चमार।
रविदास उपजई सभ इक नूर ते, बाहमण मुल्ला शेख।
सभ कू करता एक ही है, सभ जीवहि एक ही पेख।
इक जोति ते जउ सभ उपजै, तउ ऊँच नीच कस मान।
रविदास नाम कत धरैं, सबूहि कोउ नाद बिंद समान।।
अवलहि अल्लाह नूर उपाईआ, कुदरति के सभ बंदे।
इक नूर ते सभ जग उपजिआ, कउन भले कउन मंदे।।
रविदास इक हीं बूंद सौं,सबहि भयो विस्थार।
मूर्खखहिं हैं जउ करत हैं, वरन अवरन विचार।।
रविदास इक ब्रह्म बूंद सौं , सगल पसारा जान।
सभ उपज्यो इक बूंद सौं,सभ ही एक समान।।
रविदास जग उपजि इक बूंद ते, का बामन का सूद।
मूरखहि जन ना जानहिं , सबब माहिं रामहिं मजूद।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, केवल प्रकृति की रचना को ही, अपने श्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञान का आधार सिद्ध किया हुआ है। गुरु जी ने, मॉनवता के समन्वय की बात की है, गुरु जी फरमाते हैं कि, जब शेर की एक ही जाति है, उस की शक्ल एक जैसी है, उनकी दहाड़ एक जैसी है, शेर का भोजन एक जैसा है, इसी प्रकार सभी पशुओं और पक्षियों का रहन सहन भी एक समान है, फिर आदमी भी एक ही शक्ल के होते हैं, फिर उनकी जातियां अलग अलग क्यों हैं? जिस के समाधान के लिए, गुरु जी ने वर्ण व्यवस्था को खत्म करने की वकालत की है, ताकि इंसान; इंसान को इंसान समझ कर प्यार करे और आपस में समरसता से रहें। 
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अक्तूबर 04, 2020।




  

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