गुरु रविदास जी और साधु-संतों के कष्ट।।
।।गुरु रविदास जी और साधु-संतों के कष्ट।।
गुरु रविदास जी ने आजीवन कष्टों को गले लगा कर रखा मगर मूर्खों और दुर्जनों को होश नहीं आई कि, हम नीच हरकतें कर के अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। दुर्जन कभी नहीं सोचते कि जो नीच कर्म मैं कर रहा हूँ, जो छलकपट मैं कर रहा हूँ, जो कत्लोगारद मैं कर कर रहा हूँ, जो पशुता मैं कर रहा हूँ, एक ना एक दिन उस का परिणाम भी मुझे भुगतना पड़ेगा। आदिकाल से ही ये, अच्छाई और बुराई नामक दो ध्रुव साथ साथ चलते आए हैं, मगर बुरा कर्म करने वाले जहान से चलती बार रोते, चिल्लाते हुए, तड़फ तड़फ कर, वर्षों चारपाई पर पड़े रह कर, सड़ सड़, कर मरते देखे गए हैं मगर जिन्होंने, किसी की आत्मा को कष्ट नहीं पहुँचाया औऱ भगवान की रजा में रह कर ही,जीवन जिया वे ऐसे दुख कभी प्राप्त नही करते है। गुरु रविदास जी ने ऐसे ही पापियों के कल्याण के लिए ही अपना सारा जीवन दुखों में डाले रखा था। स्वामी ईशरदास जी महाराज गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 632-633 पर सन्तों और गुरुओं को दिए गये कष्टों के बारे में फरमाते हैं कि:----
।। चौपाई।।
अनलहक मंसूर गुण रविआ। सूली नाल कष्ट तांहि बनिआ। यीशू ने भी सच गल आखी। तिस नूँ भी सलीख ऊपर राखी। अल तन प्रगटि शम्स कराया। तांहि अपना पोश लहाया। खल खलील सच गल जां सुणाई। तिस गुण ने दीनी चिखा चनवाई।
अनलहक कहता हुआ मंसूर सूली पर चढ़ा कर मार दिया गया था, ईसा मसीह ने सत्य कहा था तो उसे भी सलीब पर चढ़ा दिया गया था, शम्स तबरेज जब खुद में खुदा कहने लगा था, तब उस की भी चमड़ी उतार कर शहीद करने का फरमान जारी किया था, तब शम्स ने खुद ही अपनी चमड़ी उतार कर रख थी, खलील ने जब सच्ची बात कहीं तो उसे भी, जिंदा ही चिखा के उपर चढ़ा दिया गया था। सत्यवादियों को ना जाने कितने जुल्म सहन करने पड़े हैं।
।।चौपाई।।
कबीर रविदास नामदेऊ भगत पीपा। गुण को गरहिंन कर पाइ कष्ट दीपा। मीरांबाई के गुर रविदास धर्म को राखिआ। आन कष्ट पिआला जहर का चाखिआ। सतिगुरु सतिनाम जपना। कारागार में दाखल कराया भाखन। दास कहे वेखत जुग चारा। गुणी संग होवत की की कारां।
सतगुरू कबीर साहिब, सन्त शिरोमणि, गुरुओं के गुरु रविदास जी महाराज, सतगुरू नामदेव जी, भगत पीपा ने सद्गुणों को ग्रहण किया था, जिस के कारण उन्होंने अनेकों दुखों को पाया। मीरांबाई को जहर का प्याला पिलाया गया मगर गुरु रविदास जी ने, अपनी दिव्य शक्ति से, उसे बचाया। जिन्होंने सतनाम जपा और जपाया उन्हें जेल में बंद किया गया था। स्वामी ईशरदास जी महाराज फरमाते हैं कि, चारों युगों से गुणवानों के साथ क्या क्या नहीं बिताया गया है?
।।शब्द हिंडोल।।
सुनावो बोलिआं नूँ राग कदर की पांऊँणगे। मूर्ख हथ आई मशाल पिंड को फूकाऊंणगे। रंग ते बरंग अंधे दसन की दसे बिन, अनपढ़ लैहन कताबां बिचों की सुनाऊंणगे। जियों अँधा जाए बाजार शीशे बेचणें शीशा इक ना लिए सारे मुड़े आऊंणगे। छती ताल देवो भावें लिख गुंगिआँ चलदी जीभ ना राग की सुनाऊंणगे। राही राह नहीं जाणे ना पूछ ना पछाणें। दास सारा दिन भेद बिन ऐमें भाऊंणगे।
स्वामी ईशरदास जी महाराज फरमाते हैं कि, जो धूर्त सत्पुरुषों को दिल को चुभने वाली बोलियाँ मारते हैं, वे साधु, संतों और सत्पुरुषों के राँगों की कदर क्या करेंगे? मूर्ख के हाथ में जलती हुई मशाल आ जाएगी तो गांव को ही जलाएंगे। अंधे रंग-कुरंग को क्या बताएंगे, अनपढ़ किताबें ले कर उन में से क्या सुनाएंगे। जिस प्रकार अंधा बाजार मे जा कर शीशे बेचने जाए तो उस का एक भी शीशा नहीं बिकेगा, सारे वापस घर आ जाएंगे। गूंगों को चाहे छती ताल लिख कर देदो, वह उन को क्या समझेंगे, जब जिह्वा चलती ही नहीं तो राग क्या सुनाएंगे। मुसाफर को रास्ते का पता ना हो और किसी को पूछे भी नहीं, तो वह सारा दिन यों ही भटकता रहेगा।
स्वामी ईशरदास जी महाराज, बखूबी जानते थे कि, साधु संतों को मूर्ख किस किस प्रकार सताते हैं? किस प्रकार झूठी तोमतें लगा कर जेलों में बंद करते है? यदि उन सब के पास आध्यात्मिक शक्तियाँ ना होती तो सभी, जेलों चार दीवारों में में ही सड़ते रहते! जिस प्रकार आज कई बाबे जेलों में बंद है, मगर भक्तिकाल के सन्त और गुरु पूर्ण ज्योतिर्ज्ञानी और सर्वज्ञ हुए हैं, जिन के सामने सभी मक्कारों, फरेबियों ने हार मानी थी।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
नबंबर 08, 2020।
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